“बिरसा का गांडीव” तो इस जेठ की दुपहरिया में कई लोगों के तन-बदन में आग लगाकर फागुन की मस्ती में डूबा था, मतलब समझे कि ना समझे

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भर फागुन रांची प्रेस क्लब के अधिकारी देवर लगिहे, भर फागुन… जोगी जी धीरे-धीरे रंग लगइहो धीरे-धीरे, गाली दियो धीरे-धीरे… आप कहेंगे कि अरे विद्रोही जी को क्या हो गया, इ तपती जेठ महीने में इनको फगुनाहट कैसे सुझ गया, तो भैया जी लोग, झारखण्डी जनता लोग, विभिन्न अखबारों-चैनलों में काम करनेवाले विद्वान पत्रकारों वो इसलिए कि अभी-अभी रांची से प्रकाशित “बिरसा का गांडीव” नामक अखबार ने हमें बताया है कि आज फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि है, जिसका विक्रमी संवत् 2077 है।

मतलब उनके अनुसार फाल्गुन महीना चल रहा है, ऐसे में फागुन की मस्ती न चढ़ेगी तो क्या जेठ की तपती दुपहरिया में तन-बदन में आग लगेगी? अरे फागुन में जो तन-बदन में आग लगती है, उसकी तो बात ही निराली है, क्या मस्ती होती है, ठंडे पानी में भी बदन जलने लगता है और कोई गोरी-सुकुमारी ऐसे में लिपटकर रंग लगा दें तो लो हो गया मजा। हो गई मस्ती, गाना शुरु – रंग बरसे भीगे चुनरवाली, रंग बरसे।

कहने का मतलब है, “बिरसा का गांडीव” ने आज एक दिन में ही फागुन की मस्ती का मजा दे दिया, धन्य है आज का विशेष अंक देखनेवाले महशय, जिन्होंने ज्येष्ठ कृष्णपक्ष की सांध्यवेला में फाल्गुन महीने का रसपान करा दिया। ऐसे में ठीक ही एक हमारे पत्रकार मित्र पिछले तीन दिन से कह रहे थे, अरे देखियेगा ये सब कुछ नहीं, ये तो प्रेमालाप है, एक दूसरे में खो जाने के लिए बेचैन होली की पिचकारी से निकली व्यंग्य बाण है, जल्द ही कुछ ऐसा होगा कि दोनों संस्थाएं एक दूसरे में समा जायेगी, लेकिन जेठ की दुपहरिया में होली के आनन्द के साथ ऐसा होगा, हमको समझ नहीं आ रहा था।

चलिए बिरसा का गांडीव जी के सम्पादक जी को बहुत-बहुत बधाई, कि इस भीषण गर्मी में फागुन की छटा बिखेर दी। आज कुछ धूम-धड़ाम नहीं हैं। आज अपने अंदाज में फागुन के महीने के एक दिन में ही इन्होंने गजब का समां बांध दिया। पिछले तीन दिनों से जो लोग आपस में एक दूसरे से भिड़ने में ताकत लगा रहे थे, आज फागुन की मस्ती में डूबे हैं, कही से कोई अल-बल सुनाई नहीं दे रहा, हर जगह मजे ही मजे  है। लोग होली जैसी मस्ती में डूबे हैं।

इधर कब से निशान बाबा भी होलियाना अंदाज में अखबार पर गुस्साए हुए थे, कह रहे थे कि दूसरे दिन अखबार वाले ने कहा था कि “कल पढ़े- वीआइपी संग फोटो से पंकज सोनी कैसे करता था खेल” पर दो दिन बीत गये, न्यूज दिखाई नहीं दे रहा हैं, ये तो पाठकों के साथ धोखा है, पर आज का अंक देखकर उन्हें भी पता लग गया होगा कि सारी मंडली अभी होली की मस्ती में डूबी है, इसलिए उनके साथ भी होली का हुड़दंग हो गया, धोखा नहीं हुआ, हमें लगता है कि निशान बाबा भी बड़े-बड़े पत्रकारों के साथ रहकर इतनी बड़ी कला से अब तक विमुख ही रहे होंगे, कि जेठ में कैसे फागुन का मजा लिया जाता है?

आज का दिन सचमुच में शुभ है, सभी ओर शांति है। बिरसा का गांडीव कार्यालय में शांति है, रांची प्रेस क्लब में शांति है, अरे शांति होगी कैसे नहीं, फागुन का महीना जो चल रहा है, इ तो फागुन के महीने का ही कमाल है, उधर हमारे असली होली खेलनेवाले वर्तमान कृष्ण कन्हैया संजय जी महाराज फेसबुक में शांति का पाठ लेकर निकल पड़े हैं, कई लोगों ने उनके इस पाठ का समर्थन भी किया है, अब निश्चय ही फागुन के महीने में बननेवाला मालपुआ का रस रांची प्रेस क्लब व बिरसा का गांडीव कार्यालय में बिखरेगा, सभी मालपुए के रस से चप-चप करेंगे और एक दूसरे में समा जायेंगे।

अब तो बूटी भी तैयार है, लाने के लिए कही जाना नहीं होगा, क्योंकि रांची में बूंटी मोड़ पहले से ही उत्पादन के लिए तैयार है। अब कोई उगाही की बात नहीं करेगा, कोई लंद-फंद नहीं करेगा, जो भी हुआ ये फागुन की मस्ती थी, फागुन में तो इतना चलता ही रहता है, काहे को दिमाग लगाना है, ऐसे भी सभी लोगों की दिमाग फागुन महीने में घूटने में पहुंच जाती है, इसलिए इस पर दिमाग लगाना मूर्खता है। खाइये-पीजिये, मस्ती करिये, और कहिये बुरा न मानो फागुन है। बिरसा का गांडीव ने अपने आज के अंक में फाल्गुन के महीने का वर्णन कर सभी से फागुन की मस्ती वाली दोस्ती का हाथ बढ़ाया है, मालपुआ का रस का रस हाथ में लगाइये और कस के पकड़कर बढ़िया से हथवा में कटकटा के हॉट किस लीजिये और सारा नफरत समाप्त करिये। क्यों कैसी रही…

अंत में एक बात और, बिना पेंदी के लोटा लोग, दो जमात में बंटकर लड़ाई में अग्नि को और बढ़ावा देनेवाले लोग, देखो कैसे आज बिरसा का गांडीव ने कितना बढ़िया से तीन दिन की जेठ की गर्मी को फागुन से नहला दिया है, इसलिए दो बड़ों के बीच में कभी नहीं उतरना चाहिए, बस अगल-बगल बैठकर ज्ञानवर्द्धन करना चाहिए, जैसे हमने ज्ञानवर्द्धन किया, फागुन पर मेरी नजर चली गई और आपकी नजर, आपकी नजर तो आज भी उसी पर थी कि आज क्या लिखा होगा, अमर बाबा ने… ( बोलो प्रेम से – बुरा न मानो फागुन है। रांची प्रेस क्लब और बिरसा का गांडीव के बीच कितनी सुन्दर यारी है।)

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