बस कुछ दिन ही शेष हैं, विलम्ब न करें, सपरिवार जाकर रांची के जगन्नाथपुर में रथयात्रा का आनन्द लें

झारखण्डे जगन्नाथः। ऐसे तो ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से चालीस किलोमीटर अवस्थित पुरी में निकलनेवाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है, पर झारखण्ड की राजधानी रांची के जगन्नाथपुर में भी निकलनेवाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी कम प्रसिद्ध नहीं हैं। इस दिन पूरा रांची भगवान जगन्नाथ के दिव्य रथ को स्पर्श करने, उसे खींचने के लिए जगन्नाथपुर में उमड़ पड़ता है।

झारखण्डे जगन्नाथः। ऐसे तो ओड़िशा की राजधानी भुवनेश्वर से चालीस किलोमीटर अवस्थित पुरी में निकलनेवाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा विश्व प्रसिद्ध है, पर झारखण्ड की राजधानी रांची के जगन्नाथपुर में भी निकलनेवाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी कम प्रसिद्ध नहीं हैं। इस दिन पूरा रांची भगवान जगन्नाथ के दिव्य रथ को स्पर्श करने, उसे खींचने के लिए जगन्नाथपुर में उमड़ पड़ता है। 

आषाढ़ शुक्लपक्ष द्वितीया तिथि से प्रारम्भ होनेवाली यह रथयात्रा आषाढ़ शुक्ल एकादशी तिथि को इसकी वापसी के साथ ही समाप्त हो जाती है। कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ ही एकमात्र ऐसे देवता है, जो अपने गर्भगृह से निकलकर सामान्य जन के लिए सर्वसुलभ होते हैं, वे रथयात्रा के माध्यम से सभी को दर्शन देते हैं, जिस दर्शन को पाकर सभी कष्ट दूर हो जाते हैं, और सामान्य जन को शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक कष्टों से मुक्ति मिल जाती है।

आजकल तो अन्तरराष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ के कृष्ण भक्तों ने पूरे विश्व में श्रीकृष्ण नाम का ऐसा जादू बिखेरा है कि आज पूरे विश्व के कई देशों में रथयात्रा की खबरें सुर्खियां बंटोर रही हैं, क्योंकि इतनी भव्यता के साथ ये श्रीकृष्ण भक्त रथयात्रा का कार्यक्रम संपन्न करते हैं कि लोग बड़ी संख्या में देखने ही नहीं, बड़े भाव से “हरे राम, हरे राम, राम-राम हरे हरे, हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण-कृष्ण हरे हरे” महामंत्र का जप भी करते हैं।  

पुरी के रथयात्रा का महत्व तो यह है कि लोग बताते है कि इस रथ में सवार भगवान जगन्नाथ के दर्शन और रथ खींचने के कारण, मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, शायद मोक्ष की प्राप्ति की महत्वाकांक्षा ही लोगों को पुरी के रथयात्रा तक ले जाती है। भारतीय सनातन धर्म में चार प्रकार के पुरुषार्थ की चर्चा की गई है, पहला है धर्म,  दूसरा है काम, तीसरा है अर्थ और चौथा है मोक्ष। कहा जाता है कि मोक्ष की प्राप्त के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता, वह सारे सांसारिक बंधनों से मुक्त हो जाता है।

रांची में बताया जाता है कि 1691 ई. में भगवान जगन्नाथ मंदिर की स्थापना हुई, जहां स्थापना हुई वो पुरा इलाका भगवान जगन्नाथ के नाम पर ही जगन्नाथपुर कहा जाने लगा और तभी से यहां भी परम्परागत रथयात्रा की शुरुआत हुई जो आज भी चल रही हैं, लोग बताते है कि एनीनाथ शाहदेव ने पुरी से भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भाई बलभद्र के विग्रहों को लाकर यहां स्थापित किया, जिसकी पूजा अर्चना उस समय से चली आ रही है।

रांची के जगन्नाथपुर का दृश्य ऐसे तो सालों भर मनोरम रहता है, पर जगन्नाथ जी के रथयात्रा के दिन यहां लगनेवाला दस दिवसीय मेला सभी के आकर्षण का केन्द्र रहता है, बड़ी संख्या में आदिवासियों का समूह भी भगवान जगन्नाथ के प्रति श्रद्धा निवेदित करना नहीं भूलता, भांति-भांति के लोग व समुदाय अपनी-अपनी परम्पराओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ की सेवा करते हैं, जो देखनेलायक होता है। फिलहाल यह मेला छः दिन और चलेगा, आइये आप भी भगवान जगन्नाथ के दिव्य दर्शन कर, अपना जन्म सफल करें, जय जगन्नाथ।

Krishna Bihari Mishra

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