इधर किसान आत्महत्या कर रहे हैं और उधर झारखण्ड के CM रघुवर का “विकास” करवटे ले रहा हैं

उधर किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और इधर जनाब झारखण्ड के राजाधिराज सीएम रघुवर दास कह रहे हैं कि 17 वर्ष बाद पहली बार झारखण्ड ने विकास की नयी करवट ली है, बदलता झारखण्ड अब एक नये निर्माण की ओर बढ़ चुका है, देश भर में झारखण्ड एक सशक्त राज्य की छवि लेकर सामने आ रहा है, इसलिए राज्य की जनता से यह अपील है कि सब लोग उत्साह और उल्लास से झारखण्ड स्थापना दिवस मनाएं।

उधर किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और इधर जनाब झारखण्ड के राजाधिराज सीएम रघुवर दास कह रहे हैं कि 17 वर्ष बाद पहली बार झारखण्ड ने विकास की नयी करवट ली है, बदलता झारखण्ड अब एक नये निर्माण की ओर बढ़ चुका है, देश भर में झारखण्ड एक सशक्त राज्य की छवि लेकर सामने आ रहा है, इसलिए राज्य की जनता से यह अपील है कि सब लोग उत्साह और उल्लास से झारखण्ड स्थापना दिवस मनाएं।

अब झारखण्ड की जनता ही बताएं, जिन किसानों ने आत्महत्या की हैं या आत्महत्या करने को विवश हैं, उनके परिवारवाले कैसे उत्साह और उल्लास के साथ झारखण्ड स्थापना दिवस मनाएं? क्या विकास का मतलब सिर्फ आईएएस-आईपीएस अधिकारियों, मंत्रियों उनके पिछलग्गूओं, कनफूंकवों का आर्थिक सशक्तिकरण होता है? क्या विकास का मतलब अखबारों और चैनलों के मालिकों और संपादकों का आर्थिक सशक्तिकरण होता है?

ये कैसा विकास हैं? जहां का मुख्यमंत्री, स्वयं के लिए, अपने मंत्रियों के लिए, अपने चहेते विधायकों के लिए अपने वेतन में भारी वृद्धि करवा लेता है और अपने राज्य में मनरेगा से जुड़े मजदूरों की दैनिक वेतन में न्यूनतम केवल एक रुपये की वृद्धि करता है।  ये विकास का दोहरा मापदंड, वो सरकार अपना रही हैं, जो हाल ही में अपने प्रिय नेता पं. दीन दयाल उपाध्याय का जन्मशताब्दी वर्ष मना चुकी है, जो एकात्म मानववाद के प्रणेता थे।

ये कैसा विकास है, जहां का सीएम जातिवाद का बीज बोता हैं और जातीय सम्मेलन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए महाराष्ट्र, छतीसगढ़ और बिहार की दौर लगा देता है, तथा अपने ही राज्य झारखण्ड में जातीय सम्मेलन मे बढ़-चढ़कर भाग लेता है।

कल की ही बात है, झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, अपने प्रिय आईएएस अधिकारियों राजबाला वर्मा और अमित खरे समेत कई प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठकर, कैसे झारखण्ड का स्थापना दिवस मनाया जाये? इस पर विचार-विमर्श कर रहे थे, और उसके ठीक एक दिन पहले गिरिडीह के बेंगाबाद के छोटकी खरगडीहा में बैंक से मिले केसीसी ऋण का भुगतान नहीं कर पाने की स्थिति में एक किसान कैलाशपति राणा ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, पर अफसोस की किसान की इस आत्महत्या की खबर को प्रमुखता किसी अखबार व किसी चैनल ने नहीं दी। ये चैनल और अखबारवाले किसान की आत्महत्या की खबर देंगे भी कैसे, ये तो झारखण्ड के राजाधिराज मुख्यमंत्री रघुवर दास के हाथों विज्ञापन रुपी जेवर पाकर बिक जो चुके है।

सूत्र बताते है कि उक्त किसान की केसीसी ऋण को लेकर बैंक के मैनेजर से तू-तू, में-में भी हुई थी, जिसके बाद उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। जिस राज्य में किसान आत्महत्या कर लें। जिस राज्य में लड़कियों का जीना दूभर हो जाये। वे सुरक्षित स्वयं को महसूस न करें और वहां का मुख्यमंत्री जब विकास करवट लेने की बात करता हैं, तो उन करोड़ों झारखण्डियों के दिल पर गहरी चोट लगती है, जो विकास का अर्थ भलिभांति समझते हैं।

किसानों की लाशों पर जो महोत्सव मनाएं। जो बेटियों पर हो रहे अत्याचार और दुष्कर्म पर एक्शन न लें और विकास की दुहाई दें। ऐसी सरकार को आप क्या कहेंगे, आप स्वयं सोचिये। हम आपको बता दें कि रघुवर दास, राज्य के पहले मुख्यमंत्री हैं, जिनके राज्य में किसानों ने सर्वाधिक आत्महत्या की है। जहां गुमला में एक गरीब बाप के एक बेटे ने एक रुपये की दवा नहीं मिलने के कारण, अपना बेटा खो दिया और उस बेटे की लाश को अपने कंधे पर ढोया, यानी उसके बेटे के शब को ढोने के लिए एक एंबुलेंस भी सरकार उपलब्ध नहीं करा सकी।

जहां एक महिला, एक बच्चे को सड़क पर ही जन्म दे देती है। अगर यहीं विकास हैं तो ऐसे विकास को हम दूर से ही सलाम करते है। नहीं चाहिए, ऐसा विकास, जहां जवानों को दो लाख और ठूमके लगानेवालों को करोड़ों रुपये, वह भी केवल मुंह देखकर उपलब्ध करा दिया जाता है।

Krishna Bihari Mishra

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