CM रघुवर सुनिश्चित कराएं कि जनता दरबार में राज्य की जनता का अपमान न हो

रतन तिर्की, झारखण्ड के नामी गिरामी सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे हमेशा से ही सामाजिक मुद्दों तथा आदिवासियों की समस्याओं और उनके सम्मान को लेकर मुखर रहे हैं। यहीं कारण है, कि उनका सभी सम्मान भी करते हैं। हाल ही में, अमर शहीद अलबर्ट एक्का की शहीदी मिट्टी को सम्मान दिलाने की बात हो या भूख से मर चुकी संतोषी की बात हो,

रतन तिर्की, झारखण्ड के नामी गिरामी सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं। वे हमेशा से ही सामाजिक मुद्दों तथा आदिवासियों की समस्याओं और उनके सम्मान को लेकर मुखर रहे हैं। यहीं कारण है, कि उनका सभी सम्मान भी करते हैं। हाल ही में, अमर शहीद अलबर्ट एक्का की शहीदी मिट्टी को सम्मान दिलाने की बात हो या भूख से मर चुकी संतोषी की बात हो, ये प्रमुख मुद्दों पर हमेशा से ही संघर्षशील रहे हैं। आज एक बार फिर रतन तिर्की चर्चा में हैं। इस बार उन्होंने राज्य के विभिन्न जिलों में पदासीन उपायुक्तों के अंदर, आदिवासियों व झारखण्डियों को लेकर उनके अंदर जो मैन्टिलिटी बनी हुई हैं, उस मैन्टिलिटी को इस बार रतन तिर्की ने रेखांकित कर दिया है।

रतन तिर्की ने इस बार सिमडेगा के उपायुक्त के जनता दरबार की फोटो अपने फेसबुक वाल पर लगाई हैं। ये फोटो बताता है कि कैसे आदिवासी महिला अपनी समस्याओं को लेकर पंक्तिबद्ध खड़ी हैं? और उपायुक्त कुर्सी पर विराजमान हैं, जबकि उपायुक्त के सामने कई कुर्सियां खाली पड़ी हैं। वे चाहते तो जनता दरबार में आई, इन आदिवासी महिलाओं को सम्मान के साथ कुर्सी पर बिठा, उनकी समस्याओं को सुन सकते थे, पर शायद उन्हें ये लगता हो कि ये आदिवासी महिलाएँ इन कुर्सियों पर बैठने के लायक नहीं, इसलिए उन्होंने आदिवासी महिलाओं को पंक्तिबद्ध खड़ा रखना ही उचित समझा।

भाई, एक बात तो मैं भी जानता हूं कि इज्जत वहीं देता है, जो इज्जत का कद्र करना जानता हैं, जो इज्जत का कद्र करना ही नहीं जानता, वो इज्जत किसी को क्या देगा? बहुत पहले हिन्दी की किताब में एक कहानी मैंने पढ़ी थी। कहानी का शीर्षक था – “गंगाराम की टेक”।अगर जिन्होंने ये कहानी पढ़ी होगी, तो मालूम होगा कि कैसे एक उच्चाधिकारी ने गंगाराम को बाल्यकाल में कान पकड़कर, अपनी कुर्सी से यह कहकर उतार दिया था कि वह इस कुर्सी के लायक नहीं, और गंगाराम ने भी इस अपमान का बदला, ब्याज समेत वसूला, जब वहीं उच्चाधिकारी उक्त कुर्सी से अवकाश प्राप्त कर रहा था और गंगाराम उसी कुर्सी पर बैठने की तैयारी कर रहा था, तथा उक्त कुर्सी पर बैठने के पश्चात, उसने उक्त उच्चाधिकारी को बताया कि कैसे बाल्यावस्था में उन्होंने कान पकड़कर इस कुर्सी से उसे उठा दिया था, और आज वह उसी कुर्सी पर विराजमान है।

अब सवाल उठता है कि क्या कोई झारखण्डी युवक आज संकल्प लेगा कि वह आनेवाले समय में ऐसा झारखण्ड बनायेगा, जहां प्रत्येक महिला-पुरुष को, वहां का उच्चाधिकारी, चाहे वह आईएएस हो या आईपीएस, सभी से सम्मान मिलेगा। जरुरत इस बात की संकल्प लेने की हैं।हमारे देश में एक परम्परा बनी हुई है कि जो आईएएस या आईपीएस बन जाता है, वह समझता है कि दुनिया का वह शहंशाह हो गया, वह किसी को भी बेइज्जत कर सकता हैं, अपमानित कर सकता है। झारखण्ड में तो ऐसे आईएएस-आईपीएस की भरमार हैं। अब जहां ऐसे लोगों की भरमार होगी, वहां ऐसे दृश्य तो दिखाई पड़ेंगे ही, फिर भी रतन तिर्की ने ये मुद्दा उठाकर, अपने समाज का जरुर भला किया हैं, शायद राज्य के सभी आईएएस व आईपीएस इस बात पर ध्यान देंगे कि वे राज्य की जनता को यथोचित सम्मान देकर, उनका और अपना दोनों का सम्मान बढ़ायेंगे।

रही बात जनता दरबार में समस्याओं के निष्पादन की, तो झारखण्ड में रहनेवाला कौन बच्चा नहीं जानता कि यहां समस्याओं का निष्पादन कैसे होता हैं? अरे जब मुख्यमंत्री जनसंवाद केन्द्र, जिसको चलानेवाले स्वयं मुख्यमंत्री हैं, वहीं जब समस्याओं का निष्पादन नहीं होता, झूठ का पुलंदा खुला रहता है, वहां अगर कोई उपायुक्त इस प्रकार का दरबार लगाता हैं तो क्या जनता इतनी मुर्ख है कि वह नहीं जान रही, कि उसकी समस्याओं के साथ क्या होनेवाला हैं?

Krishna Bihari Mishra

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