मैं अछूत हूं!

कोई अखबार मेरा आर्टिकल छापेगा तो आप उसे विज्ञापन देना बंद कर दोगे, कोई मुझे थोड़ा पढ़ाने का समय देगा तो आप उस पर भी रोक लगा दोगे, ये कैसी तुम्हारी गंदी सोच हैं भाई। मुझे तुम्हारी इस गंदी सोच पर दया आती है। पूरे झारखण्ड को तुमने तालिबान बनाकर रख दिया है। तुम्हें जो करना हैं करो, पर मैं तुम्हें बता देता हूं कि मैं तुम्हारी इस हरकत से न तो परेशान होनेवाला हूं और न ही डरनेवाला और न ही विचलित होनेवाला हूं। 

जब मैं छोटा था। स्कूलों में पढ़ता था, तो बराबर बताया जाता कि तुम्हें हर हालात में सत्य पर चलना है, चाहे कितना भी कष्ट क्यों न आये? उस वक्त टीवी का जमाना नहीं था, ले-देकर रेडियो ही था। उसमें भी आवाज को लेकर बराबर चिक-चिक, वायरलेस की तार का जुगार किया जाता, तब जाकर रेडियों से कुछ आवाज सुनाई पड़ती। विविध भारती से नाना प्रकार के कार्यक्रम आते, वहीं आकाशवाणी से बाल मंडली का बराबर प्रसारण होता। हमें याद है कि रविवार के दिन प्रातः 9 बजे, किसान भाइयों के लिए कृषि जगत से संबंधित चौपाल में बुधवार को सायं 6.30 बजे बच्चों का कार्यक्रम सप्ताह में  एक बार अवश्य प्रसारित होता। जिसे सुनकर मैं बड़ा हुआ।

उस वक्त पटना से प्रकाशित “हिन्दुस्तान” और “आर्यावर्त” समाचार पत्र में बच्चों के लिए विशेष कोना मौजूद रहता, जबकि बाबुजी घऱ में “बाल भारती” पत्रिका का प्रबंध कर देते। घर में “नंदन”, “पराग” और “चंपक” की भी धूम रहती।  कभी दानापुर से ब्यापुर जाना रहता, तो ब्यापुर में अपने पंचानन भैया के एक विशेष कक्ष में “साप्ताहिक हिन्दुस्तान” और “धर्मयुग” की पुरानी पत्रिका को खोज निकालता तथा इसमें उद्धृत पठनीय आलेखों को अपने मस्तिष्क में संग्रह कर लेता।

बाल मंडली में बार–बार बजते “गंगा जमना” फिल्म के गाने “इंसाफ की डगर पे, बच्चो दिखाओं चल के, यह देश हैं तुम्हारा नेता तुम्ही हो कल के” जब भी सुनाई पड़ता, हमारे रोंगटे खड़े हो जाते। उसका एक अंतरा हमें और प्रभावित करता ”अपने  हो या पराये, सबके लिए हो न्याय, देखो कदम तुम्हारा हर्गिज न डगमगाए, रस्ते बड़े कठिन हैं चलना संभल, संभल के”। घर में मां-बाबुजी भी अनुशासन के मामले में बहुत ही कड़े, थोड़ी गड़बड़ी हुई कि मां-बाबुजी पहुंच गये, स्कूल। लीजिये स्कूल में भी ठुकाई सुनिश्चित। ये वो जमाना था, जब टीचर बच्चों को पीटकर हाथ-पैर भी तोड़ दें तो कोई अभिभावक ये नहीं बोलने जाता था कि आपने मेरे बच्चों को क्यों ऐसा मारा कि उसके हाथ – पैर टूट गये।

टीचर भी ऐसे कि बच्चों से इतना प्यार कि क्या मजाल कोई बच्चा टीचर की बातों का या उनकी मार का बुरा मान जाये। एक दिन हमारी तबियत खराब हो गई। राम प्रसाद यादव मास्टर साहेब ने बच्चों से क्लास में पूछा कि अरे पंडित जी, दिखाई नहीं पड़ रहे। तभी हमारे सहपाठी ने जवाब दिया कि मेरा तबियत खराब है। लीजिये राम प्रसाद यादव मास्टर साहेब, हमारे घर पहुंच गये, सभी लोग आवभगत में मास्टर साहेब के लग गये। मेरा पूरा बदन बुखार से जल रहा था, चेहरा सुखा हुआ था और वे सिरहाने बैठ गये, सर सहलाने लगे, पूछने लगे कि किस डाक्टर से इसका इलाज चल रहा है? डाक्टर क्या बताया? और फिर कुछ घंटे रहने के बाद अपने घर चले गये।

