बलबीर एंड कंपनी के हालत पस्त, ईंट से ईंट बजाने की तैयारी, रघुवर सरकार पर भी उठे सवाल

सूत्र बताते है कि चूंकि 881 सदस्यों में बलबीर एंड कंपनी के लोगों का नाम नहीं है, जिन्होंने सदस्यता हेतु आवेदन नहीं जमा किया, अब वे चाहते है कि बैकडोर से या नियमों में फेरबदल कर, सदस्यता प्राप्त कर लें, पर ऐसा संभव होता नहीं दीख रहा, क्योंकि जिन लोगों ने सदस्यता हेतु आंदोलन किया, और जिनकी बलबीर एंड कंपनी ने कभी सुनने का काम नहीं किया और न ही सम्मान दिया, अंतिम-अंतिम समय तक नाक रगड़वाने की कोशिश की।

जिस द रांची प्रेस क्लब से जुड़े लोग अपने जन्मकाल से लेकर अब तक यानी आठ साल में मात्र आठ सदस्य बनाते हैं, उन्हें रघुवर सरकार नवनिर्मित प्रेस क्लब का जिम्मा सौंपती है, और जिन्होंने मात्र दस दिनों में इसकी संख्या 880 पहुंचा दी, वे अपने हक के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं। ये हैं रघुवर सरकार के कार्यकाल, क्रियाकलापों व चरित्र का एक परिदृश्य।

जरा बलबीर एंड कंपनी के लोगों का चरित्र देखिये –

  • एक पत्रकार हैं, फैसल इकबाल, जो युवा पत्रकार है, उसने प्रेस क्लब से जुड़ने के लिए आवेदन जमा किया, उसके आवेदन को बलबीर एंड कंपनी के लोग, जांच के दौरान एक संभ्रांत पत्रकार के हाथों से छीनकर जमीन पर फेंक देते हैं।
  • इन्हीं लोगों ने प्रेस क्लब की सदस्यता के लिए आवेदन जमा करने की अंतिम तिथि – दस नवम्बर निर्धारित की, 17 नवम्बर को आवेदन की जांच की तिथि तय की, तथा 20 नवम्बर को प्रेस क्लब के सदस्यों की सूची जारी करने का आदेश निकाला, और आज 24 नवम्बर हो गये, सदस्यों की सूची कब जारी होगी? इसका जवाब बलबीर एंड कंपनी के पास नहीं है।
  • बलबीर एंड कंपनी ने रांची प्रेस क्लब की सदस्यता के लिए 2100 रुपये निर्धारित किया था, जब रांची के वरिष्ठ पत्रकारों के नेतृत्व में कई पत्रकारों ने आंदोलन किया तो इसकी राशि 1100 रुपये निर्धारित की गई।
  • कमाल की बात है कि प्रेस क्लब की सदस्यता के लिए आवेदन जमा करने, आवेदन की जांच करने की तिथि समाप्त हो चुकी है, पर स्वयं बलबीर एंड कंपनी से जुड़े लोगों ने सदस्यता के लिए आवेदन ही नहीं जमा किया है। आवेदन की जांच करने में लगे वरिष्ठ पत्रकारों में से एक ने विद्रोही 24.कॉम को बताया कि सदस्यता के लिए आवेदन की जब जांच हो रही थी, तब उस समय जांच के लिए बनी टीमों में अमरकांत, विनय कुमार, विजय पाठक, सोमनाथ, शंभूनाथ चौधरी, गिरिजा शंकर ओझा, रजत कुमार गुप्ता, चंदन मिश्र आदि मौजूद थे, सभी आवेदनों की जांच दो-दो सदस्यीय टीम के हस्ताक्षरों से जारी हो रही थी, पर इन जांचों के दौरान पाया गया कि इन आवेदनों में बलबीर एंड कंपनी के लोगों के आवेदन नहीं थे।
  • 881 आवेदनों को सही पाया गया तथा इन्हें सदस्यता की मंजूरी भी दे दी गई और करीब 100 आवेदनों को विचारार्थ निलंबित रखा गया।

अब जबकि 20 नवम्बर को ही सूची जारी करनी थी, और 881 सदस्यों की अंतिम सूची तैयार कर ली गई, फिर भी सूची जारी नहीं हो पा रही है, इसको लेकर रांची के कई पत्रकारों ने गहरा आक्रोश जताया हैं। कई वरिष्ठ पत्रकारों ने बलबीर एंड कंपनी के क्रियाकलापों पर अंगूली उठाई तथा इनके खिलाफ कड़ा प्रतिरोध जताया है।

