झारखण्ड में यौन शोषणकर्ताओं को ही बचाने में लगे हैं राज्य के वरीय पुलिस अधिकारी

राज्य में कोई भी महिला पुलिसकर्मी सुरक्षित नहीं हैं, आये दिन महिला पुलिसकर्मियों के यौन शोषण का समाचार झारखण्ड के अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं, पर जो यौन शोषणकर्ता हैं, उन पर कार्रवाई नहीं होती, बल्कि उन्हें शानदार ढंग से बचा लिया जाता है, यहीं नहीं उन्हें हर प्रकार की सुविधा भी दे दी जाती हैं, ताजा मामला जामताड़ा का हैं, जहां एक ईमानदार पुलिस पदाधिकारी सुमन गुप्ता तीन महिला आरक्षियों के सम्मान के लिए चट्टान की भांति खड़ी हैं,

राज्य में कोई भी महिला पुलिसकर्मी सुरक्षित नहीं हैं, आये दिन महिला पुलिसकर्मियों के यौन शोषण का समाचार झारखण्ड के अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं, पर जो यौन शोषणकर्ता हैं, उन पर कार्रवाई नहीं होती, बल्कि उन्हें शानदार ढंग से बचा लिया जाता है, यहीं नहीं उन्हें हर प्रकार की सुविधा भी दे दी जाती हैं, ताजा मामला जामताड़ा का हैं, जहां एक ईमानदार पुलिस पदाधिकारी सुमन गुप्ता तीन महिला आरक्षियों के सम्मान के लिए चट्टान की भांति खड़ी हैं, वहीं राज्य के पुलिस महानिदेशक डी के पांडेय ने यौन शोषणकर्ता को बचा लिया तथा उन तीन महिला आरक्षियों, जिन्होंने यौन शोषण का आरोप लगाया था, उन्हें ही कटघरे में खड़ा कर दिया। ऐसा एक मामला नहीं हैं, अनेक मामला हैं, जहां महिला पुलिसकर्मियों को न्याय नहीं मिलता, बल्कि जहां इस प्रकार का मामला उठता हैं, उसे दबाने का प्रयास किया जाता हैं, जिससे इस घटना में शामिल लोगों का मनोबल बढ़ जाता है।

ताजा मामला जामताड़ा का है, जहां की तीन महिला पुलिसकर्मियों ने वहां के प्रभारी सार्जेंट मेजर और रीडर पर यौन शौषण का आरोप लगाया, जब ये मामला आइजी सुमन गुप्ता के समक्ष आया, तब उन्होंने इस मामले का संज्ञान लेते हुए, दोनों को निलंबित कर दिया था, पर पुलिस महानिदेशक ने इन दोनों को दोष मुक्त करार दे दिया। बताया जाता है कि इन तीन महिला पुलिसकर्मियों ने जब उनका यौन शौषण हुआ तब इसकी शिकायत राज्य के मुख्यमंत्री, पुलिस महानिदेशक तथा अन्य वरीय पदाधिकारियों से की थी, पर जब किसी से न्याय नहीं मिला तब इन तीनों महिला आरक्षियों ने सुमन गुप्ता के कार्यालय में जाकर गुहार लगाया और अपने सम्मान की रक्षा की मांग की और फिर यहां से शुरु हुआ, राज्य में फैले कुख्यात कुकर्मियों का गंदा खेल, जिसमें इन तीन महिला आरक्षी पीसती जा रही हैं, पर उन्हें अपने आइजी सुमन गुप्ता पर पुरा भरोसा है कि वह न्याय दिला कर रहेंगी, इन तीनों महिला आरक्षियों का उन पर अडिग विश्वास ही उनके हौसले को उम्मीदें प्रदान कर रहा हैं।

