वाह रे रघुवर सरकार, वाह री आपकी सोच, वाह रे नियमावली बनानेवाले

राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी दबंगता से नगरपालिका के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर अंकुश लगाने के लिए ये नियमावली कैबिनेट से पास करा दिया, पर राज्य के विधायक से लेकर मंत्री होते हुए मुख्यमंत्री तक भ्रष्ट आचरण में लिप्त हो जाये, तो उन पर क्या कार्रवाई हो?  इसके लिए नियमावली की आवश्यकता नहीं हैं क्या?

रघुवर सरकार ने कल कैबिनेट से झारखण्ड नगरपालिका निर्वाचित प्रतिनिधि (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 2017 के गठन की स्वीकृति दे दी हैं, इस नियमावली के आ जाने के बाद से पार्षद से लेकर मेयर तक हटाये जा सकते हैं। राज्य सरकार ने पार्षद से लेकर मेयर तक को अयोग्य ठहराने की जो शर्तें रखी हैं, वह इस प्रकार हैं…

  • अगर निर्वाचित प्रतिनिधि स्थानीय निकायों की लगातार तीन बैठकों में अनुपस्थित रहा हो।
  • भारत का नागरिक नहीं रहा हो।
  • केन्द्र या राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकार की सेवा में हो।
  • वैसे जगह अपनी सेवा दे रहा हो, जहां से केन्द्र या राज्य सरकार द्वारा सहायता मिलती हो।
  • मानसिक रुप से अस्वस्थ हो।
  • दीवालिया घोषित होने के लिए आवेदन दिया हो।
  • लोक सेवा के लिए अयोग्य करार हो।
  • छह माह से अधिक कारावास।
  • अपराधिक मामलों में अभियुक्त होने के कारण छह माह से फरार हो।
  • नगरपालिका के अधीन वेतनभोगी हो या लाभ के पद पर हो।
  • भ्रष्ट आचरण या कदाचार का दोषी पाया गया हो।
  • जिस वर्ष निर्वाचन हुआ हो, उसके पूर्ववर्ती वर्ष में नगरपालिका का बकायेदार हो।
  • अपने कार्यों को करने से इनकार करता हो या जानबूझकर उपेक्षा करता हो।
  • अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता हो।

अब सवाल उठता है कि राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने अपनी दबंगता से नगरपालिका के निर्वाचित प्रतिनिधियों पर अंकुश लगाने के लिए ये नियमावली कैबिनेट से पास करा दिया, पर राज्य के विधायक से लेकर मंत्री होते हुए मुख्यमंत्री तक भ्रष्ट आचरण में लिप्त हो जाये, तो उन पर क्या कार्रवाई हो?  इसके लिए नियमावली की आवश्यकता नहीं हैं क्या?

  • क्या राज्य सरकार मानती है कि राज्य के मुख्यमंत्री और मंत्री दूध के धूले हैं।
  • वे भ्रष्ट आचरण में लिप्त नहीं हैं।
  • अपनी शक्ति का दुरुपयोग नहीं करते।
  • नगरपालिका के जनप्रतिनिधि छह माह के कारावास पाने पर ही निर्वाचन प्रक्रिया से दूर और आपके लिए इसमें भी बहुत बड़ी छूट।

वाह रे रघुवर सरकार, वाह री आपकी सोच, वाह रे नियमावली बनानेवाले। राज्य सरकार मान चुकी है कि नगरपालिका में भ्रष्टाचार चरम पर हैं, और राज्य के विधायक, मंत्री और मुख्यमंत्री दूध के धूले हैं, जबकि इसी वेबसाइट vidrohi24.com पर इनके कुकर्मों का प्रमाण मौजूद हैं। अच्छा रहता कि नगरपालिका से ज्यादा विधानसभा में रह रहे माननीयों पर अंकुश लगाने के लिए सरकार नियमावली लाती या पूर्व की नियमावलियों में संशोधन करती।

मैं पूछता हूं कि जो झारखण्ड नगरपालिका निर्वाचित प्रतिनिधि (अनुशासन एवं अपील) नियमावली 2017 में प्रावधान किये गये है, उन प्रावधानों को विधानसभा में बैठनेवाले जनप्रतिनिधियों पर लागू क्यों नहीं किया जा रहा, क्या उन्हें ये सब करने की छूट मिलनी चाहिए। मुख्यमंत्री और कैबिनेट में शामिल मंत्रियों और अधिकारियों को ये जान लेना चाहिए कि गंदगी नीचे से नहीं फैलती, उपर से आती हैं और जैसे ही आप अपनी उपर की गंदगियों को साफ करना शुरु करेंगे, नीचे की गंदगी स्वतः समाप्त हो जायेगी, पर झारखण्ड सरकार ने अपनी गलतियों को ढांप कर दूसरे पर अंगूलियां उठाते हुए, नीचे के जनप्रतिनिधियों पर अंगूली उठा दिया हैं, जो सहीं नहीं हैं।

शुरुआत जब भी कीजिये, तो उपर से, क्योंकि अब गंगा ऋषिकेश, हरिद्वार, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, पटना और हावड़ा में मैली होने के पहले ही गंगोत्री में ही इतनी मैली हो जा रही है कि इससे आचमन करना भी खतरे को आमंत्रण देना है, इसलिए नगरपालिका का कचड़ा साफ करने का ठेका लेनेवालों, पहले अपने अंदर का कचरा साफ करों, फिर ये कचरा कहीं दिखेगा ही नहीं, यहां तो दूसरों पर अंगूलियां उठाकर स्वयं को पाक साफ करने का दावा ठोका जा रहा हैं।

Krishna Bihari Mishra

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