जेपी के बगुला भगतों ने ही लोकनायक के संपूर्ण क्रांति की हवा निकाल दी…

जेपी के बगुला भगतों ने जितनी दिमाग पद, धन और जमीन बटोरने में लगाई, उतनी दिमाग अगर जेपी के संपूर्ण क्रांति को जमीन पर उतारने में लगाते, तो निःसंदेह देश का नक्शा ही अब तक बदल गया होता, पर जेपी के लोगों को, उनके पदचिन्हों पर चलने का दावा करनेवाले को, संपूर्ण क्रांति में दिलचस्पी कहां, वे तो आजीवन धन इक्ट्ठे करने, मृत्युपर्यंन्त स्वयं और स्वयं के परिवार के लिए पद-धन और जमीन बटोरने में ही अपना जीवन लगा दिया।

जेपी के बगुला भगतों ने जितनी दिमाग पद, धन और जमीन बटोरने में लगाई, उतनी दिमाग अगर जेपी के संपूर्ण क्रांति को जमीन पर उतारने में लगाते, तो निःसंदेह देश का नक्शा ही अब तक बदल गया होता, पर जेपी के लोगों को, उनके पदचिन्हों पर चलने का दावा करनेवाले को, संपूर्ण क्रांति में दिलचस्पी कहां, वे तो आजीवन धन इक्ट्ठे करने, स्वयं के लिए सुख-सुविधाओं की सामग्री बटोरने तथा मृत्युपर्यंन्त स्वयं और स्वयं के परिवार के लिए पद-धन और जमीन बटोरने में ही अपना जीवन लगा दिया और दूसरे के हिस्से में झूठे भाषणों का पिटारा परोस दिया।

आज बहुत दिनों के बाद एक आलेख पढ़ने को मिली है। जिसमें इन्दिरा-जयप्रकाश के बीच हुई वार्ता की चर्चा है, उस चर्चा में सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोषी ने बहुत ही सुंदर ढंग से धन के विषय में जेपी की राय और इन्दिरा गांधी के भावों को परिलक्षित किया है। प्रभाष जोशी लिखते है कि “यूपी और ओडिशा के विधानसभा चुनावों के लिए चार करोड़ रुपये इकट्ठे किये गये। इससे जेपी इतने चिन्तित हुए कि इन्दिरा जी से मिलने गए और कहा कि कांग्रेस अगर इतने पैसे इकट्ठे करेगी और एक-एक चुनाव में लाखों रुपये खर्च होंगे, तो लोकतंत्र का मतलब क्या रह जायेगा? ऐसे में तो सिर्फ वहीं चुनाव लड़ सकेगा, जिसके पास धनबल और बाहुबल रहेगा। मामूली आदमी के लिए तो कोई गुंजाइश नहीं रहेगी। जेपी ने बताया कि उस बातचीत के दौरान इन्दिरा अपने नाखूनों को कतरती रही। इन्दिरा के इस रवैये से जेपी बहुत दुखी हुए।”

अब यहीं सवाल, जेपी के आधुनिक बगुला भगतों से जो जेपी-जेपी, रटते-रटते, सत्ता के सर्वोच्च शिखरों तक पहुंचने के बाद, जो अथाह धन कमाने और जमीन-जायदाद इकट्ठे करने का जो शौक पाल रखा है, और इस शौक पर जो उनका कोई अंकुश नहीं हैं। ऐसे में क्या इस बढ़ती लालच से, वे उन लोगों का हक नहीं मार रहे है, जिनके पास न तो पद है, न धन हैं और न ही जमीन।

रांची में जेपी के कई बगुला भगतों से मैं मिला हूं, जो जेपी के समय तो जांति तोड़ो-बंधन तोड़ों के नारों को साकार किया, पर जैसे ही उनके बेटे-बेटियों की शादी की बात हुई, वे फिर से जाति में बंध गये, और अपने बेटे-बेटियों को उसी जातिवाद के चक्कर में पीस दिया, अब ऐसे में जेपी के उस नारे “जाति तोड़ों-बंधन तोड़ों” की तो हवा निकल गई। यहीं नहीं, ऐसे कई बगुला भगत है, जो अब जाति के नाम पर बने संगठनों से खुद को सम्मानित होकर, सिर पर पगड़ी डलवाकर, खुद को गौरवान्वित महसूस करते है, और सदन में कहते है कि मेरा जो छोटा सा नाम है, सिर्फ वहीं बोला जाय, मैं जाति सूचक शब्दों का प्रयोग नहीं करता, क्योंकि मैं जेपी आंदोलन से जुड़ा रहा हूं।

