हरिद्वार में हर-हर गंगे, ऋषिकेश में हर-हर गंगे, मुक्तिदायिनी हर-हर गंगे

बात 1980 की है। जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तब अपने मां-बाबू जी, अपने छोटे भाई और बड़ी मां के साथ बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान हरिद्वार और ऋषिकेश की भी यात्रा की थी, सौभाग्य से उस वक्त जब मैं छोटा था, तब मैं मां-बाबुजी के साथ हरिद्वार-ऋषिकेश की यात्रा की थी और आज जब 52 साल का हो गया हूं तो मेरे बेटों ने हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा करा दी।

बात 1980 की है। जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था, तब अपने मां-बाबू जी, अपने छोटे भाई और बड़ी मां के साथ बद्रीनाथ की यात्रा के दौरान हरिद्वार और ऋषिकेश की भी यात्रा की थी, सौभाग्य से उस वक्त जब मैं छोटा था, तब मैं मां-बाबुजी के साथ हरिद्वार-ऋषिकेश की यात्रा की थी और आज जब 52 साल का हो गया हूं तो मेरे बेटों ने हरिद्वार और ऋषिकेश की यात्रा करा दी।

1980 के हरिद्वार और ऋषिकेश में तथा आज 2018 के हरिद्वार और ऋषिकेश में काफी बदलाव आया हैं, गंगा के प्रति श्रद्धा और भक्ति वहीं हैं, पर लोगों के आचार-विचार, आहार-विहार तथा पर्यावरण में काफी बदलाव आया हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश में काफी वनों का कटाव हो रहा हैं और ये तेजी का क्रम घटने का नाम नहीं ले रहा, अगर यहीं हाल रहा तो निःसंदेह हरिद्वार और ऋषिकेश, अपने सौंदर्य को खो देगा?

मैं जैसे ही रांची से दिल्ली 12 जुलाई को पहुंचा, अपने बड़े बेटे ने हरिद्वार-ऋषिकेश जाने की इच्छा जताई, भला मैं अपने बच्चों की इच्छा को कैसे विराम लगा सकता हूं, मैंने भी हामी भर दी। पहले 15-16 जुलाई जाने का प्रोग्राम तय हुआ, फिर बाद में 21 जुलाई को नई दिल्ली-देहरादून शताब्दी एक्सप्रेस से हरिद्वार जाने का प्रोग्राम तय हुआ, साथ ही यह भी तय हुआ कि दूसरे दिन 22 जुलाई को सायं 6 बजे देहरादून-नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस से ही हरिद्वार से नई दिल्ली लौट आया जायेगा। टिकट बुक कर लिये गये। हमारे पास दो दिन था, हरिद्वार-ऋषिकेश घूमने का।

21 जुलाई को हम सपरिवार नई दिल्ली से हरिद्वार के लिए चल पड़े। देहरादून शताब्दी एक्सप्रेस हरिद्वार के एक नंबर प्लेटफार्म पर लग चुकी थी, दोपहर के बारह बज रहे थे। जैसा कि हर तीर्थस्थानों पर होता है, यहां भी वहीं व्यवस्था, मोल-जोल करिये और टेम्पू-टैक्सी पकड़िये, आप कितना भी कम करना-कराना चाहेंगे, आपकी पॉकेटमारी करने के लिए टेम्पू-टैक्सी वाले तरकीब निकाल ही लेते हैं, हमें हरिद्वार में शांतिकुंज ठहराना था, जो हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर ही स्थित हैं। टेम्पू वाले ने मात्र 6 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए 200 रुपये लिये, वहां जाने पर पता चला कि यहां हम 80 रुपये में आसानी से पहुंच सकते थे, क्योंकि यहां आने के लिए टेम्पूवाले पर हेड 20 रुपये लेते हैं।

शांतिकुंज पहुंचने पर डा. श्रीकांत भट्ट से मुलाकात हुई। डा.श्रीकांत भट्ट बिहार के मुजफ्फरपुर के रहनेवाले हैं और इनसे हमारा बहुत पुराना आत्मीय व पारिवारिक रिश्ता रहा हैं, ये आजकल हरिद्वार में ही पूरे परिवार के साथ रहते हैं, शांतिकुंज हरिद्वार से जुड़े हैं, यहां सेवा भी देते हैं तथा इनकी अपनी क्लिनिक भी शांतिकुंज देव संस्कृति विश्वविद्यालय के गेट न. 2 पर विद्यमान है। उन्होंने हमारी बहुत मदद की। पूरे परिवार को अपने घर ले गये, खूब आवभगत की, भोजन कराया और फिर हम उनके घर से विदा लेकर, शांतिकुंज हरिद्वार में ठहरने के लिए निकल पड़े।

