भारी अव्यवस्था, श्रद्धालुओं को परेशानी, न सुरक्षा की फिक्र, न कानून का भय, बोलो दुर्गा माता की जय

कल सप्तमी थी, मैंने सोचा चलो, पूरे परिवार के साथ चलते हैं, विभिन्न रांची की पूजा समितियों एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा किये गये बड़े-बड़े दावों तथा अखबारों एवं चैनलों में आ रहे समाचारों का स्वयं की आंखों से अवलोकन करते हैं, कि सचमुच पूरा रांची दुर्गामय हो गया है, भक्तिमय हो गया है कि वही ढाक के तीन पांत वाली हाल है।

कल सप्तमी थी, मैंने सोचा चलो, पूरे परिवार के साथ चलते हैं, विभिन्न रांची की पूजा समितियों एवं स्थानीय प्रशासन द्वारा किये गये बड़े-बड़े दावों तथा अखबारों एवं चैनलों में आ रहे समाचारों का स्वयं की आंखों से अवलोकन करते हैं, कि सचमुच पूरा रांची दुर्गामय हो गया है, भक्तिमय हो गया है कि वही ढाक के तीन पांत वाली हाल है।

हमने रांची रेलवे स्टेशन के पास बने पंडाल को देखने के बाद, वही से बैटरी पर चलनेवाली गाड़ी को लिया, जिसने प्रति व्यक्ति बीस रुपये लिए, और रेलवे स्टेशन से चर्च रोड लाकर उतार दिया। रास्ते में सामान्य सी भीड़ मिली, इसलिए चालक को ज्यादा देर नहीं लगी, चर्च रोड स्थित दूर्गा पंडाल तक लाने में। चर्च रोड स्थित पंडाल में भगवती के दर्शन किये और फिर अति प्राचीन काली मंदिर में स्थित मां काली का दर्शन किये, और चल दिये ओसीसी क्लब।

ओसीसी क्लब हमेशा की तरह, अतिविशिष्ट कलाकारियों के साथ जनता के समक्ष था, ओसीसी क्लब आते ही हमें लगा कि हम ओसीसी क्लब नहीं, बल्कि कैलाश मानसरोवर पहुंच गये हैं, कलाकारों द्वारा बनाये गये कृत्रिम हंसों का समूह अतिशय प्रिय लग रहे थे, मानसरोवर में मछलियों का झूंड भी था और उसमें निकलते कमल, मन को प्रसन्न कर रहे थे, यानी हंसों के समूहों के बीच अपने परिवार के साथ पंडाल में विराजित मां दुर्गा का सुंदर रुप देख, केवल हम ही नहीं बल्कि पंडाल में उपस्थित सभी लोग अपने मोबाइलों से इस सुंदर दृश्य को कैद करने को उतारु थे।

ओसीसी क्लब से निकलते ही, पुलिस आरक्षकों पर हमारी नजर पड़ी, जिसमें सभी अपने कार्यों को ईमानदारी पूर्वक अंजाम दे रहे थे, राजस्थान मित्र मंडल की ओर बढ़ते एक कांस्टेबल के साथ खड़े नये-नये दारोगा बने एक युवक से हमारी बातचीत हुई, उसका कहना था कि फिलहाल उसे जो कार्य मिला है, उसे वो निभा रहा है, कोशिश उसकी है, कि बेहतर सेवा दे सकें।

राजस्थान मित्र मंडल ने पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए, पर्यावरण को कोई नुकसान न पहुंचे, ऐसे वस्तुओं से दुर्गा पंडाल तथा प्रतिमा का निर्माण किया था, जैसा कि इसके आयोजक ध्वनिविस्तारक यंत्रों से यहां आ रहे श्रद्धालुओं को बता रहे थे, और फिर हम पहुंचे बकरी बाजार स्थित भारतीय युवक संघ। भारतीय युवक संघ हमेशा से ही स्वयं के द्वारा बनाये गये पंडालों के लिए पूरे रांची में चर्चित रहा है। यहां बंगलौर स्थित हरे राम हरे कृष्ण मंदिर का इस बार प्रारुप बनाया गया है, पर यहां उमड़ रही भीड़ और भारी अव्यवस्था ने हमें उद्वेलित किया।

