झारखण्ड सिविल सोसाइटी ने लोगों को सावधान किया -‘बच के रहना झारखण्डवालों, अपने चौकीदारों से’

ये पंक्तियां राज्य की जनता के दर्द को बयां करती हैं। कोई भी कविताएं ऐसे ही जुबां पर नहीं आ जाती, वह तभी आती है, जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो, जरा देखिये राज्य के क्या हालात कर दिये हैं, राज्य की रघुवर सरकार ने? अगर झारखण्ड सिविल सोसाइटी ने राज्य की जनता से यह कह दिया कि बच के रहना झारखण्डवालों, अपने चौकीदारों से, तो ये गलत थोड़े ही हैं।

‘चार साल तक लूट मचाई, मलाई चाटी यारों ने,

देश विदेश में सैर सपाटा, जश्न मनाई प्यारों ने,

मोमेंटम व कौशल की भी, खिल्ली उड़ाई चोरों ने,

जनता मरती रही पर, मौज मनाई मुफ्तखोरों ने,

चूर नशे में रहे मंत्री, घिरे रहे थे यारों से,

बच के रहना झारखण्डवालों, अपने चौकीदारों से

ये पंक्तियां राज्य की जनता के दर्द को बयां करती हैं। कोई भी कविताएं ऐसे ही जुबां पर नहीं आ जाती, वह तभी आती है, जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो, जरा देखिये राज्य के क्या हालात कर दिये हैं, राज्य की रघुवर सरकार ने? अगर झारखण्ड सिविल सोसाइटी ने राज्य की जनता से यह कह दिया कि बच के रहना झारखण्डवालों, अपने चौकीदारों से, तो ये गलत थोड़े ही हैं।

राज्य की जनता को अपने झारखण्ड को इन नकली चौकीदारों से तो बचाना ही होगा, नहीं तो आनेवाले समय में जो स्थिति हैं, वह नरकमय ही होगी, इससे इनकार नहीं किया जा सकता, उसके सुंदर उदाहरण बन चुकी है, राज्य की राजधानी रांची की प्राण कही जानेवाली हरमू नदी, जिसे राज्य सरकार  व उनके प्रशासनिक अधिकारियों ने नाले में परिवर्तित करा दिया। कौशल विकास के नाम पर होनेवाली नौटंकी तथा मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर चलनेवाली दुकानों के हालात क्या हैं? क्या राज्य की जनता को नहीं मालूम।

क्या राज्य की जनता को नहीं पता कि कैसे राज्य के बड़े-बड़े तालाब राजधानी से देखते ही देखते गायब हो गये? और राजधानी फिलहाल अद्भुत पेयजल संकट से जूझ रही है। क्या राज्य की जनता को नहीं पता कि कैसे राज्य के पार्कों पर मॉल बना दिये गये? क्या अब पार्कों में मॉल बनेंगे?

क्या सरकार बता सकती है कि मोमेंटम झारखण्ड में जो दावे किये गये थे, कौन-कौन से देश ने अब तक निवेश किये, उसकी क्या स्थिति है, सच्चाई तो यह है कि जो राज्य में चल रहे उद्योग हैं, वह भी बर्बाद होने के कगार पर हैं, और उसके जिम्मेवार है, यहां के नालायक अधिकारी, जो एक नंबर के कामचोर तथा राज्य की जनता के पैसों से अपनी पत्नी और बच्चों को विदेश का दौरा करवाते हैं।

हद तो तब हो गई, कि झारखण्ड सिविल सोसाइटी जैसी संस्थाएं लगातार चार साल से राज्य के प्रमुख मुद्दों को लेकर सड़कों पर उतरती रही, पर राज्य सरकार ने उसका संज्ञान तक नहीं लिया, क्या लोकतंत्र में सरकारें ऐसे चलती है कि जनता चिल्लाती रहे और जनाब राज्य के होनहार मुख्यमंत्री उनका संज्ञान नहीं लेंगे, तो फिर तो हो चुका।

ऐसे में झारखण्ड सिविल सोसाइटी के आरपी शाही ने ठीक ही कहा ‘बच के रहना झारखण्डवालों, अपने चौकीदारों से’। हालांकि सभी चौकीदार ऐसे नहीं होते, कुछ अपवाद भी हैं, पर कहा जाता है न कि जौ के साथ घुन भी पिसाता है, पर यहां तो जौ नहीं दिखता, चौकीदार का बैच लगाकर ज्यादा घुन ही दीख रहे हैं, जौ का तो नामोनिशां नहीं।

Krishna Bihari Mishra

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कुछ दिन पहले तक ऐसा प्रतीत हो रहा था कि झारखण्ड में भाजपा सरकार के खिलाफ जो नाराजगी है, कहीं लोकसभा चुनाव में उन्हें खाता खोलने में भी न मुश्किल हो जाये। विपक्षी पार्टियों की लामबंदी जिसमे कांग्रेस से वामपंथी सभी एक साथ दिख रहे थे, महागठबंधन का यह स्वरूप भाजपा विरोधी जमात की बड़ी एकता दिखाई पड़ती थी। भाजपा के लिए इस महागठबंधन की एका को भेदना मुश्किल था।

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