जनाब झारखण्ड के CM दो बार सड़क जाम में क्या फंस गये, उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया

कमाल है, जब अपने पर आई तो लगे बैठक करने, कानून का राज स्थापित करने, ट्रैफिककर्मियों को बर्खास्त करने और जब इन्हीं समस्याओं से जनता त्रस्त थी, तो इनको कोई लेना-देना नहीं था। झारखण्ड बनने के बाद कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों, यहां तक की नगर-विकास मंत्रालय तक संभाल चुके रघुवर दास, आज मुख्यमंत्री पद तक पहुंच गये, पर जरा देखिये, इनके क्रियाकलापों को, इनको जनता की कोई फिक्र नहीं, फिक्र सिर्फ अपनी है।

दिनांक 16 नवम्बर।

हरमू बाइपास में जाम लगे होने के कारण मुख्यमंत्री रघुवर दास के काफिले को डायवर्ट करना पड़ा। मुख्यमंत्री का काफिला हरमू बाइपास के बजाय मेन रोड से उनके आवास ले जाया गया, उस वक्त मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट भवन से अपने घर लौट रहे थे।

दिनांक 20 नवम्बर।

एक बार फिर मुख्यमंत्री का काफिला जाम में फंस गया। प्रोजेक्ट भवन से कांके स्थित अपने आवास जाने के दौरान किशोरगंज चौक पर जाम से दो चार हुए सीएम। पुलिस ने काफिले के लिए खाली करायी थी दूसरी लेन, पर काफिला जाम वाले रुट में जाकर फंस गया।

कमाल है, जब अपने पर आई तो लगे बैठक करने, कानून का राज स्थापित करने, ट्रैफिककर्मियों को बर्खास्त करने और जब इन्हीं समस्याओं से जनता त्रस्त थी, तो इनको कोई लेना-देना नहीं था। झारखण्ड बनने के बाद कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों, यहां तक की नगर-विकास मंत्रालय तक संभाल चुके रघुवर दास, आज मुख्यमंत्री पद तक पहुंच गये, पर जरा देखिये, इनके क्रियाकलापों को, इनको जनता की कोई फिक्र नहीं, फिक्र सिर्फ अपनी है। तभी तो दो बार सड़क जाम में फंसते ही, मंत्रियों और अधिकारियों को बुलाकर बैठक करनी शुरु कर दी, फैसले सुनाने लग गये, चेतावनी तक दे डाली, फरमान सुना दिया।

जरा पूछिये सीएम से कि, कल यानी 23 नवम्बर को प्रोजेक्ट बिल्डिंग में नगर विकास मंत्री सी पी सिंह, अपर मुख्य सचिव अमित खरे, रांची उपायुक्त मनोज कुमार, एसएसपी कुलद्वीप द्विवेदी, नगर आयुक्त शांतनु अग्रहरि, ट्रैफिक एसपी संजय रंजन आदि अधिकारियों के साथ जो बैठक की, उसका लब्बोलुआब क्या था? क्या जनता के दर्द को कम करना था या अपने दर्द से जनाब ज्यादा परेशान थे।

जरा देखिये सीएम ने कल की बैठक में क्या कहा?

  • राजधानी के सभी चौक-चौराहों को खाली रखा जाये, यहां न तो कोई ठेले-खोमचे लगाये और न ही कोई वाहन रुके। किशोरी सिंह यादव चौक, कांटा टोली चौक, लालपुर चौक समेत शहर के सभी प्रमुख चौक-चौराहों पर ऑटो आदि रुकने पर वहां तैनात ट्रैफिक पुलिसकर्मी दोषी होंगे।
  • दुकानों के बाहर एक भी सामान नहीं रखा होना चाहिए, ऐसे दुकानदारों को पहले चेतावनी दी जाये, नहीं मानने पर इनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाये।
  • जिस क्षेत्र में दुकानों के सामने सड़क पर सामान रखे पाये जाये, जहां-तहां वाहन, ऑटो, ई-रिक्शा खड़े मिले, तो वहां के पुलिस इंचार्ज और ट्रैफिक पुलिस को बर्खास्त किया जाये, अधिकारियों को निर्देश दिया गया पहले चालकों को समझायें, और जब नहीं माने तो उनके वाहनों को सीज कर लिये जाये।
  • शहर के प्रमुख चौक-चौराहों पर ऑटोमेटिक नंबर प्लेट रीडर सिस्टम लगाये, इससे कानून तोड़नेवाले का वाहन नंबर आसानी से पकड़ा जा सकेगा।
  • मोरहाबादी, कचहरी रोड आदि जगहों से सब्जी बाजार को सड़क से हटाकर दूसरे स्थान पर लगवायें।
  • रांची रेलवे स्टेशन रोड पर ट्रैफिक कम करने के लिए डोरंडा की तरफ से एक सड़क स्टेशन तक जोड़े, इससे उस क्षेत्र के लोगों को घूम कर स्टेशन नहीं आना पड़ेगा और मुख्य सड़क पर दबाव भी कम पड़ेगा, यानी ऐसा काम, जो फिलहाल संभव नहीं।

इसमें कोई दो मत नहीं कि राजधानी रांची की यातायात व्यवस्था पूर्णतः चौपट है, पर ये कोई आज की समस्या नहीं थी, ये तो हमेशा से ही रही हैं, लोग झेलते रहे हैं, और स्वयं को कोसते रहे, कई बार न्यायालय को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा, जिससे कुछ दिनों तक तो यातायात व्यवस्था ठीक रहा, और उसके बाद फिर वहीं दुर्गति, यानी चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात।

अब जरा देखना है कि झारखण्ड के जहांपनांह, जनाबे आली, बादशाह, सीएम रघुवर दास को जो दर्द महसूस हुआ है, वह कितने दिनों तक याद रहता है, क्योंकि अगर इन्हें ये दर्द याद रहा तो ट्रैफिक व्यवस्था शायद सुधर जाये, नहीं तो यहां की जनता जो भुगत रही है, वो तो सबके सामने हैं।

Krishna Bihari Mishra

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