डा. श्रीकांत भट्ट के घर से निकलना था कि बारिश ने हम सभी का शानदार स्वागत किया। हम सभी शांतिकुंज आते-आते पूरी तरह भींग चुके थे। डा. श्रीकांत भट्ट के माध्यम से हमें शांतिकुंज के अर्थवर्ण भवन में हमें दो कमरे, कमरा संख्या पांच व आठ मिले और हम सपरिवार उन्हीं कमरों में आश्रय लिया। समय देखते-देखते निकल रहा था,  हम सपरिवार हर की पौड़ी जितना जल्द हो, पहुंचना चाहते थे, हमलोगों ने टेम्पू लिया और करीब पांच बजे हर की पौड़ी पहुंच गये। सचमुच गंगा की अविरल धारा का अलौकिक सौंदर्य, भारत के विभिन्न राज्यों व अन्य देशों से आये श्रद्धालुओं का गंगा की अविरल धारा में डूबकी लगाने का भाव, हर की पौड़ी में मेले सा दृश्य हमारे हृदय को भाव-विभोर कर रहा था।

इधर अपना सुधांशु जल्द से मोबाइल निकाला और धराधर संध्या वेला के इस अलौकिक सौंदर्य को अपने मोबाइल के कैमरे से कैद कर रहा था, साथ ही हम सभी के फोटो खींचने पर भी ध्यान दे रहा था ताकि इसकी एक स्मृति को संजो कर रखी जाये। जब हम 1980 में आये थे तब ये मोबाइल थी ही नहीं, उस वक्त कैमरे हुआ करते थे, पर उस कैमरे से भी रंगीन फोटो नहीं हुआ करती थी, ब्लैक एंड व्हाइट फोटो से ही काम चलाना होता था, वह भी इतनी महंगी की, सभी लोग इसका वहन नहीं कर सकते थे, फोटो खींचनेवाला भी एक-दो दिनों का समय ले ही लेता था, इस कारण भी लोग फोटो नहीं खींचा पाते।

इधर गंगा के तट पर जैसे ही पहुंचे, हम सभी गंगा स्नान के लिए गंगा में उतरे, गंगा की विशाल धारा और उसका ठंडा जल हमें स्नान करने से रोक रहा था, पर जैसे ही एक बार डूबकी लगाई, ठंड कहां गायब हुआ, पता ही नहीं चला। आधे से एक घंटे तक गंगा में हमने कितनी बार डूबकी लगाई पता ही नहीं चला, देखते-देखते शाम के सात बज चुके थे, गंगा आरती की तैयारी जोरों पर थी, इस गंगा आरती को देखने के लिए लोगों की भीड़ जहां हम स्नान कर रहे थे, बढ़ती जा रही थी, हमलोग जल्दी-जल्दी स्नान कर, गंगा को प्रणाम कर वस्त्र धारण किये और जहां गंगा मंदिर हैं, वहां अपना स्थान बनाने में लग गये, ताकि आराम से गंगा आरती देख सकें, धीरे-धीरे शाम ढलता जा रहा था, शाम के साढ़े सात बज चुके थे।

घंटियों और घंटों तथा शंख ध्वनियों से मां गंगा की आरती प्रारम्भ हुई। कतारबद्ध लोग भाव-विह्वल हो, हाथ जोड़े, मां गंगा की आरती देख रहे थे, सबके मन के भाव बहुत ही सुंदर, हमारा हृदय भी गंगा आरती देखकर भर आया था, सभी ने जी भरकर गंगा आरती के सुख को अपने नेत्रों के सहारे रसपान कराकर हृदय को ढाढंस बंधाया, अलौकिक सुख प्राप्त किया और उसके बाद गंगा के किनारे बने विभिन्न मंदिरों में स्थापित देवी-देवताओं के दर्शन किये, गंगा में दीप दान किया, प्रसाद खरीदा और वहीं के रेस्तरां में बने भोजन को ग्रहण कर शांतिकुंज पहुंचा। अपने बड़े बेटे और बहु और अपनी पत्नी ने पहली बार गंगा आरती देखा था, वे सभी गंगा आरती देखकर अभिभूत थे और इस प्रकार पहला दिन समाप्त हुआ। 

दूसरे दिन डा. श्रीकांत भट्ट ने कहा था कि आप साढ़े छह बजे पूरी तरह नहा-धोकर तैयार हो जायेंगे, क्योंकि शांतिकुंज आये हैं तो यहां होनेवाले दैनिक यज्ञ में शामिल होकर, इसका लाभ उठाएं। ऐसे भी हमलोगों की दैनिक आदत हैं कि सुबह पांच बजे तक हम सभी नित्यक्रिया करके तैयार हो जाते हैं, इसलिए हमारे या हमारे परिवार के लिए सुबह साढ़े छह बजे तक तैयार न होने की बात, कोई असंभव नहीं थी।

