भाजपा भी जातीयता के राह पर, सीएम रघुवर ने शुरु की जातीयता की राजनीति

अब भाजपा पूरी तरह बदल गई है। भाजपा नेता अब स्वीकार कर चुके है कि देश को पं. दीन दयाल उपाध्याय के बताये गये आदर्शों पर नही चलाया जा सकता और न बदला जा सकता हैं, इसलिए भाजपा नेताओं ने जातीय रैलियों एवं सभाओं का सहारा लेना शुरु कर दिया हैं। आज एक बार फिर झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, छतीसगढ़ पहुंचे और वहां साहू समाज के कार्यक्रम में भाग लिया।

अब भाजपा पूरी तरह बदल गई है। भाजपा नेता अब स्वीकार कर चुके है कि देश को पं. दीन दयाल उपाध्याय के बताये गये आदर्शों पर नही चलाया जा सकता और न बदला जा सकता हैं, इसलिए भाजपा नेताओं ने जातीय रैलियों एवं सभाओं का सहारा लेना शुरु कर दिया हैं। आज एक बार फिर झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास, छतीसगढ़ पहुंचे और वहां साहू समाज के कार्यक्रम में भाग लिया। हम आपको बता दें कि इसके पूर्व भी मुख्यमंत्री रघुवर दास छतीसगढ़ के राजानंदगांव में हुए साहु समाज के कार्यक्रम में भाग ले चुके हैं, ये उनकी दुसरी सभा थी।

इस जातीय रैली में शामिल होकर, मुख्यमंत्री रघुवर दास ने बड़े ही गर्व से साहू समाज से अपील की कि वे भाजपा का साथ दें, आशीर्वाद दें। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में विकास की राजनीति हो रही है, हमें उसी का साथ देना चाहिए। उन्होने कहा कि छतीसगढ़ की जनता ने बार-बार  रमन सिंह पर भरोसा जताया क्योंकि उन्होंने हमेशा विकास की राजनीति की है, जबकि कांग्रेस गरीबों के नाम पर नौटंकी करती रही है, इसलिए अगर देश को बढ़ाना है, तो हमें कांग्रेस मुक्त भारत का संकल्प लेना होगा।

मुख्यमंत्री रघुवर दास ने इस साहू समाज की रैली की तस्वीर भी अपने सोशल साइट पर गर्व से लगाया है, तथा इसके बारे में बड़े ही गर्व से दो शब्द लिखे हैं। याद करिये, ये वहीं भाजपा है, जो सामाजिक समरसता की बात करती है, जिसके नेता जातिविहीन समाज के पक्षधर हैं, भाजपा जो संघ की एक राजनीतिक संगठन है, जहां के प्रचारक-कार्यकर्ता जातीय रैलियों-सभाओं से स्वयं को दूर रखते हैं, आज उसी संगठन का एक संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति जातीय रैलियों-सभाओं में जाकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहा हैं। अब तक मुख्यमंत्री के रुप में रघुवर दास आधा दर्जन से ज्यादा जातीय रैलियों में भाग ले चुके हैं।

सूत्र बताते हैं कि भाजपा के वरिष्ठ नेता व कार्यकर्ता मुख्यमंत्री के इस जातिवादी राजनीति से खिन्न है, उनका कहना है कि संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति सभी जातियों-समुदायों को होता हैं, इसलिए उस व्यक्ति को इस प्रकार के आयोजनों से दूर रहना चाहिए, क्योंकि इस संबंध में अन्य दलों से तो नहीं, पर भाजपा से ये उम्मीद की जा सकती थी, पर पं.दीन दयाल उपाध्याय की जन्मशतीं वर्ष में इस प्रकार की राजनीति चलेगी तो जनता इतनी भी मूर्ख नहीं, वह सब समझ रही है, क्योंकि वोट तो सभी ने दिया है, सबका साथ-सबका विकास के मूल आधार वाक्यांशों के आधार पर दिया है, पर जब संवैधानिक पद पर बैठकर आप जातीय रैली-सभाओं-कार्यक्रमों में बार-बार भाग लेंगे तो इसका असर अन्य समाज पर भी पड़ेगा और पड़ भी रहा हैं।

भाजपा के ही बड़े नेता नाम न छापने की शर्त पर बताते है कि मुख्यमंत्री बताये कि पं. दीन दयाल उपाध्याय, डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, जैसे कितने नेताओं ने जातीय रैलियों में भाग लिया। संसद में तो स्वयं अटल बिहारी वाजपेयी ने ही जातीयता की खिल्ली उड़ायी थी, पूरी दुनिया ने देखा था, पर अब एक नई क्रांति संभवतः भाजपा में आ चुकी है। कल भाजपा के ही बड़े नेता, संवैधानिक पद पर बैठे नेता इससे भी बड़ी-बड़ी जातीय रैलियों में भाग लेकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस नहीं करने लगे, तब कहियेगा, क्योंकि इसकी शुरुआत झारखण्ड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने जोर-शोर से कर दी और उधर बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी पटना में इनका साथ देकर अपना इरादा स्पष्ट कर दिया कि वे भी इस जातीय दलदल को पुनर्जीवित और मजबूत करने में रघुवर के साथ हैं।

Krishna Bihari Mishra

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