अखबार पढ़कर अगर आप हरितालिका तीज मना रहे हैं तो सावधान हो जाइये…

अगर आपने रांची से प्रकाशित हिन्दी दैनिक प्रभात खबर पढ़कर हरितालिका तीज मनाने का निश्चय किया हैं तो जितना जल्द हो सके, इससे आप उबर जाये, क्योंकि इसने जो आपको जानकारी दी हैं, वह पूर्णतया गलत है, धर्मविरुद्ध है। इस अखबार में, जिन्होंने जानकारी दी है, या जिनके द्वारा हरितालिका तीज के बारे में बताया गया हैं, उन्हें दरअसल हरितालिका तीज के बारे में जानकारी ही नहीं हैं।

अगर आपने रांची से प्रकाशित हिन्दी दैनिक प्रभात खबर पढ़कर हरितालिका तीज मनाने का निश्चय किया हैं तो जितना जल्द हो सके, इससे आप उबर जाये, क्योंकि इसने जो आपको जानकारी दी हैं, वह पूर्णतया गलत है, धर्मविरुद्ध है। इस अखबार में, जिन्होंने जानकारी दी है, या जिनके द्वारा हरितालिका तीज के बारे में बताया गया हैं, उन्हें दरअसल हरितालिका तीज के बारे में जानकारी ही नहीं हैं।

दरअसल हमारे देश/राज्य में माना जाता है कि जिसने, जटा-जूट बढ़ा लिये, दाढ़ी बढ़वा ली, गेरुआ धारण कर लिया, लाल रंग का मस्तक पर टीका लगा लिया, थोड़ी बहुत ज्योतिष की जानकारी प्राप्त कर ली, बस वो महाविद्वान हो गया, उनकी नजर में विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में पठन-पाठन में रुचि ले रहे विद्वानों का समूह एक नंबर का महामूर्ख हैं, इसलिए ये अखबारों के संवाददाता इन विद्वानों के पास न पहुंचकर, उनके पास पहुंचते हैं, जिनके पास जानकारी का घोर अभाव हैं, वह भी तब जबकि आज के युग में विद्वानों और विद्वता के सारे विकल्प खूले हैं।

जरा देखिये, आज का ही अखबार पढ़िये। अखबार पूजा का उत्तम समय बता रहा हैं। अखबार डा. सुनील बर्मन के हवाले से कहता है कि मंगलवार को तृतीया लग जायेगी, यह बुधवार शाम 6.38 तक रहेगी, रवियोग भी मिल रहा है, चित्रा नक्षत्र पूरी रात, अगली सुबह 4.45 तक है। नक्षत्र सारा दिन सारी रात मिल रहा है, जबकि तृतीया तिथि संध्याकाल पर्यंन्त ही हैं। अतः सुहागिनों को यह पूजा संध्या 6.38 के पहले कर लेना चाहिए।

डा.सत्य नारायण पांडेय, (अवकाश प्राप्त) संस्कृत विभागाध्यक्ष, चाईबासा, कोल्हान विश्वविद्यालय के अनुसार, हरितालिका तीज व्रत में चित्रा नक्षत्र का कोई विधान ही नहीं हैं, इसमें अगर नक्षत्र की बात करनी भी हैं तो सिर्फ और सिर्फ हस्त नक्षत्र की, क्योंकि महाशक्ति पार्वती ने इस व्रत को हस्तनक्षत्र युक्त तृतीया तिथि में संपन्न किया था। इस व्रत को संध्या काल में करने का विधान ही नहीं हैं, यह व्रत रात्रि में जागते हुए, भगवान शिव और पार्वती को आराधना करने की हैं, प्रसन्न करने की है, जैसा पार्वती ने किया, पर चूंकि अब लोग आधुनिक होने लगे हैं, और आधुनिकता में बह रहे हैं, इसलिए न तो वे व्रत करते हैं और न ही उनकी व्रत की कोई महत्ता ही मालूम हैं। व्रत को परम्परागत व उसके मूल्य-सिद्धांतों को धारण करते हुए किया जाय तो फिर क्या कहने।

डा. सत्य नारायण पांडेय का कहना है कि चूंकि 12 सितम्बर को तृतीया तिथि में सूर्योदय हो गया, तो वह पूरा दिन-रात तृतीया तिथि ही मानी जायेगी, चाहे वह तृतीया तिथि, उसी दिन संध्या में महावीर पंचाग के अनुसार 6.38 में ही क्यों न समाप्त हो जाये, चूंकि 12 सितम्बर को हस्तनक्षत्र है ही नहीं, इसलिए किसी नक्षत्र की बात ही नहीं करनी है, क्योंकि हरितालिका तीज को चित्रा नक्षत्र से कोई लेना देना नहीं हैं, चाहे वह पूरी दिन या पूरा रात ही क्यों न हो, अगर नक्षत्र हस्त रहता तो बात कुछ और होती, चूंकि समय और काल की गणना के कारण, कभी तृतीया तिथि में हस्त नक्षत्र आ जाता हैं और कभी नहीं आ पाता, पर चूंकि तृतीया तिथि 12 सितम्बर को हैं, और उसमें सूर्योदय हो चुका तो पूरा दिन  हरितालिका तीज के लिए ग्राह्य हैं।

धर्मशास्त्र कहता है – भाद्रे मासि सिते पक्षे तृतीयाहस्त संयुते। तदनुष्ठानमात्रेण सर्वपापात् प्रमुच्यते। अर्थात् भाद्रपद मास में हस्तनक्षत्र से युक्त शुक्ल तृतीया को उसका अनुष्ठान मात्र करने से स्त्रियां सभी पापों से मुक्त हो जाती हैं।

शिव पार्वती से कहते है – भाद्रपदशुक्ल  तृतीयायां त्वमर्चन्ती तु हस्तभे। तत्र वाद्येन गीतेन रात्रौ जागरणं कृतम्।। अर्थात् हे पार्वती, जब भाद्रपद शुक्लपक्ष की हस्तयुक्त तृतीया तिथि प्राप्त हुई, तब तुमने मेरा विधिवित पूजन किया, और रातभर जागकर गीतवाद्यादि से मुझे प्रसन्न करने में बिताया।

Krishna Bihari Mishra

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