रांची में जेपी के नाम पर खूब आयोजन होते है, और उसमें उस समय के छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी के लोग, जो अब बूढ़े हो चुके है, जूटते हैं, जेपी के चित्र पर माल्यार्पण करते है, और फिर जे पी की चित्र को खूंटी पर टांगकर अपने कार्यों को इतिश्री कर लेते हैं, अब सवाल है कि क्या जेपी ने यहीं काम करने को कहा था क्या? क्या यहीं सब करने से संपूर्ण क्रांति आयेगी क्या? या आपके चरित्र में सुधार करने से, आयेगी।

जब कई सालों की पत्रकारिता के दौरान ईटीवी से हमारा जुडना हुआ तो हमें रांची भेजा गया। इसी दौरान, हमारी एक जेपी आंदोलन से जुड़े, एक शख्स से मुलाकात हुई, जनाब एक अखबार में प्रधान संपादक थे, और फिलहाल एक राजनीतिक दल की कृपा से वे राज्यसभा में है, वर्तमान राजनीतिक इवेट्स के जादूगर नरेन्द्र मोदी की कृपा से वे अब राज्यसभा में एक अच्छे पद को सुशोभित कर रहे है। जब अखबार में थे, जनाब की आर्टिकल कभी प्रथम तो कभी बीच के पन्नों पर दीख जाती, जिसमें जेपी के संपूर्ण क्रांति की छाप दिखती, हमें लगता कि सचमुच यह व्यक्ति जेपी के सपनों को साकार करनेवाला तथा उनके मार्गों पर चलनेवाला है, इसी दौरान मैं भी उक्त महाशय का कहीं-कहीं चर्चा कर दिया करता, जिससे चिढ़कर कुछ लोग हमसे झगड़ने लगते, ये अलग बात है कि जो उस दौरान उनका नाम लेकर चिढ़ते थे, जैसे ही जनाब राज्यसभा पहुंचे, अपने-अपने फेसबुक पर उनके साथ खिंचवाई फोटों डालकर, उनके मधुर संस्मरण छापने लगे, पर मेरी तो आदत है कि जिसे मेरे हृदय ने ठुकरा दिया, चाहे वह कोई भी हो, उसके लिए तो कबीर की यही पंक्ति समर्पित है – मरना भला कबीर का चित्त से दिया उतार।

आखिर ऐसा क्यों हुआ? सवाल है? जब जेपी, यूपी और ओडिशा चुनाव के लिए कांग्रेस द्वारा धन इकट्ठे करने की इस प्रवृत्ति से दुखी होकर, इन्दिरा से मिलने पहुंच सकते है और इन्दिरा के समक्ष अपना विरोध दर्ज करा सकते हैं तो क्या जेपी के आज के बगुला भगतों को, ये बात दिमाग में नहीं घुसती कि जेपी जो संपूर्ण क्रांति में आर्थिक क्रांति की बात करते थे, तो उस आर्थिक क्रांति में धन संग्रह पर भी उनके स्पष्ट संदेश थे।

आखिर एक व्यक्ति को कितने धन की जरुरत है? आखिर एक व्यक्ति को कितनी जमीन की जरुरत है? अगर एक व्यक्ति जो खुद को जेपी का अनुयायी समझता है तो उसे बताना होगा कि क्या उसे धन संग्रह के लिए कोई लिमिटेशन नहीं है। आश्चर्य है कि जेपी के इस अनुयायी ने अपने अखबार में धन संग्रह पर भी कई संपादकीय लिखे, पर उस संपादकीय को अपने जीवन में कभी नहीं उतारा। संस्कृत साहित्य में एक श्लोक है –

अधमाः धनम् इच्छन्ति। धनम् मानम् च मध्यमाः।।

उत्तमाः मानम् इच्छन्ति। मानो हि महतां धनम्।।

जो दुष्ट होते है, वे सिर्फ धन की कामना करते है, धन संग्रह करते है, पर जो मध्यम वर्ग के लोग है, उन्हें धन और सम्मान दोनों की कामना होती है, पर जो उत्तम लोग है, उनके लिए धन की कोई अहमियत नहीं, उनके लिए तो सम्मान ही सब कुछ होता है। सम्मान से बड़ा धन, उनके लिए कुछ भी नहीं है।