हम सभी साढ़े छह बजे सुबह तैयार थे। पूरा परिवार शांतिकुंज के प्रतिदिन होनेवाले यज्ञ में शामिल हो रहा था, सचमुच पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने हरिद्वार में ऐसी चीज की नींव रख दी हैं, कि जिसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम हैं। हमारे अंदर चरित्र व संस्कार कैसे जगे, हम अपने देश को पुनः शिखर पर कैसे ले जाये, इसकी जो रुपरेखा उन्होंने तैयार की, उसकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है।

डा. श्रीकांत भट्ट ने यज्ञ समाप्त होने के बाद हमें अखण्ड ज्योति का दर्शन कराया तथा पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के उस कमरे तक ले गये, जहां रहकर-बैठकर पं. श्रीराम शर्मा आचार्य साधना किया करते थे, डा. श्रीकांत भट्ट ने बताया कि हम रविवार को यहां आये इसलिए गुरुदेव का कमरा देखने का सौभाग्य मिला, क्योंकि गुरुदेव का कमरा सिर्फ गुरुवार और रविवार को ही खुलता हैं, बाकी दिनों बंद रहता है। चूंकि आषाढ़ शुक्लपक्ष की गुरुपूर्णिमा आने में अब ज्यादा दिन शेष नहीं है, उसका प्रभाव भी यहां देखने को मिला, बड़ी संख्या में पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के बताये मार्गों पर चलनेवालों की यहां भीड़ बढ़ती जा रही है। हम तो कहेंगे कि जो भी कोई हरिद्वार जाये तो कम से कम एक दिन या कुछ घंटे शांतिकुंज हरिद्वार में जरुर बिताएं, उसे स्वयं पता लग जायेगा कि उसने क्या खोया और क्या पाया?

अब दिन के 9 बज चुके थे, और हम शांतिकुंज हरिद्वार से ऋषिकेश की ओर चल पड़े, रास्ते में टेम्पूवाले ने एक दो मंदिर दिखाएं, और फिर पहुंच गये, लक्ष्मण झूला। लक्ष्मण झूला से गंगा को निहारना, आंखों को बहुत बड़ा सुकून देता हैं, काफी समय लक्ष्मण झूला में बिताया, गंगा को अपलक निहारता रहा, पहाड़ की वादियों में, बादलों का पहाड़ों से अठखेलियां करना, सचमुच आनन्द को बढ़ाता जा रहा था, इसके बाद हम लक्ष्मण झूला से रामझूला की ओर निकल पड़े, रास्ते में कई धर्मार्थियों द्वारा बैठने के लिए बनाए गए, पक्के कुर्सियां और उसमें खुदे उनके परिवार के नाम बरबस अपनी ओर खीच लेते थे, वहीं स्वर्गाश्रम में पहाड़ के नीचे बने कचड़े के अम्बार और उससे उठती दुर्गंध ने ऋषिकेश की सुंदरता पर प्रश्नचिह्न भी लगाया।

बाद में स्वर्गाश्रम, गीताभवन आदि स्थानों पर जाकर गंगा दर्शन का आनन्द आंखों को खूब भाया। बेटे ने कहा, पापा जी, ऋषिकेश में भी स्नान करने का मन कर रहा हैं, मैंने कहा तो फिर देर किस बात की, आनन्द लो, उसने खुब यहां पर भी गंगा स्नान का आनन्द लिया और फिर हम शांतिकुंज लौटकर, सायं 6 बजे हरिद्वार से नई दिल्ली के लिए देहरादून – नई दिल्ली शताब्दी एक्सप्रेस पकड़ा और चल दिया।

सचमुच गंगा तो गंगा है, भवतारिणी, क्लेशहारिणी, संकटविनाशिनी, मुक्तिदायिनी, पतितपाविनी, और पापनाशिनी हैं, गंगा तो भारत की आत्मा हैं, अगर एक पंक्ति में कहें तो गंगा के बिना भारत का अस्तित्व ही नहीं हैं, गंगा ही तो है, जिसे देखकर हर भारतीयों का दिल धड़कता हैं, जिसकी एक बूंद भारतीयों को मोक्ष प्रदान कर देती हैं, ऐसी गंगा को हम क्यों न अपने दिल में बसाएं, उन्हें बारम्बार प्रणाम करें, हर-हर गंगे, हर-हर गंगे।

Krishna Bihari Mishra

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