सूत्र बताते है कि चूंकि 881 सदस्यों में बलबीर एंड कंपनी के लोगों का नाम नहीं है, जिन्होंने सदस्यता हेतु आवेदन नहीं जमा किया, अब वे चाहते है कि बैकडोर से या नियमों में फेरबदल कर, सदस्यता प्राप्त कर लें, पर ऐसा संभव होता नहीं दीख रहा, क्योंकि जिन लोगों ने सदस्यता हेतु आंदोलन किया, और जिनकी बलबीर एंड कंपनी ने कभी सुनने का काम नहीं किया और न ही सम्मान दिया, अंतिम-अंतिम समय तक नाक रगड़वाने की कोशिश की। वे अब इन्हें छोड़ने नहीं जा रहे हैं, साथ ही इनलोगों ने स्पष्ट किया, कि अगर बलबीर एंड कंपनी ने अपने पद का दुरुपयोग किया तो वे पत्रकारों के आंदोलन और उसके स्वरुप क्या होंगे, उन्हें पता नहीं हैं। इधर पत्रकारों के इस उग्र रुप को देख बलबीर एंड कंपनी के एक प्रमुख सदस्य ने मैदान छोड़ देने की घोषणा कर दी है।

इधर बलबीर एंड कंपनी के खिलाफ लोगों का आक्रोश बढ़ता जा रहा है। विभिन्न माध्यमों से आक्रोश स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार गिरिजा शंकर ओझा ने कहा है कि जिस जेब में आठ थे, उसमें 880 डालेंगे तो चरचरा कर फटेगा ही। वहीं फट रहा है, और इनको पीड़ा हो रही है। जेब से निकल रहा है, प्रेस क्लब। उन्होंने यह भी कहा कि बात बस इतनी है कि ये लोग प्रेस क्लब को अपना दफ्तर समझ रहे है, अकड़ और गुरुर तो जाते-जाते ही जायेगा, रस्सी जल गई, लेकिन ऐंठन अभी भी हैं।

नीरज सिन्हा ने कहा है कि करवा लो बिल्डिंग की रजिस्ट्री, फर्क नहीं पड़ता और कोई उफ्फ भी नहीं करेगा, पर प्रेस क्लब का बोर्ड हटवा लो। ओझा जी, रजत जी, किसलय जी, शंभु जी, को इकट्ठे भरमाने में लगे हो, तो नए, युवा पत्रकारों को कौड़ी के मोल ही गिनोगे, पर याद रखना, तिकड़म तमाम कर लो, कद्र हासिल नहीं कर पाओगे।

अभिषेक ने कहा है कि युवा पत्रकारों को कौड़ियो के भाव समझनेवालों को यह भी समझना चाहिए कि उनमें गरिमा की चिंता से ज्यादा जोश भरा होता है, कहीं लेने के देने न पड़ जाये।

निलय सिंह ने कहा कि ये इंतजार गलत है कि शाम हो जाये, जो हो सके तो दौर ए जाम हो जाये।

योगेश किसलय ने कहा कि प्रतीक्षा तो सालों से कर रहा हुं, लेकिन दुख होता है कि यह सब जानबूझकर किया जा रहा है। एक दो लोग पूरे पत्रकार बिरादरी को हांकने में लगे हैं।

विजय राघवन ने कहा है कि द एविल दैट मैन डू लाइभ्स आफ्टर देम।

वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र सिंह ने कहा कि जब कोर कमेटी के सदस्य ही नियम का पालन नहीं करेंगे तो फिर भगवान ही मालिक है।

भुजंग भूषण ने कहा कि लोगों को यह समझ में क्यूं नहीं आ रहा कि प्रेस क्लब किसी की जागीर नहीं हैं, यह पत्रकारों के लिए सरकार द्वारा दिया गया एक मंच है, जिसे लोकतांत्रिक तरीके से संचालित करना है। पता नहीं क्यूं लोगों को इसे पूर्ण रुपेण संचालित करने में प्रसव पीड़ा क्यों हो रही है।

अंततः सभी ने एक स्वर में कहा कि – बहुत हुआ अनुनय विनय, फार्म नहीं तो सदस्य नहीं। मैं भी खड़ा हूं, ईंट से ईंट बजा दूंगा।

Krishna Bihari Mishra

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कमाल है, जब अपने पर आई तो लगे बैठक करने, कानून का राज स्थापित करने, ट्रैफिककर्मियों को बर्खास्त करने और जब इन्हीं समस्याओं से जनता त्रस्त थी, तो इनको कोई लेना-देना नहीं था। झारखण्ड बनने के बाद कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों, यहां तक की नगर-विकास मंत्रालय तक संभाल चुके रघुवर दास, आज मुख्यमंत्री पद तक पहुंच गये, पर जरा देखिये, इनके क्रियाकलापों को, इनको जनता की कोई फिक्र नहीं, फिक्र सिर्फ अपनी है।

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