घोर कलयुग है भाई, चीलम का धुआं, आंदोलन की आग को चुनौती दे रहा है

हेमन्त सोरेन ने आज सीएम रघुवर को अपने निशाने पर लिया और कह डाला घोर कलयुग है भाई, चीलम का धुआं, आंदोलन की आग को चुनौती दे रहा है। चोर शोर मचा रहा है और गुरु जी को ज्ञान दे रहा है। अपने पूंजीपति मित्रों के लिए भूमि कानून को बदल डाला, और बड़ी बेशर्मी से सीना तानकर विकास का बखान करता है और आंदोलनकारियों को गाली देता है।

हेमन्त सोरेन ने आज सीएम रघुवर को अपने निशाने पर लिया और कह डाला घोर कलयुग है भाई, चीलम का धुआं, आंदोलन की आग को चुनौती दे रहा है। चोर शोर मचा रहा है और गुरु जी को ज्ञान दे रहा है। अपने पूंजीपति मित्रों के लिए भूमि कानून को बदल डाला, और बड़ी बेशर्मी से सीना तानकर विकास का बखान करता है और आंदोलनकारियों को गाली देता है।

हेमन्त सोरेन ने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री कब कहां, क्या बोल देंगे? समझ नहीं आता, हमें लगता है कि लिट्टिपाड़ा, सिल्ली और गोमिया में हुई करारी हार की ये तिलमिलाहट है। उन्होंने कहा कि हाल ही में एक कार्यक्रम में सीएम रघुवर दास ने एक आईएएस के हवाले से कहा कि वे गरीबों के प्रति कितने उदार है और कैसे उनसे जुड़े है। आश्चर्य इस बात की, जब वही आईएएस जिला में पदस्थापित होता है और जनता जब अपना आक्रोश प्रकट करते हुए सीएम का जूते-चप्पल से स्वागत करती है तब वे उसी आईएएस को निलंबित भी कर देते है।

हेमन्त सोरेन ने कहा कि वे दावे के साथ कह सकते है कि यह सरकार भ्रष्टतम सरकारों में से एक है और ये भ्रष्टाचार की नई इतिहास को गढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि कोई दिन ऐसा नहीं होता, जब सीएम यहां के लोगों को नीचा दिखाने की बात न की हो, ये आदिवासियों को जमीन का लूटेरा और अपने व्यापारी मित्रों को विकास की संज्ञा दे देते है। उन्होंने कहा कि ये खुद कहते है कि स्कूल कॉलेजों के लिए जमीन का अधिग्रहण किया जायेगा, जबकि सच्चाई यह है कि रांची शहर में होटवार के पास की जमीन औने-पौने दाम पर व्यापारिक वर्ग को दे दी गई।

हेमन्त सोरेन ने कहा कि वे सीएम के विकास के दावे से आश्चर्यचकित है, ये बार-बार विकास को लेकर बहस की चुनौती देते हैं, जिसे वे कई बार स्वीकार किये, पर पता नहीं कब सीएम रघुवर स्थान और तिथि बहस के लिए मुकर्रर करेंगे। उन्होंने सीएम रघुवर से 12 सवाल भी पूछे…

  1. 1950-51 में सीएनटी-एसपीटी के अंतर्गत कितनी जमीन थी, और इस पर आज किसका कब्जा है? क्या जिन आदिवासियों को जमीनें थी, सरकार उन आदिवासियों को वो जमीनें दिलायेंगी?
  2. 1950-51 में आदिवासियों की आबादी 35% थी, आज 26% हैं, आखिर ये आदिवासी कहां गये? क्या इसके लिए सीएम रघुवर दास जैसे लोग जिम्मेवार नहीं है?
  3. अब तक कितनी सरकारी योजनाएं जमीन के अभाव में धरातल पर नहीं उतर सकी?
  4. सरकार श्वेत पत्र जारी करें कि लैंड बैंक में कितनी जमीनें है?
  5. सरकार श्वेत पत्र जारी करें कि मोमेंटम झारखण्ड के नाम पर कितनी कंपनियों को सरकारी जमीन, कितनी कीमत पर दी गयी?
  6. जब सरकार निजी कंपनियों को निजी जमीन दे सकती है तो सरकारी योजनाओं के लिए सरकारी जमीन का इस्तेमाल क्यों नहीं हो सकता?
  7. जब कंपनियां अपने व्यवसाय का लाभ कमायेंगे और उन्हें कौड़ी के भाव जमीन दे दी जायेगी और इधर सरकारी योजनाओं के लिए सामाजिक प्रभाव का आकलन किये बिना उनके जमीन का अधिग्रहण क्या सही हैं?
  8. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भूमि अधिग्रहण संशोधन 2013 में वापस ले लिया था तो क्या यह माना जाये कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी विकास विरोधी है?
  9. क्या रघुवर सरकार और भाजपा की पिछली सभी सरकारों को विकास योजनाओं को धरातल पर न उतार पाने के लिए दोषी माना जाये?
  10. क्या रघुवर सरकार विकास की योजनाएं जमीन पर नहीं उतार पा रही, इसलिए भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक लाई है?
  11. कृषि योग्य भूमि का अधिग्रहण हो जाने से किसानों और कृषि पर पडऩेवाले प्रभावों को राज्य सरकार कैसे पूरा करेगी?
  12. संताल परगना या कुछ इलाकों में, जहां रैयतों को जमीन खरीद-बिक्री करने का अधिकार नहीं है, वैसे रैयत भूमि अधिग्रहण से मिलनेवाली राशि का क्या करेंगे, क्या ऐसे में ये भूमिहीन नहीं हो जायेंगे?

Krishna Bihari Mishra

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