रांची में कोयला चोरों-तस्करों के लिए स्वर्ग बना केतारीबगान से पावर हाउस रेल गुमटी का इलाका, रेल पुलिस मौन

आज से एक-दो साल पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी, अब रांची बदल रहा है, यहां भी अब वो सारे नजारे देखने को मिल रहे हैं, जो नजारे यहां कभी दिखाई नहीं देते थे, पहले केवल आसनसोल पैसेंजर के रांची पहुंचने पर यह दृश्य दिखाई देता था, पर अब तो यह दृश्य उन सारे ट्रेनों में देखने को मिल रहा हैं, जो धनबाद-चंद्रपुरा से होकर आते हैं।

आज से एक-दो साल पहले तक ऐसी स्थिति नहीं थी, अब रांची बदल रहा है, यहां भी अब वो सारे नजारे देखने को मिल रहे हैं, जो नजारे यहां कभी दिखाई नहीं देते थे, पहले केवल आसनसोल पैसेंजर के रांची पहुंचने पर यह दृश्य दिखाई देता था, पर अब तो यह दृश्य उन सारे ट्रेनों में देखने को मिल रहा हैं, जो धनबाद-चंद्रपुरा से होकर आते हैं।

हम आपको जो दृश्य दिखा रहे हैं, यह दृश्य कल यानी बुधवार का है, जब धनबाद की ओर से आनेवाली इंटरसिटी एक्सप्रेस रांची जंक्शन पहुंच रही थी, इस ट्रेन से भी बड़ी संख्या में कोयले की बड़ी-बड़ी बोरियां कोयला तस्करों द्वारा स्टेशन पर लगने के पूर्व ही केतारीबागान से लेकर लेकर पावर हाउस रेल गुमटी तक उतारी गई और कोई कुछ बोल नहीं रहा, चुपचाप इन गैर-कानूनी  हरकतों को देख रहा हैं।

कमाल है, ये कोयला चोर व तस्करों का समूह, जैसे ही आसनसोल पैसेंजर, धनबाद-रांची इंटरसिटी एक्सप्रेस आदि ट्रेनों को रांची स्टेशन पर लगते हुए देखता है, वह स्टेशन पर लगने के पूर्व ही केतारीबगान से लेकर पावर हाउस रेल गुमटी तक सक्रिय हो जाते हैं और धरा-धर पटरियों पर गिरे कोयले की बोरियों को वे पांच मिनट के अंदर ठिकाने लगा देते हैं।

ये कोयला चोर-तस्कर, अपने साथ कभी टेम्पू तो कभी रिक्शे लाकर पावर हाउस रेलवे गुमटी के उत्तरी छोर पर लगाए रखते हैं, जहां पटरियों पर गिरे कोयले के बोरियों को इनके लोग उठा-उठाकर रिक्शे पर लादते और चलते बनते हैं, इन्हें किसी का डर भी नही रहता, वे बातचीत के क्रम में कहते है कि डर काहे का, हम इस काम के लिए उन सब को हिस्से देते हैं, जो इसमें सहयोग करते हैं।

स्थानीय लोगों के कथनानुसार, पूर्व में ऐसी स्थिति नहीं थी, इधर देखने में आ रहा है कि तस्वीरें बदलती जा रही हैं, अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई, तो एक तो इससे रेलवे ट्रेक प्रभावित होगा, अपराध का ग्राफ बढ़ेगा, यहां के लोगों को कठिनाइयां बढ़ेंगी, तथा गलत करनेवालों की संख्या में वृद्धि होने से सामाजिक ढांचा प्रभावित होगा, इसलिए इस पर रोक लगनी ही चाहिए, पर रोक लगायेगा कौन? जिन्हें रोक लगाना हैं, उन्हें पता नहीं किस बात का भय होता हैं, वे आराम से इस गलत परम्परा को प्रश्रय दे रहे हैं, जिसकी जितनी आलोचना की जाय कम है।

Krishna Bihari Mishra

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