हालांकि यहां बड़े पैमाने पर पुलिस व्यवस्था थी, जिसमें नये-नये दारोगा बने युवक तो आराम फरमाते नजर आये, जबकि एक एएसआई और कांस्टेबल को देखा कि वे दोनों भीड़ को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे थे, पर पूजा समिति के सदस्यों द्वारा कई बार सहयोग नहीं मिल पाने, कई बार भीड़ को नहीं नियंत्रित करने के कारण स्थिति भयावह हो रही थी, प्रवेश द्वार बहुत ही छोटा होने, तथा सीढ़ीनुमा व्यवस्था से उपर जाने और फिर नीचे उतरने की व्यवस्था इस प्रकार की गई थी, कि यहां भगदड़ मचना आसान था, पर लोगों की धैर्य की यहां सराहना करनी होगी, किसी ने जल्दबाजी नहीं दिखाई, और धीरे-धीरे उपर और फिर नीचे सीढ़ियों के माध्यम से ससरते रहे।

इसी जगह पर, कई बच्चें जो अपने माता-पिता की गोद में थे, उन बच्चों और उनके माता-पिता को ऐसा लगा कि इस भीड़ में आकर, उन्होंने बड़ी गलती कर दी, स्थिति बहुत ही खराब थी, लेकिन बकरी बाजार तो बकरी बाजार है, हमेशा चर्चा में रहता है, यहां लोग आते ही हैं। यहीं भाव, इन्हें यहां तक ले आया था, जब यहां स्थिति भयावह दिखी तो सभी के चेहरे देखने व पढ़ने लायक थे। सभी भगवान से यहीं मना रहे थे कि इस जगह से जितनी जल्दी हो सकें, निकल लिया जाये, तभी ध्वनिविस्तारक यंत्र से यह सुनने को मिला कि भारतीय युवक संघ के जो सदस्य, जिन्हें भीड़ को नियंत्रित करने के लिए लगाया गया है, वे इस ओर ध्यान दें, क्योंकि भीड़ बहुत बढ़ती जा रही हैं, जल्द ही इसका प्रभाव भी दिखा और पूजा समिति के सदस्य भीड़ को नियंत्रित करने में लग गये।

इसके बाद हमलोग बढ़ चले शक्तिश्रोत संघ और फिर इसके बाद सत्य अमर लोक। सत्य अमर लोक आकर लगा कि हम किसी बुद्धिस्ट स्थान पर पहुंच गये, सामने भगवान बुद्ध की ध्यानमग्न प्रतिमा और चीनी-तिब्बतीय शैली में बने पंडाल लोगों को स्वतः आकृष्ट कर रहे थे, और अंदर विराजमान भगवती के परिवारों की कलाकृति के आगे सभी नतमस्तक।

और अब हम पहुंच चुके थे, आर-आर स्पोर्टिंग क्लब, यहां भी, बकरी बाजार की तरह भारी अव्यवस्था दिखी। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कोई भी सक्रिय नहीं दिखा। ज्यादातर पूजा समिति सदस्य, आयोजकों के प्रमुखों के नामों को लेकर, उनका महिमामंडन करने में ज्यादा समय लगा रहे थे, इस पंडाल में कहने को तो झारखण्डी संस्कृति के दर्शन की बात की जा रही थी, पर यहां आ रहे लोग कन्फ्यूज्ड ज्यादा दिखे, ध्वनिविस्तारक यंत्रों का गलत ढंग से इस्तेमाल हो रहा था, इको साउंड सिस्टम होने के कारण, लोग ज्यादा परेशान दिखे, ज्यादा परेशानी बच्चों और बुजूर्गों को हो रही थी, खासकर हृदय रोगों से पीड़ित लोग तो बेचैन दिखे, जो यहां से जल्द से जल्द निकल जाना चाहते थे, ऐसे भी संकीर्ण मार्ग, एक-दूसरे से जूझते हुए, आगे पंडाल की ओर बढ़ते लोगों को देख, इनका धैर्य जवाब दे चुका था।

इसी दौरान हमने देखा कि जिन-जिन मां-पिता के कंधों पर छोटे-छोटे बच्चे थे, वे असहाय दिखे, क्योंकि उनके माता-पिता, बच्चों को पंडाल व दुर्गा की प्रतिमा दिखाने के बजाय मोबाइल से चित्र उतारने में ज्यादा मशगुल दिखे। एक समय ऐसा था कि जब मोबाइल किसी के हाथों में नहीं था और उस वक्त जब कोई छोटा सा बच्चा, अपनी मां या पिता के कंधों पर होता तो माता-पिता बच्चों को अपने हाथों व अंगूलियों के सहारे, बच्चों को दिखाते और कहते, देखो मां भगवती, देखो ये सुंदर पंडाल और बच्चे प्रसन्न हो जाते, और इस प्रेमाभाव को देख, बच्चे हर बार मां-पिता से जिद करते कि वे फिर उन्हीं के साथ दुर्गा पूजा घुमने जायेंगे, अब तो ये भाव ही धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है, क्योंकि इस मोबाइल युग ने माता-पिता और बच्चों के बीच उभरने वाले प्रेम को सदा के लिए समाप्त कर दिया है।