हमारे घर में डा. डी राम का आना-जाना बराबर बना रहता था। घर में किसी की तबियत खराब हुई कि डा. डी राम आ गये। बड़े ही नेक दिल, इंसान, केवल एक ही काम, लोगों की, मानवता की सेवा करना। अब तो ऐसे न डाक्टर दिखाई पड़ते हैं और न ही शिक्षक। होगा भी कैसे, आर्थिक युग में मानवता कहां। सभी प्रोफेशनल जो हो चुके।

पत्रकारिता में भी कई धुरंधरों से मिला, जिन्होंने मेरी पत्रकारिता को, मेरी ईमानदारी को पंख लगाये। जैसे रविशंकर, रत्ना पुरकायस्था, ज्ञानेन्द्र नाथ, गुंजन सिन्हा, गंगेश गुंजन आदि। इन लोगों ने जब भी मेरी पत्रकारिता में बाधाएं आयी, उसे दूर करने में प्रमुख भूमिका निभाई।

ऐसे माहौल में, मैं बड़ा हुआ। अब जो हालात है। मैं 50 साल को पार कर गया हूं। सत्य को छोड़ नहीं सकता। भ्रष्टाचारियों से समझौता कर नहीं सकता। जहां काम करता हूं, वहां बहुत ही कम दिन टिक पाता हूं, क्योंकि जो आजकल का नया कल्चर विकसित हुआ हैं, उसमें मैं अनफिट हो गया हूं। आकस्मिक उद्घोषक के रुप में आकाशवाणी पटना को भी सेवा दे चुका हूं। पटना से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक आज, दैनिक आर्यावर्त, दैनिक प्रभात खबर को अवैतनिक संवाददाता के रुप में अपनी सेवा दे चुका हूं। दैनिक जागरण, ईटीवी, मौर्य टीवी, न्यूज11, कशिश टीवी, जीटीवी आदि में भी सेवा दे चुका हूं। झारखण्ड सरकार के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को आउटसोर्सिंग के रुप में सेवा दे चुका हूं, और इतनी जगहों पर सेवा देने के बावजूद भी मैं अपनी नजर से नहीं गिरा हूं। यह मेरे लिए गर्व की बात है, पर इन दिनों जो मेरे और मेरे साथ किसी न किसी रुप में जो लोग जुड़े हैं, उनके साथ जो राज्य सरकार अन्याय कर रही है, उससे मेरा मन बहुत ही क्षुब्ध हैं। ऐसे में, मैं सोचता हूं कि क्या मैं अछूत हूं? क्या मुझे सत्य नहीं बोलना चाहिए?  क्या मुझे इस सरकार की बेकार की फिजूल बातों का समर्थन करना चाहिए?  उनका गुणगान करना चाहिए, जैसा कि झारखण्ड की सारी अखबारें व चैनल कर रहे हैं। ऐसा हमसे किसी जिंदगी में नहीं होगा, क्योंकि गलत को गलत कहना और सही को सही कहना ही तो, पत्रकारिता का मूल धर्म है और जब मैं इस धर्म को छोड़ता हूं तो मैं किसी के साथ अन्याय कर रहा हूं या नहीं, ये बाते उतनी हमारे लिए महत्वपूर्ण नहीं रखती, जितना यह कि यह मैं स्वयं अपने उपर अन्याय कर रहा हूं। ऐसा करने पर, मैं स्वयं अपनी नजरों से गिर जाऊंगा और यह मैं होने नहीं दूंगा।

जरा देखिये, इस रघुवर सरकार और उसके अधिकारियों ने किस प्रकार की घिनौनी हरकतें, हमारे और हमको चाहनेवालों के साथ करनी शुरु कर दी है।