हमने देखा  उस शख्स को, जो खुद को पत्रकार कहता था, जो खुद को जेपी का अनुयायी कहता था, जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ने उसकी खुद के प्रति राजनीतिक भक्ति देखी, तो उसे जदयू के टिकट पर राज्यसभा भेजा और जब उसने चुनाव आयोग को, उस दौरान जो संपत्ति का ब्यौरा प्रस्तुत किया, तो पता चल गया कि वह व्यक्ति जेपी का कितना बड़ा अनुयायी है? जिसके पास धन और जमीन की कोई कमी नहीं, फिर भी धन और जमीन को संग्रह करने में ही जीवन भर लगा रहा और दूसरे के हिस्से में उपदेश का पिटारा खोलता रहा, यानी कथनी और करनी में विभेद रहा। वह जेपी का अनुयायी कैसे हो सकता है?  

शायद यहीं कारण है कि जेपी के मरते ही, जेपी की संपूर्ण क्रांति भी हवा में बह गई, क्योंकि जेपी के बगुला भगतों ने ही जेपी के विचारों की हत्या अपनी कर्मों से करनी शुरु कर दी, इसलिए आज जेपी की प्रतिमाएं है, जेपी के चित्र है, पर जेपी के विचार तो कब के मर गये, क्योंकि जिन पर दारोमदार था, उनके विचारों को आगे ले जाने का, वे तो झूठे पद, झूठे धन और झूठे जमीन के लिए ही अपना सारा जीवन उत्सर्ग कर दिये। जरा देखिये, एक जेपी के अनुयायी का चुनाव आयोग को दिया गया संपत्ति का ब्यौरा और आप निर्णय करिये कि क्या ऐसे में जेपी के सम्पूर्ण क्रांति का सपना पूरा होगा…

बेचारा खेतिहर परिवार से है। पुश्तैनी गांव में लगभग साढ़े सोलह एकड़ खेत, जिसका बाजार मूल्य उस वक्त 1.9 करोड़ था। रांची में तीन कमरे का फ्लैट। रांची में ही पत्नी के नाम 750 वर्ग फुट का आफिस स्पेश। रांची से सटे इलाके में 25 डिसिमल जमीन, पत्नी के नाम पर रांची के ग्रामीण इलाके में 117 डिसिमिल खेतिहर जमीन, सिताबदियारा में सामाजिक काम के लिए लगभग 39 कट्ठा जमीन की खरीद। जनाब के नाम पर 37 लाख के फिक्स डिपाजिट, शेयर बाजार व म्यूच्यूल फंड में लगभग साढ़े पन्द्रह लाख निवेश, पोस्टआफिस के पीपीएफ स्कीम में 14 लाख इक्कीस हजार, लगभग 26 लाख रुपये निजी फार्म में निवेश, पत्नी के नाम पर लगभग दस लाख के फिक्स डिपाजिट, तथा तीन लाख साठ हजार के शेयर और म्यूच्युल फंड में निवेश, पत्नी के नाम पर 13 लाख ग्यारह हजार पोस्ट आफिस में जमा, पत्नी के नाम पर 26-30 लाख के सोने-चांदी के सिक्के व अन्य गहने, पति-पत्नी मिलाकर चार जीवन पॉलिसी, बैंक व नकद मिलाकर कुल छः लाख रुपये नकद, गाजियाबाद नई दिल्ली में एक फ्लैट।

हालांकि इतनी जमीन और धन-सम्पत्ति उन्हें संग्रह करने का सामर्थ्य हैं, क्योंकि उनके वेतन भी कम नहीं थे, वे ऐसा कर सकते है, पर जेपी के अनुयायी को, इससे क्या मतलब? ठीक उसी प्रकार कुंभन दास को फतेहपुर सीकरी से क्या काम? जो जेपी का होगा, जेपी के विचारों का होगा, वो संपूर्ण क्रांति को अपने जीवन में उतारेगा, वह योगदा आश्रम या रामकृष्ण मिशन जाकर मत्था टेकने से ज्यादा परमहंस योगानन्द और विवेकानन्द के आदर्शों को जमीन पर उतार देगा और अपना सब कुछ देश को समर्पित करेगा, जो देश के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने का जज्बा रखे, वहीं राजनीतिज्ञ, बाकी तो बगुला भगत होते हैं, जो सेवा करे, वहीं भगत, वही आजाद, वही राजगुरु, वही क्रांति का वाहक, वही सम्पूर्ण क्रांति का संवाहक, नहीं तो ऐसे लोग बगुला भगत से ज्यादा कुछ भी नहीं।

Krishna Bihari Mishra

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