रांची को रहनेलायक नहीं छोड़ा, और जनाब शंघाई टावर के तर्ज पर टावर बनायेंगे?

एक लोकोक्ति हैं,  हसुआं के ब्याह में खुरपी के गीत। लोगों को जरुरत हैं मकान की, लोगों को जरुरत हैं सड़क जाम से मुक्ति की, लोगों को जरुरत हैं बिजली की, पानी की, लोगों को जरुरत हैं बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की, बेहतर शिक्षा की और जनाब ये सारा कुछ छोड़कर रांची में शंघाई टावर के तर्ज पर एक टावर बनाने की सोच रहे हैं?

एक लोकोक्ति हैं,  हसुआं के ब्याह में खुरपी के गीत। लोगों को जरुरत हैं मकान की, लोगों को जरुरत हैं सड़क जाम से मुक्ति की, लोगों को जरुरत हैं बिजली की, पानी की, लोगों को जरुरत हैं बेहतर स्वास्थ्य सुविधा की, बेहतर शिक्षा की और जनाब ये सारा कुछ छोड़कर रांची में शंघाई टावर के तर्ज पर एक टावर बनाने की सोच रहे हैं? आखिर शंघाई टावर बनाकर, वे क्या दिखाना चाहेंगे लोगों को? यहीं कि देखों हमारा रांची शंघाई टावर जैसे टावर पर चढ़कर देखने से कैसा बदसुरत लगता हैं।

सच्चाई है कि इस सरकार के अब चार साल होने जा रहे हैं, पर इस सरकार ने एक भी काम ऐसा नही किया, जिस पर लोग गर्व कर सकें। बगल में बिहार हैं, जहां की सरकार ने जगह-जगह ओवरब्रिज बनाकर, पटना को सड़क जाम से मुक्ति दिला दी, और इन्हें एक ओवरब्रिज बनाने में पसीने छूट जाते हैं। हमें लगता है कि चीन से ज्यादा, इन्हें बिहार जाकर देखना चाहिए कि वहां की सरकार ने कैसे सड़क जाम से मुक्ति पाने के लिए बहुत ही कम समय में एक अच्छी योजना पर काम करना शुरु किया और लोगों को सड़क जाम से मुक्ति मिल गई।

जरा याद करिये रांची का जेसोवा दीवाली मेला 2016, जब राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने सभी से कुम्हार के बनाये दीये और महिला स्वयं सहायता समूह द्वारा तैयार मोमबत्ती का प्रयोग करने को कहा था तथा चाइनीज सामग्रियों से दूरी बनाने का सभी से अनुरोध किया था, पर आज क्या हैं? स्वयं देखिये जनाब को चीन में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी दीख रही हैं, ऐसी दिलचस्पी कि वे शंघाई टावर जैसा टावर रांची में स्थापित करने की सोचने लगे।

क्या सचमुच रांची को शंघाई टावर जैसे, टावर की आवश्यकता हैं, क्या उस टावर का नाम बिरसा मुंडा टावर रख देने से भगवान बिरसा मुंडा प्रसन्न हो जायेंगे? क्या शंघाई टावर जैसे टावर बनाने के लिए झारखण्ड की जनता ने इन्हें जनादेश दिया था, क्या जिस राज्य में लोग भूख से मर रहे हो, जिस राज्य के लोग बिजली और पानी के लिए सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे हो, वहां शंघाई टावर जैसे टावर बन जाने से बिजली-पानी, सड़क जाम, भूख आदि की समस्या खत्म हो जायेगी?

क्या कोई बता सकता है कि झारखण्ड के मुख्यमंत्री को छोड़कर, भारत का कौन ऐसा राज्य हैं, जिसका मुख्यमंत्री अपने राज्य की प्राथमिकताओं को छोड़कर शंघाई टावर जैसा टावर, अपने राज्य की राजधानी में स्थापित करने की सोच रखता हैं। क्या झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास को पता भी हैं कि राज्य की सवा तीन करोड़ जनता उनसे किस प्राथमिकता पर ज्यादा ध्यान देने को कहती हैं, वह भी तब जबकि ये ढोल पीट-पीटकर बजट पूर्व संगोष्ठी के माध्यम से लोगों से विचार मांगते हैं, उन विचारों में से किस संगोष्ठी में, किस गांव की जनता ने उनसे शंघाई टावर जैसा टावर बनाने का अनुरोध किया था?

धन्य हैं मुख्यमंत्री रघुवर दास, जिसे अपनी जनता की फिक्र नहीं, वह राज्य को क्या दिशा देगा? क्या विकास के पथ पर ले चलेगा, बस वह तो कल जैसे हाथी उड़ा रहा था, आज शंघाई टावर जैसा टावर स्थापित करने की सोच रखेगा और इसी सोच में झारखण्ड की जनता अपनी किस्मत पर रो रही होगी कि कहां से उसने ऐसे आदमी को चुन लिया कि वह जनता की ही छाती पर मूंग दलने में पिछले कई सालों से लगा हैं।

Krishna Bihari Mishra

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