विवेकानन्द की प्रतिमा के अनावरण से अच्छा है कि CM रघुवर उनके बताए हुए मार्ग पर चले

हमारे देश में इन दिनों महापुरुषों के मूर्तियों के निर्माण एवं उनकी स्थापना का एक प्रकार का फैशन चल पड़ा है। एक तरह से यह ठीक भी है, क्योंकि इस प्रकार की प्रतिमाएं हमारे आनेवाली पीढ़ियों का एक प्रकार से मार्गदर्शन करती है, तथा बच्चे व युवा उनके बारे में जानने तथा उनके जैसा बनने की प्रेरणा लेते हैं, हाल ही में गुजरात में सरदार पटेल की भव्य एवं दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा और अब अपनी रांची में स्वामी विवेकानन्द की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण, उसी की एक कड़ी है।

हमारे देश में इन दिनों महापुरुषों के मूर्तियों के निर्माण एवं उनकी स्थापना का एक प्रकार का फैशन चल पड़ा है। एक तरह से यह ठीक भी है, क्योंकि इस प्रकार की प्रतिमाएं हमारे आनेवाली पीढ़ियों का एक प्रकार से मार्गदर्शन करती है, तथा बच्चे व युवा उनके बारे में जानने तथा उनके जैसा बनने की प्रेरणा लेते हैं, हाल ही में गुजरात में सरदार पटेल की भव्य एवं दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा और अब अपनी रांची में स्वामी विवेकानन्द की सबसे ऊंची प्रतिमा का अनावरण, उसी की एक कड़ी है।

ऐसा नहीं कि रांची में स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा नहीं थी, इसलिए रांची झील में 33 फीट ऊंची, छह टन कांसे, और दो टन स्टील तथा दो करोड़ चालीस लाख रुपये लगाकर इस प्रतिमा का निर्माण किया गया, बल्कि स्वामी विवेकानन्द की एक छोटी एवं भव्य प्रतिमा आज भी मेकान ऑफिस के मुख्यालय के ठीक सामने स्थित हैं, जो हम सबको प्रेरणा देती रहती है, साथ ही उधर से गुजरनेवाले सभी को “उतिष्ठत् जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधयत्।” का पाठ पढ़ा देती है, पर दुर्भाग्य झारखण्ड के राजनीतिज्ञों का, कि इस कठोपनिषद् के सूत्रवाक्य का उन पर प्रभाव ही नहीं पड़ा और न लगता है कि पड़ेगा।

हमारा सवाल है, सामान्य और असामान्य, दोनों लोगों से, भाई कितनी मूर्तियां बनवाओगे और कहां-कहां लगवाओगे, एक दो स्थान थोड़ा छोड़ देना, कभी जरुरत पड़ी तो, हम तुम्हारी भी मूर्ति लगवा देंगे, पर उन मूर्तियों का होगा क्या?  कभी सोचा है? सोच लीजियेगा? स्वामी विवेकानन्द का क्या है?  वे किसी प्रतिमा के भूखे थोड़े ही है, जितना उन्होंने कम समय में भारत को दिया, तथा परतंत्र भारत में उसकी आध्यात्मिकता एवं भारत माता का स्वाभिमान बढ़ाया, वैसा विरले ही मिलता है।

विद्रोही24. कॉम का मानना है कि किसी भी व्यक्ति से प्रेरणा लेने के लिए, किसी भी शहर में एक फोटो या एक प्रतिमा काफी है, हर जगह, उन्हीं की प्रतिमा लगा देना, उचित नहीं। अब सवाल राज्य के मुख्यमंत्री रघुवर दास से, क्या वे बता सकते है कि जिन विवेकानन्द की इतनी विशाल प्रतिमा, उनकी कृपा से रांची झील में लगी है, जिनका उन्होंने अनावरण किया, वे स्वामी विवेकानन्द, सर्वाधिक किससे प्रेम करते थे, और जिनसे वे प्रेम करते थे, उनकी कितनी प्रतिमा, उन्होंने कब और कहां लगवाई? अरे जनाब, उन्होंने तो उनकी प्रतिमा लगवाने से बेहतर, उनके नाम पर एक मिशन ही प्रारंभ कर दिया, जो आज भी मानवीय मूल्यों तथा मानवीयता की रक्षा कर रहा है, रामकृष्ण मिशन उसका जीता-जागता प्रमाण है।