सूत्र बताते है कि 5 दिसम्बर 2017 को जामताड़ा जिला बल की महिला आरक्षी पूनम कुमारी, पिंकी कुमारी और महिला हवलदार राजकुमारी सुमन गुप्ता से मिलकर, अपनी व्यथा सुनाई थी, जिसमें तीनों ने प्रभारी परिचारी प्रवर अशोक कुमार और आरक्षी शशिकांत कुशवाहा के खिलाफ यौन शोषण का आरोप लगाया था। सुमन गुप्ता ने तुरंत इस पूरे मामले की जांच कराई और पाया कि इन तीनों के साथ यौन शोषण हुआ और उसी वक्त इन दोनों को तत्काल प्रभाव से 6 दिसम्बर 2017 को निलंबित कर दिया गया।

इस पूरे मामले पर सुमन गुप्ता ने बहुत सारे सवाल भी उठाये हैं और ऐसे लोगों की घिग्घी बंद कर दी, जो इस मामले को दबाने का प्रयास कर रहे हैं। सवाल 1. द सेक्सूयल हरासमेंट आफ वीमेन एट वर्कपैलेस (प्रीवेन्शन, प्रोहिविशन एंड रिड्रसल) एक्ट 2013 के प्रावधानों के तहत जामताड़ा जिले में इंटरनल कमिटि का गठन क्यों नही किया गया था? 2. पुलिस अधीक्षक जामताड़ा जया रॉय को घटना की सूचना दिये जाने के बावजूद भी तत्काल इस कमिटि का गठन क्यों नहीं किया गया? 3. महिला पुलिसकर्मियों पर कई महीनों से हो रहे यौन उत्पीड़न के अपराध को सहन करते हुए दोनों प्रतिवादियों को संरक्षण क्यों दिया जाता रहा? 4. धारा 12(1)(ए) के प्रावधानों के तहत इन प्रतिवादियों को अपने कर्तव्यस्थल से अन्यत्र स्थानान्तरण कर विधि अनुरुप जांच प्रारंभ क्यों नहीं किया गया? 5. धारा 4(2)(ए) के विरुद्ध पुरुष पदाधिकारी, अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी जामताड़ा को प्रारंभिक जांच का जिम्मा क्यों सौंपा गया? 6. पीड़ित महिला पुलिसकर्मियों का मौखिक एवं  लिखित बयान लेने के उपरांत लंबी अवधि बीत जाने के बावजूद एसडीओ जामताड़ा ने जांच प्रतिवेदन समर्पित क्यों नहीं किया, जिस कारण प्रतिवादी स्वतंत्र एवं मुक्त होकर पीड़ित महिला पुलिसकर्मी विवश एवं शर्मसार होकर परिस्थितियों के साथ समझौता कर कार्य करती रही? पर इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं।

सच्चाई यह है कि इन तीनों महिला आरक्षियों ने जो घिनौने आरोप लगाये है, हम उसे इस समाचार में स्थान नहीं दे सकते, फिर भी इन महिला आरक्षियों की बात नहीं सुनना, तथा जिन पर आरोप लगे, उन्हें बचाने के लिए नीचे से लेकर उपर तक के अधिकारी, यहां तक की सीएमओ की भी चुप्पी लगा जाना, बहुत कुछ कह देता है, जबकि इन तीनों महिला आरक्षियों ने सीएम से भी गुहार लगायी। सुत्र बताते है कि पुलिस अधीक्षक जामताड़ा ने शुरु से ही प्रतिवादियों को बचाने की कोशिश प्रारंभ की, जिसके कारण इन तीनों महिला आरक्षियों को सुमन गुप्ता के पास जाना पड़ा और जब सुमन गुप्ता ने एक्शन लिया तब जाकर सभी के हाथ-पावं फूलने प्रारंभ हुए और इस मामले को दबाने तथा आरोपियों को बचाने के लिए युद्धस्तर तक कार्य प्रारंभ हुआ।