आर-आर स्पोर्टिंग कल्ब में विद्युतीय उपकरणों का खुब इस्तेमाल किया गया। यहां भगवान शंकर तांडव करते नजर आये, वहीं लड़की सर्कस दिखाती नजर आई, संसद पर तिरंगा लहराता नजर आया, भगवान कृष्ण की लीलाएं भी देखी गई। आगे जैसे ही मैं बढ़ा, तो रातू रोड चौक पर कुछ पुलिसवाले नजर आये, उस वक्त रात्रि के दस बज रहे थे, पता चला कि इन पुलिसकर्मियों ने जो दोपहर में भोजन किया, उसके बाद से इन्हें एक कप चाय तक पीने को फूर्सत नहीं मिली। एक पुलिसकर्मी से जब बात हुई, तब उसने अपनी दर्दभरी दास्तान सुनाई, उसका कहना था कि भाई पुलिस होना, बड़ा बेकार चीज हैं, इसमें परिवार और अपने बच्चों के लिए समय ही नहीं है।

पुलिसकर्मी का कहना था कि अपने परिवार और बच्चों के साथ दुर्गा पूजा घुमने का शौक किसे नहीं होता। बच्चे और पत्नी तो बराबर, इसी बात को लेकर मुंह फूला लेते हैं कि आज तक कभी दुर्गापूजा, दिवाली, छठ में एक साथ रहे ही नहीं। ये कैसी नौकरी है, जो दूसरों के परिवार को खुशियां देता है, और पुलिसवालों से खुशियां छीन लेता हैं। आगे बढ़ने पर नागा बाबा खटाल के पास कुछ पुलिसकर्मी मिले, लोग घिघिया रहे थे, कि उन्हें जाने दिया जाय, पर क्या मजाल कि लोग इधर से उधर, या उधर से इधर चार चक्का से निकल जाये। एकदम नहीं, कानून का पालन कराने में, यहां जो मैंने पुलिसकर्मियों का कार्य देखा, वह लाजवाब था।

संग्राम क्लब ने इस बार गंगावतरण, हरिद्वार में गंगा आरती, प्रयाग संगम का दृश्य श्रद्धालुओं के समक्ष रखा, बिहार क्लब में मां भगवती का दृश्य बहुत ही मनोरम था, और उसके बाद त्रिकोण हवन कुंड पहुंचे, इस त्रिकोण हवन कुंड ने तो हद कर दी, पता नहीं यहां के लोगों को कब समझ आयेगा कि पूजा क्या चीज है? और शक्ति की आराधना कैसे की जाती है?

इसके बाद फिरायालाल चौक आये, जहां दुर्गाबाड़ी पहुंचते ही, हमें लगा कि हम माता के आंचल में समा गये, सारी थकान मिट चुकी थी, मां का भव्यतम रुप निहारने के साथ ही, परम आनन्द की प्राप्ति हो गई, जैसा कि हमेशा होता रहा है, सचमुच हरिसभा समिति एवं दुर्गा बाड़ी के सदस्यों से सभी लोगों को प्रेरणा लेनी चाहिए? भक्ति और पूजा का अनोखा संगम देखना है, तो रांची के दुर्गाबाड़ी में आइये और स्वयं को शक्ति की आराधना में भूला दीजिये।

आगे यहीं पर चंद्रशेखर आजाद क्लब में माता का दर्शन किया, जहां झामुमो की नेत्री महुआ माजी मिल गई। आयोजकों ने उनका स्वागत किया और दो शब्द बोलने के लिए माइक थमा दिया। महुआ माजी बोलने के क्रम में, वह यह बोलना शुरु कर दी, कि आपके राज्य में, आपके देश में, हमें बड़ा खराब लगा, ये आपके राज्य में, आपके देश में, का क्या मतलब? क्या ये राज्य या देश महुआ माजी का नहीं। मैंने तुरंत, उन्हें इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी, और उन्होंने स्वीकारा कि गलतियां हुई?

