SC-ST झूठे केस में फंसे दुर्ग को मिला बेल, राजस्थान के पत्रकारों-बुद्धिजीवियों में हर्ष

राजस्थान के पत्रकारों के लिये और वहां के बुद्धिजीवियों के लिए आज का दिन बहुत खास हैं। बाड़मेर के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को आज न्यायालय से जमानत मिल गई है, फिलहाल वे बिहार और राजस्थान पुलिस की कृपा से एससी-एसटी मामले के एक झूठे केस में जेल में बंद थे। आश्चर्य यह है कि इस इन्सान पर आरोप है कि उसने किसी बिहार के राकेश पासवान से काम कराए

राजस्थान के पत्रकारों के लिये और वहां के बुद्धिजीवियों के लिए आज का दिन बहुत खास हैं। बाड़मेर के पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को आज न्यायालय से जमानत मिल गई है, फिलहाल वे बिहार और राजस्थान पुलिस की कृपा से एससी-एसटी मामले के एक झूठे केस में जेल में बंद थे। आश्चर्य यह है कि इस इन्सान पर आरोप है कि उसने किसी बिहार के राकेश पासवान से काम कराए और उसके पैसे नहीं दिये, वह बिहार आया और उसे राजस्थान ले जाने की कोशिश की, और उसके खिलाफ जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया।

सच्चाई यह है कि स्वयं फरियादी कहता है, कि वह भी न तो बाड़मेर गया और न ही केस किया। जब फरियादी ही बाड़मेर नहीं गया और न उसने केस किया, तो फिर किसके कहने पर बिहार और राजस्थान की पुलिस बाड़मेर के एक पत्रकार को एक आतंकवादी की तरह आनन-फानन में बाड़मेर से गिरफ्तार कर पटना ले आई, इसका मतलब है कि दुर्ग सिंह को एक राजनीतिक साजिश के तहत फंसाया गया और इसके छींटे बिहार के पूर्व राज्यपाल तक भी पहुंचे हैं, जिनका संबंध बाड़मेर से रहा हैं।

इधर आज इस मामले में न्यायालय में पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित के बेल के सिलसिले में बहस हुई। अधिवक्ता ने बताया कि प्रभारी न्यायाधीश मनोज सिन्हा की अदालत में बहस हुई, जिसमें तीन बातों पर अदालत का ध्यान आकृष्ट कराया गया, पहला 17 दिन बाद मुकदमा दर्ज होना, राजस्थान से उन्हें पटना लाना, जबकि वे कभी पटना आये ही नहीं, पेश से पत्रकार का होना, इन सारे बातों पर न्यायालय का ध्यान गया और अदालत ने पूरे मामले को संदिग्ध मानते हुए, इन्हें पांच हजार रुपये के मुचलके पर बेल दे दिया।

दुर्भाग्य है बिहार का, जिस एससी-एसटी एक्ट के सिलसिले में गिरफ्तार राजस्थान के एक पत्रकार के लिए पूरा राजस्थान उबल रहा था, वहां के पत्रकार और बुद्धिजीवी उबल रहे थे, वो उबाल बिहार के पत्रकारों में नहीं दिखा, शायद उन्हें लग रहा था, कि ये सामान्य घटना थी, जबकि ये सामान्य घटना थी ही नहीं, बिहार में इस घटना को लेकर, उबाल का न होना, बताता है कि बिहार के पत्रकारों ने अपनी अंतरात्मा गिरवी रख दी हैं, क्योंकि ऐसे मामलों में बिहार में आंदोलन का होना स्वाभाविक था, क्योंकि कोई भी व्यक्ति, भारत में रहनेवाले किसी भी पत्रकार को झूठे केस में फंसाकर, वह भी एससी-एसटी एक्ट मामले में फंसाकर, बिहार पर दाग कैसे लगा सकता है, और हम इस दाग को कैसे झेल सकते हैं?

सच्चाई यह है कि दुर्ग सिंह राजपुरोहित को अभी बेल मिली है, केस खत्म नहीं हुआ, अदालत को चाहिए कि इस मामले को जितना जल्द हो खत्म करें, ताकि दुर्ग सिंह राजपुरोहित सामान्य जिन्दगी जी सकें, क्योंकि एक इज्जतदार व्यक्ति के लिए, अदालत में कटघरे में खड़ा कर देना ही बहुत बड़ी बात हो जाती है, वह भी तब जब उसने कोई गुनाह नहीं किया हो, ऐसे बिहार और राजस्थान की पुलिस कितनी कर्तव्यनिष्ठ हैं और कैसे गलत लोगों को संरक्षण देते हुए, सच्चे इन्सान को फंसाती है, इस घटना से पता चल गया।

राजस्थान एंटी करप्शन ब्यूरो के रिटायर्ड एडीशनल एसपी राजेन्द्र सिंह शेखावत खाचरियावास ने पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित के बेल मिलने पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि पत्रकारों की एकता व सक्रियता से दुर्ग सिंह राजपुरोहित जेल से छूट गये। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आम आदमी को ऐसे अन्याय से कौन बचायेगा? इस तरह के षडयंत्र का पर्दाफाश होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार विक्रम सिंह राजपुरोहित ने पत्रकार दुर्ग सिंह राजपुरोहित को मिली जमानत पर हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि जमानत उन्हें मिल गई, उस घटना की जो घटी ही नहीं।

Krishna Bihari Mishra

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