राजनीति

जनसंगठनों ने कहा खूंटी में बिना विशेष स्वतंत्र पर्यवेक्षक के भयमुक्त व निष्पक्ष चुुनाव कराना संभव नहीं

झारखण्ड जनाधिकार महासभा, आदिवासी अधिकार मंच, वीमेन अगेन्स्ट सेक्सुअल वायलेंस और WSS के संयुक्त तत्वावधान में एक प्रतिनिधिमंडल आज राज्य के मुख्य निर्वाची पदाधिकारी एल ख्यांग्ते से मिलकर एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में जो बाते उल्लेखित है, वह यह है कि इस प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि खूंटी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र में जो मतदाता है, उनके अंदर भय का माहौल है, जिसके कारण निष्पक्ष मतदान पर उसका असर पड़ना अवश्यम्भावी है, इसलिए वहां एक विशेष स्वतंत्र पर्यवेक्षक की आवश्यकता है, साथ ही जनमुद्दों पर गैरराजनीति चर्चाओं को बाधित करने की व्यवस्था की जाय।

ज्ञापन में कहा गया है कि पिछले कुछ महीनों में खूंटी उसके आसपास जिलों के अनेक गांवों में पत्थलगड़ी का आयोजन किया गया है, पत्थलगड़ी आदिवासियों के पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था एवं पांचवी अनुसूची पेसा कानून के संवैधानिक प्रावधानों पर आधारित है, लेकिन 2018 से ऐसे अनेक गांवों में स्थानीय प्रशासन सुरक्षा बलों द्वारा लोगों पर दमन किया गया है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं जनसंगठनों जैसे झारखण्ड जनाधिकार महासभा, पीपुल्स यूनियन फोर सिविल लिबर्टीज, डब्लयूएसएस, आदिवासी अधिकार मंच द्वारा स्थिति का अन्वेषण किया गया और इन गांवों में मानवाधिकारों का व्यापक उल्लंघन पाया गया।

वहां देखा गया कि कई स्कूलों को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया, कम से कम 150 नामद हजारों अज्ञात ग्रामीणों पर उकसाने, सरकारी काम में बाधा पहुंचाने, सार्वजनिक उपद्रव एवं देशद्रोह जैसे आरोपों के अंतर्गत फर्जी प्राथमिकी दायर किये गये है, गांवों में सुरक्षा बलों द्वारा लगातार छापेमारी और बेबुनियाद गिरफ्तारी के कारण लोगों में भय का माहौल है, अनेक ग्रामीण इस डर के कारण अपने गांव छोड़ दिये हैं, स्थानीय प्रशासन ने तो राज्य के बीस सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों पत्रकारों पर भी देशद्रोह का फर्जी केस दायर कर दिया है, क्योंकि उन्होंने खूंटी में हो रहे दमन के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी की।

इन्हीं सभी कारणों से क्षेत्र में भय और आतंक का माहौल है, लोग अपनी बातों और समस्याओं को खुलकर बोलने से बच रहे हैं, यह भी अत्यंत चिन्ताजनक है कि मुंडा समाज, जिनका साप्ताहिक पारम्परिक ग्राम सभाओं के बैठक का इतिहास है, आजकल वो बैठकें भी नहीं हो पा रही, जो एक जीवन्त लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। नागरिक अपनी बातों को खुलकर रख सकें, एवं बिना किसी भय के मतदान कर सकें, वह स्थिति अभी फिलहाल खूंटी में नहीं दिखती, खूंटी की वर्तमान स्थिति स्वतंत्र निष्पक्ष चुनाव के अनुकूल नहीं है।

प्रतिनिधिमंडल का कहना है कि पूरे राज्य में स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा चुनाव आचार संहिता के नाम पर लोगों को उनके मुद्दों समस्याओं पर चर्चा करने से रोका जा रहा है, हालांकि आचार संहिता राजनीतिक दलों पर लागू होती है, कि नागरिकों पर। इसका गलत प्रयोग नागरिकों की गैर राजनीतिक बैठकों को रोकने के लिए किया जा रहा है, हाल में झारखण्ड जनाधिकार महासभा के कुछ सदस्यों को बिशुनपुरा थाने में नजरबंद कर दिया गया था और उनके द्वारा भोजन के अधिकार के मुद्दों पर आयोजित गैर राजनैतिक जनसभा को रोक दिया गया, पुलिस प्रशासन द्वारा आचार संहिता जिले में 144 धारा लागू होने का ब्यौरा दिया गया, लेकिन नजरबंद किये गये व्यक्तियों से अभी तक वे धारा 144 लागू करने की अधिसूचना साझा नहीं किये हैं।

ऐसा प्रतीत होता है कि आचार संहिता लागू  होने के साथसाथ धारा 144 का भी प्रचलन बन गया है, यह चिन्ताजनक है, चुनाव के समय धारा 144 का इस्तेमाल लोगों को उनके मुद्दों पर चर्चा (गैरराजनैतिक बैठकों में) करने से रोकने के लिए किया जा रहा है, एक जीवन्त लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक है कि चुनावी मौसम में लोग बिना रोकटोक के बैठक कर सकें और जनमुद्दों पर स्वतंत्र रुप से चर्चा कर सकें।

प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि खूंटी लोकसभा की असाधारण परिस्थिति को देखते हुए इस क्षेत्र में चुनाव विशेष स्वतंत्र पर्यवेक्षक के निरीक्षण में करवाया जाये, चुनाव के दौरान दर्ज फर्जी प्राथमिकियों के आधार पर लोगों को गिरफ्तार किया जाये, चुनाव कार्य को संपन्न कराने में लगे सुरक्षा बलों और प्रशासन द्वारा दमन पर रोक लगाई जाये, ताकि जो ग्रामीण घर छोड़कर बाहर चले गये हैं, वे वापस सकें और मतदान कार्य में भाग ले सकें।

प्रतिनिधिमंडल ने यह भी मांग की कि जिला प्रशासन को निर्देश दिया जाये कि वे लोगों को आचार संहिता के विषय में गलत जानकारी दें, तथा आचार संहिता की आड़ में धारा 144 का बेवजह प्रयोग करें, जिन जिलों में धारा 144 लागू की गई हैं, उसे वापस लिया जाये ताकि आम जनता जनमुद्दों पर खुलकर आपस में चर्चा कर सकें।