JVM के समक्ष विश्वास का सबसे बड़ा संकट, बाबू लाल मरांडी को करना होगा विशेष प्रयास

राज्यसभा चुनाव ने झारखण्ड विकास मोर्चा के समक्ष विश्वास का सबसे बड़ा संकट उपस्थित कर दिया है, अगर यह पार्टी जनता के समक्ष अपना विश्वास इसी तरह खोती चली गई, तो फिर इस पार्टी का अस्तित्व ही सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। झाविमो सुप्रीमो बाबू लाल मरांडी को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि राज्य सभा चुनाव में अगर सर्वाधिक किसी पार्टी की किरकिरी हुई है तो वह झारखण्ड विकास मोर्चा ही है,

राज्यसभा चुनाव ने झारखण्ड विकास मोर्चा के समक्ष विश्वास का सबसे बड़ा संकट उपस्थित कर दिया है, अगर यह पार्टी जनता के समक्ष अपना विश्वास इसी तरह खोती चली गई, तो फिर इस पार्टी का अस्तित्व ही सदा के लिए समाप्त हो जायेगा। झाविमो सुप्रीमो बाबू लाल मरांडी को यह बात गांठ बांध लेनी चाहिए कि राज्य सभा चुनाव में अगर सर्वाधिक किसी पार्टी की किरकिरी हुई है तो वह झारखण्ड विकास मोर्चा ही है, जिनके विधायकों पर राज्य सभा चुनाव के दौरान गंभीर आरोप लगे हैं।

दिसम्बर 2014 में राज्य में विधानसभा चुनाव संपन्न होने के बाद, इसके छह विधायकों द्वारा भाजपा में शामिल होना तथा इस बार राज्यसभा चुनाव में इसके एक विधायक प्रकाश राम द्वारा पार्टी के खिलाफ जाकर भाजपा के पक्ष में मतदान करना तथा मासस विधायक अरुप चटर्जी द्वारा झाविमो विधायक दल के नेता प्रदीप यादव पर भाजपा के पक्ष में मतदान करने का आरोप बताता है कि झाविमो के उपर किस प्रकार विश्वास का संकट मंडरा रहा हैं, क्योंकि अगर झारखण्ड की जनता ने अगर ये मान लिया कि झाविमो के विधायक बन जाने के बाद, इनके विधायक किसी अन्य दल द्वारा प्रलोभन दिये जाने के बाद, उस प्रलोभन में फंस जाते हैं, तो फिर आम जनता ऐसी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़नेवालों को वोट क्यों देंगी?

इसमें कोई दो मत नहीं कि चाहे दल कोई भी हो, किसी भी दल का विधायक ये दावे के साथ नहीं कह सकता, या उसकी पार्टी ये दावे के साथ नहीं कह सकती, कि उसके पार्टी या दल के अंदर आनेवाले सारे के सारे विधायक चरित्रवान हैं या लालची नहीं हैं। किसी दल को प्रलोभन देकर उसके विधायकों को अपनी पार्टी या दल में मिलाना भी चरित्रहीनता है, जो यह काम भाजपा 2014 में झाविमो को तोड़कर कर चुकी है, इसलिए इस विषय पर उसे बोलने का कोई अधिकार भी नहीं है।

आज भी झाविमो के दलबदलू विधायकों से संबंधित विवाद झारखण्ड विधानसभाध्यक्ष के समक्ष चल ही रहा है, और हमें लगता है यह विवाद तब तक चलता रहेगा, जब तक झारखण्ड विधानसभा के नये चुनाव की घोषणा न हो जाये, क्योंकि अब चार साल बीतने को हैं, अभी तक इस समस्या का समाधान नहीं होना, बताता है कि इस विवाद को सुलझाने में अध्यक्ष दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं, इसमें स्पीकर का भी कोई दोष नहीं, वह भी क्या करें, वह भी अपनी पार्टी से बंधा है, क्या करेगा? उसे भी चुनाव लड़ना है, विधायक बनना है, अगर पार्टी ने कृपा कर दी तो हो सकता है कि इससे भी बड़ा सर्वोच्च पद मिल जाये, इसलिए ऐसे विवाद को लटकाना और तब तक लटकाना जब तक नया विधानसभा चुनाव न आ जाये, मजबूरियां होती है।

2014 विधानसभा चुनाव के बाद झाविमो के 6 विधायकों का भाजपा में मिलना और इधर राज्यसभा चुनाव में बाकी बचे 2 विधायकों का भाजपा प्रत्याशी प्रदीप सौंथालिया के पक्ष में झुकाव बहुत कुछ कह देता हैं। अब झाविमो कुछ भी कहें, जिस प्रकार से अरुप चटर्जी ने प्रदीप यादव पर राज्यसभा चुनाव मामले में यह कहकर गंभीर आरोप लगाया कि प्रदीप यादव ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया है और प्रदीप यादव का नो कमेंट्स कहकर चुप्पी लगा जाना, बता देता है कि दाल में काला है।

ऐसे भी प्रदीप सौंथालिया झारखण्ड के व्यवसायी है और यहां के करीब-करीब सारे दल, यहां तक की वामपंथी विधायक भी उनसे उपकृत होते रहे हैं, ऐसे में मित्रता तथा चंदे ने, उनके प्रति समर्पण का भाव जगा ही दिया था, पर पार्टी के व्हिप, जनता के प्रति खड़ा उतरने का विश्वास, तथा पार्टी की इज्जत ने यहां किसी को नहीं छोड़ा, प्रदीप सौंथालिया हार गये, पर उन्होंने बहुत सारी पार्टियों को अंदर से हिलाकर रख दिया तथा जनता के बीच इन पार्टियों को नंगा करके रख दिया, इसमें ये कहना कि एक ही पार्टी नंगी हुई, गलत होगा, इसमें सारी राष्ट्रीय पार्टियां भी नंगी हुई, उनका चरित्र जनता के सामने उजागर हुआ।

लेकिन इसके बावजूद, चूंकि बाबू लाल मरांडी राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री रहे हैं, उनके मुख्यमंत्रित्व काल में झारखण्ड ने ऊंचाइयों को छूआ हैं, लोगों को उनसे तथा उनकी पार्टी से आशाएं हैं, आनेवाले समय में उनका और उनकी पार्टी की चमक बरकरार रहे, इसके लिए उन्हें नये तरीके से पार्टी को जनता के बीच रखना होगा, उसके लिए उन्हें उन कार्यकर्ताओं पर ज्यादा विश्वास करना होगा, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में साथ दिया और जो लोग राजनीतिक हवा देखकर उनके पास खड़े होते हैं, उनसे उन्हें तौबा करना होगा, क्योंकि बरसाती मेंढ़कों पर विश्वास, उनके लिए फिर कष्टदायी ही होगा।

ऐसे भी बाबू लाल मरांडी को जनता के बीच जाकर, ये बात पूरे ईमानदारी से रखना चाहिए कि गलतियां हुई हैं, उन्होंने ऐसे लोगों पर विश्वास किया हैं जो जनता के विश्वास पर खड़े नहीं उतरे हैं, जनता ऐसे लोगों को सबक सिखाये, वे नये विकल्प और नये प्रत्याशियों के साथ झारखण्ड की सेवा के लिए सदैव तैयार हैं, हमें लगता है कि जनता, उनके उपर विश्वास अवश्य करेगी।

Krishna Bihari Mishra

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