  1. आइपीआरडी मीडिया नाम से व्हाटसअप ग्रुप हैं जिसमें मैं भी था, उस आइपीआरडी मीडिया व्हाटसअप ग्रुप से हमें बाहर किया गया। ये कृत्य मुख्यमंत्री के पीआरओ अजय नाथ झा ने किया। हमारी गलती यह थी कि हमने आइपीआरडी मीडिया व्हाटसअप ग्रुप में व्याप्त गड़बड़ियों को सभी के समक्ष रख दिया था।
  2. मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र से जुड़े एक बहुत ही प्यारे बच्चे ने कुछ फेसबुक पर अपना फोटो डाला, मैंने उस पर कमेंट्स किये, उस बच्चे ने उस कमेंट्स को लाइक किया, लीजिये सिर्फ हमारे कमेंट्स लाइक करने के कारण उसकी कलास लग गई।
  3. एक समाचार पत्र ने एक दिन हमारे आर्टिकल को अपने अखबार में थोड़ी जगह क्या दे दी? उस अखबार के मिलनेवाले विज्ञापन पर ही मुख्यमंत्री के चाहनेवालों ने रोक लगा दी। उस अखबार का दोष यह था, कि उसने मेरी आर्टिकल को अपने अखबार में जगह दी थी।
  4. मैं सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में एक बहुत ही प्रतिष्ठित और ईमानदार महिला अधिकारी से कभी-कभार मिलने जाता था, लीजिये मुख्यमंत्री के चाहनेवालों ने उक्त महिला अधिकारी का स्थानान्तरण दुमका करवा दिया। आरोप यह लगाया कि उक्त महिला अधिकारी, हमारे सम्पर्क में हैं।
  5. यहीं नहीं, जहां-जहां मैं काम करने जा रहा हूं, वहां भी ये लोग हमें काम करने नहीं दे रहे हैं, पहले से ही उन्हें बता दिया गया है कि इस व्यक्ति को वहां काम करने नहीं देना हैं, क्यों तो ये सरकार के खिलाफ काम करता हैं, ये नहीं कहा जा रहा हैं कि वह सत्य बोलता हैं। ताजा उदाहरण, रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता संस्थान की। जहां मैं गेस्ट फैकल्टी के रुप में दो दिन क्लास लिया और तीसरी क्लास लेने के पहले ही फोन आ गया कि हमें वहां जाने की जरुरत नहीं, बाद में हमें सूचना दे दी जायेगी कि आना है या नहीं।

मैं पूछता हूं कि रघुवर सरकार बतायें कि क्या मैं अछूत हूं?, मुझे यहां रहने का कोई अधिकार नहीं, कोई हमसे मिलेगा तो आप उस पर कार्रवाई कर दोगे, कोई अखबार मेरा आर्टिकल छापेगा तो आप उसे विज्ञापन देना बंद कर दोगे, कोई मुझे थोड़ा पढ़ाने का समय देगा तो आप उस पर भी रोक लगा दोगे, ये कैसी तुम्हारी गंदी सोच हैं भाई। मुझे तुम्हारी इस गंदी सोच पर दया आती है। पूरे झारखण्ड को तुमने तालिबान बनाकर रख दिया है। तुम्हें जो करना हैं करो, पर मैं तुम्हें बता देता हूं कि मैं तुम्हारी इस हरकत से न तो परेशान होनेवाला हूं और न ही डरनेवाला और न ही विचलित होनेवाला हूं।

Krishna Bihari Mishra

One thought on “मैं अछूत हूं!

  1. बहुत ही दुःखद,ऐसी निरंकुशता, मूढ़ता,कोई धृतराष्ट्र सरीखा ही करता है,जिसने पूरा साम्राज्य को चौपट कर दिया है,,खैर सत्य की परीक्षा सदियों से होती रही है,रहेगी,,आप बनें रहे,जित आपकी है।।

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रांची प्रेस क्लब का उद्घाटन, सत्ता पक्ष की पत्रकारों ने आरती उतारी और विपक्ष को दिखाया अंगूठा

Sat Sep 23 , 2017
आश्चर्य इस बात की भी कि जो लोग पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहने का ढिंढोरा पीटते हैं, जरा उन पत्रकारों और सत्तापक्ष के नेताओं से पूछिये कि जब कल आप रांची में प्रेस क्लब का उद्घाटन कर रहे थे, तो विपक्ष कहां था?  सीएम रघुवर दास और वहां बैठे उनके प्यारे दुलारे मंत्री सी पी सिंह, सांसद राम टहल चौधरी, पत्रकार बलबीर दत्त बताये कि क्या रांची में उन्हें विपक्ष का एक भी नेता नहीं मिला, जो इस खुबसुरत पल का साक्षी बन सकें।

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