जरा कमाल देखिये, 6 दिसम्बर को आइजी सुमन गुप्ता ने दोनों आरोपियों को निलंबित किया और उसी दिन जामताड़ा एसपी खुद के नेतृत्व में जांच के लिए आंतरिक कमिटी का गठन कर लेती है, इस कमिटि की प्रजाइडिंग आफिसर खुद बन जाती है, एसडीपीओ पूज्य प्रकाश और महिला थाना प्रभारी विजया कुजूर को कमिटि का सदस्य बना लेती है और फिर ये कमिटी ही उन दोनों आरोपियों को क्लीन चिट दे देती हैं और इस रिपोर्ट को पुलिस मुख्यालय भेजकर पुलिस महानिदेशक से इसका अनुमोदन करा लिया जाता है।

जबकि होना यह चाहिए कि आंतरिक शिकायत कमेटी में प्रजाइडिंग आफिसर एक, सदस्य – दो एवं एक सदस्य गैर सरकारी संस्थान का, जो महिलाओं के लिए प्रतिबद्ध हो अथवा यौन उत्पीड़न के मुद्दों से परिचित हो, को बनाया जाना चाहिए था, किन्तु अपने ही अधीनस्थ दो कर्मियों को सदस्य बनाकर एसपी जामताड़ा ने कार्य की इतिश्री कर दी, जो सर्वथा, गैर कानूनी एवं अन्याय को बढ़ावा देनेवाला है।

कमाल है, जिन तीन महिला आरक्षियों ने यौन शौषण का आरोप लगाया था, उनमें से एक पर झूठा मुकदमा भी दायर कर दिया गया, यानी उस पर मुकदमे दायर कर उसे मानसिक प्रताड़ना देने का भी खुब प्रबंध किया गया, जबकि शिकायत दर्ज करानेवाली महिला ने अज्ञात का नाम दिया था, बाद में उसने यह भी स्वीकार कर लिया कि उसने जो शिकायत दर्ज कराई है, वह अपनी शिकायत वापस लेती हैं, क्योंकि जो पैसे चोरी हो जाने का वह शिकायत दर्ज कराई थी, वह उसे घर पर मिल गये, अब जरा सोचिये, चोरी का मामला 18 नवम्बर को सामने आता है, 19 नवम्बर को थाना प्रभारी की रिपोर्ट को साइबर क्राइम डीएसपी ने एसपी के पास अनुशंसा कर दी, 20 नवम्बर को महिला आरक्षी को निलंबित भी कर दिया गया, ऐसे में 20 नवम्बर को हर  हाल में प्राथमिकी दर्ज हो जानी चाहिए, पर प्राथमिकी दर्ज होती है 29 नवम्बर को, वह भी अज्ञात महिला के नाम पर, जबकि इसी आरोप में महिला आरक्षी को निलंबित भी कर दिया गया, आखिर ये क्या मामला हैं, इससे तो स्पष्ट होता है कि राज्य में अगर कोई भी वरीय अधिकारी किसी भी महिला का यौन शोषण करता है, तो उक्त महिला को उसके खिलाफ बोलने का कोई अधिकार ही नहीं, अगर वह बोलने की कोशिश करेगी, तो उसे ऐसा परेशान कर दिया जायेगा, फिर कहीं की ही नहीं रहेगी, और जिस राज्य में जब महिला पुलिस ही अपने पुलिस थाने में या वरीय पुलिस पदाधिकारी कार्यालय में सुरक्षित नहीं तो फिर सामान्य महिलाओ के सम्मान की रक्षा की बात तो यहां बेमानी है।

Krishna Bihari Mishra

2 thoughts on “झारखण्ड में यौन शोषणकर्ताओं को ही बचाने में लगे हैं राज्य के वरीय पुलिस अधिकारी

  1. अपराधी बचाओ,
    अन्याय कराओ..अभियान का हिस्सा है..दुखद किंतु सत्य।।

  2. This incident is really painful and a great slap on system who are responsible for this act, even a working women are not safe at workplace then how can one commit a false promise of fearless society for girls and women in the state and country. Headsoff to I.G Mrs Suman Gupta and those three sufferer ladies who are fighting with the corrupt system and standing alone in the mid of hippos …May god be with you always and my best wishes are always with you.

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