रांची में ही एक योगदा सत्संग आश्रम है, जिसकी स्थापना स्वामी योगानन्द जी ने 1917 में की थी, तथा 1920 में अमेरिका के लॉस ऐन्जिल्स में सेल्फ रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना उन्होंने कर दी, जो आज भी पूरे विश्व में आध्यात्मिकता की लौ जला रही है, आज भी विश्व के लोग इसके द्वारा स्वयं को आनन्दित कर ईश्वर की खोज में स्वयं को समर्पित कर रहे हैं, क्या झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास बता सकते है कि स्वामी योगानन्द जी ने अपने गुरु स्वामी युक्तेश्वर जी की भव्य-विशाल प्रतिमा कब और कहां स्थापित करवाई? वे तो अपने गुरु को हृदय में ही धारण कर लिये और सभी को गुरु-शिष्य की अद्भुत परम्परा का भान करा दिया।

अरे भाई, स्वामी विवेकानन्द की विशाल प्रतिमा बनाने से क्या होगा? जरुरत तो उनके बताएं मार्गों पर चलने की है, आप स्वयं बताएं कि आप स्वामी विवेकानन्द के बताए मार्गों पर चल रहे है, और अगर नहीं चल रहे तो आप कितना भी प्रतिमा उनकी लगा दें, स्वामी विवेकानन्द को क्या फर्क पड़ता है? समाज और देश को क्या फर्क पड़ता है? पर जैसे ही उनके बताए मार्गों का अनुसरण कर, स्वयं को मानवीय मूल्यों से ओत-प्रोत कर लेते हैं तो विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की दिव्य आत्मा को बहुत ही आनन्द मिलता हैं।

आप बताएं, जिन स्वामी विवेकानन्द की आत्मा भारत के गांवों में बसती है, उन गांवों और ग्रामीणों के उत्थान के लिए आपने क्या किया?  जिन स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि “मैं उस प्रभु का सेवक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहा करते हैं।” आप खुद बताए कि आपने ऐसे महान व्यक्तित्व के व्यक्तित्व और कृतित्व को आत्मसात किया है, और अगर नहीं किया तो क्या फायदा स्वामी विवेकानन्द की विशाल प्रतिमा अनावरण करने की, जबकि सच्चाई यहीं है कि ईश्वरीय कृपा से इनकी सेवा करने का मौका तो आपको मिला।

जिन परिस्थितियों से देश फिलहाल गुजर रहा है, उन परिस्थितियों में देश में महापुरुषों के प्रतिमाओं के निर्माण तथा उनके स्थापना की जरुरत नहीं, बल्कि मानवीय मूल्य और मानवीयता कैसे सुरक्षित रहेंगे, इस पर काम करने की जरुरत हैं, भारत कैसे बचेगा? भारत कैसे सुरक्षित रहेगा? इस पर काम करने की जरुरत है, भारत में रहनेवाले निर्धन, दलित, उपेक्षित, पीड़ित, शोषण के शिकार लोग कैसे उपर उठें? इस पर काम करने की जरुरत है, जिसकी चिन्ता जीवन भर स्वामी विवेकानन्द ने की, तथा भारत को जगाने का काम किया।

आप ईमानदारी से बताएं कि आप स्वामी विवेकानन्द के सपनों को साकार करने के लिए, प्रयास कर रहे हैं, मेरा तो मानना है कि अगर आप ऐसा कर रहे होते, तो कम से कम आपके राज्य में हाथी उड़ाने की कोशिश नहीं हुई होती, किसी झारखण्ड के गरीब बच्चों को साढ़े छह हजार की नौकरी के लिए केरल भेजने का काम आप नहीं करते और न ही अपने राज्य के बच्चों को आप विदेशों में ड्राइवर बनाने तथा प्लम्बर बनाने के लिए आप ग्लोबल स्किल समिट कर देते।

दुर्भाग्य है इस राज्य का, आप इस राज्य के मुख्यमंत्री है, जो स्वामी विवेकानन्द की प्रतिमा का अनावरण करना जानता है, पर उनके बताए मार्गों पर चलकर भारत को सशक्त करना, भारत मां का स्वाभिमान बढ़ाना नहीं जानता, तभी तो झारखण्ड और भारत के लोग आंसू बहा रहे हैं, और जब तक ऐसा होता रहेगा, स्वामी विवेकानन्द की कितनी भी प्रतिमा बनवाकर स्थापित कर दी जाये, स्वामी विवेकानन्द की आत्मा इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी, क्योंकि मैंने स्वामी विवेकानन्द को जाना है, महसूस किया है, इसलिए ताल ठोककर लिख दिया हूं, आपको बता रहा हूं।

Krishna Bihari Mishra

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