और अब समय था घर लौटने का, मैने बैटरी चालित गाड़ीवालों से बात करनी शुरु की, कि भाई हमें रांची स्टेशन तक छोड़ दो और यहीं शुरु हुई बैटरी चालित गाड़ीवालों की मनमानी, कोई डेढ़ सौ तो कोई तीन सौ रुपये मांगने शुरु कर दिये थे। मैने अपने बच्चों से कहा कि चलो भाई, थोड़ा पैदल और चला जाय, और फिर हम आगे बढ़ने लगे, तभी कुछ दूर जाने पर एक गाड़ीवाला मिला, मैने उसे कहा कि बहुबाजार चलोगे? उसने कहा कि – हां चलेंगे?  मैने पूछा – भाड़ा क्या होगा? उसने कहा – प्रति व्यक्ति दस रुपये?  मै उसे देखकर सकपका गया कि दुर्गा पूजा के दिन में, जहां सभी मनमानी कर रहे है, ये मनमानी क्यों नहीं कर रहा? उसने कहा कि जो भाड़ा है, उससे अधिक लेने से थोड़े ही वो महाराजा बन जायेगा? और लीजिये वह कर्बला चौक होते हुए, बहु बाजार पहुंचा दिया।

कर्बला चौक पर हमें आने और जाने के क्रम में एक पंडाल पर नजर पड़ा, जो मुस्लिमों के सहयोग से बनाई गई थी, आश्चर्य कि उसके ठीक सामने होटल की दुकान थी, उस होटलवाले ने भी बड़ी ही ईमानदारी से पंडाल से अपने दुकानों को ढक लिया था, ताकि पूजा में कोई खलल न पड़ें, सचमुच जहां ऐसे लोग हो, वहां कोई गलत कैसे कर सकता है? यहीं तो भारत है।

हमें रांची में एक बात और अच्छा देखने को मिला कि इस छोटे से इलाके में झारखण्ड ही नहीं, बिहार, राजस्थान और गुजरात जैसे कई इलाके दीख जाते है। अगर राजस्थान देखना है तो राजस्थान  मित्र मंडल चले जाइये, बिहार देखना है तो बिहार क्लब चले जाइये और गुजरात देखना है तो कही भी डांडिया-गरबा हो रहा है, वहां जाकर आनन्द ले लीजिये, सचमुच अपनी रांची का जवाब नहीं।

और अब, स्थानीय पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन से एक अनुरोध, कम से कम पूजा तक इस बात का ध्यान रखे कि कोई टेम्पूवाला, यात्रियों से मनमाना भाड़ा न वसूलें और जो ऐसा करते हैं, उन्हें दंडित करने का प्रयास करें ताकि पूजा का माहौल और आनन्दमय हो जाये। कई ऐसे इलाके हैं, जहां बीच-बीच में सुनसान व घुप्प अंधेरे रहते है, वहां पुलिस की व्यवस्था नहीं दिखी, जैसे बहुबाजार से कर्बला चौक तक, रास्ते में एक भी पुलिस नहीं थी, वहां खतरा उपस्थित हो सकता है, इसका ख्याल रखे, और जिन्होंने धर्म व जाति का बंधन, भेदभाव त्याग कर पूजा के माहौल को आनन्दमय बनाने में अपना सब कुछ न्यौछावर किया, उनका विशेष सम्मान करें तथा जिन्होंने कानून और सुरक्षा-मानकों पर ध्यान ही नहीं दिया, उन्हें आनेवाले समय में ऐसा करने को दबाव डालें और फिर भी वे यदि नहीं मानते हैं, तो उनके लाइसेंस तक रद्द करें ताकि फिर कोई कानून व सुरक्षा मानकों को ठेंगा नहीं दिखा सकें।

Krishna Bihari Mishra

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Thu Oct 18 , 2018
भाई वो हमलोगों का जमाना था, जब टमटम की जगह छोटी-छोटी टैक्सियां ले रही थी, बैलगाड़ियों की जगह करीब-करीब ट्रैक्टर और ट्रक ने ले लिए थे। खेतों से रेहट, लाठा-कुड़ी, नहरों से करींग एक तरह से गायब होने के कगार पर थे, और उनकी जगह पर पम्पिंग सेट ने ले लिये थे। उस वक्त न तो किसी के घर में टीवी था और न ही मोबाइल फोन, ले-देकर हमारे मुहल्ले में दो ही के घर में फोन थे, एक नन्दा साव और दूसरे राजेन्द्र प्रसाद के पास।

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