प्रेस क्लब की बैठक में कानूनी कार्रवाई को लेकर सहमति नहीं, वयोवृद्ध पत्रकारों ने चेताया क्लब को अपने ही चिराग से खाक होने से बचाएं

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मंगलवार को रांची प्रेस क्लब की कार्यकारिणी की बैठक थी। यह बैठक संस्थान में ही आयोजित थी, जिसमें ज्यादातर प्रेस क्लब के अधिकारियों लोगों ने हिस्सा लिया। इसकी जानकारी वरिष्ठ पत्रकार सुशील कुमार सिंह मंटू ने अपने सोशल साइट फेसबुक के माध्यम से दी है। सुशील कुमार सिंह मंटू के कथाननुसार पूर्व में लिए गये निर्णय के तहत बैठक की मिनट्स टू मिनट्स की गतिविधियों की जानकारी सार्वजनिक करनी थी।

लेकिन कमेटी में शामिल अधिकारियों ने इसे सार्वजनिक नहीं किया, चूंकि रांची प्रेस क्लब के सदस्यों को कल यानी मंगलवार की बैठक में लिये गये निर्णयों को जानने की उत्सुकता थी, ऐसे में उन उत्सुकताओं को बहुत हद तक सुशील कुमार सिंह मंटू ने कम करने का प्रयास  किया है।

कल की बैठक को लेकर पता चला कि इसमें दो ही मुद्दे अहम् थे, एक था लिफ्ट मरम्मति को लेकर सर्वसम्मति बनाना तथा पिछले पांच दिनों से रांची प्रेस क्लब को लेकर हो रहे विवाद पर सहमति बनाना अथवा चर्चा करना। वरिष्ठ पत्रकार सुशील कुमार सिंह मंटू द्वारा दिये गये सूचनाओं पर ध्यान डाले तो साफ लगता है कि रांची प्रेस क्लब में हुए विवाद को लेकर हुई चर्चा में सर्वसम्मति नहीं बन पाई है।

खुद इस मामले को लेकर रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष राजेश सिंह अनिर्णय की स्थिति में हैं, वे खुलकर कुछ भी नही बोल सकें। ज्ञातव्य है कि राजेश सिंह कोरोना बीमारी से ग्रसित थे, और फिलहाल घर पर स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं, वे खुद इस मीटिंग में नहीं थे। यही कारण था कि कल की मीटिंग की अध्यक्षता रांची प्रेस क्लब के उपाध्यक्ष पिंटू दूबे ने की।

उपाध्यक्ष पिंटू दूबे ने कह दिया कि वे क्लब के तो साथ है, पर कानूनी कार्रवाई का कोई मतलब नहीं निकलता। महासचिव अखिलेश कुमार सिंह जो इस विवाद के केन्द्र बिन्दु में हैं, उनका कहना था कि अगर कमेटी कानूनी कार्रवाई नहीं करती तो वे खुद व्यक्तिगत तौर पर कानूनी कार्रवाई करेंगे। संयुक्त सचिव जावेद खान कड़ी कानूनी कार्रवाई के पक्ष में दिखे, लेकिन स्क्रीनशॉट्स बाहर भेजनेवालों पर भी कानूनी कार्रवाई करने पर जोर डाला। जयशंकर कोषाध्यक्ष भी कानूनी कार्रवाई के पक्ष में दिखा।

कार्यकारिणी के उम्रदराज सदस्य गिरिजा शंकर ओझा ने जल्दबाजी में कदम न उठाने की बात कही। रंगनाथ चौबे, अमित दास कानूनी कार्रवाई पर एकमत नहीं दिखे, वहीं दीपक जायसवाल, सुनील गुप्ता, ने कानूनी कार्रवाई का समर्थन किया। कार्यकारिणी के अन्य सदस्य जैसे प्रियंका मिश्रा, सैयद शहरोज कमर, कुमार शानू, एवं प्रभात सिंह बैठक से अनुपस्थित दिखे। मतलब अधिकारियों की टीम अध्यक्ष, उपाध्यक्ष से लेकर कार्यकारिणी सदस्यों में ज्यादातर लोग कानूनी कार्रवाई के पक्ष में नहीं है।

इधर वरिष्ठ वयोवृद्ध पत्रकार अपने नाम नहीं लिखने के शर्त पर कहते हैं कि जो हुआ सो बुरा हुआ, और जो आगे होने जा रहा हैं, वो और बुरा होगा, इसलिए बुद्धिमानी कानूनी पचड़े में नहीं, बल्कि बुद्धिमानी इसमें है कि अपने घर को अपनी ही चिराग से जलने या खाक होने से कैसे बचाएं? इन पत्रकारों का यह भी कहना था कि जो भी अब तक हुआ या हो रहा है, वो नैतिकता/अनैतिकता की लड़ाई नहीं, बल्कि अनुभवहीनता की लड़ाई है और इसी अनुभवहीनता में सभी अपना कुछ न कुछ गवायेंगे।

इन वयोवृद्ध पत्रकारों का ये भी कहना था कि दोनों पक्ष अहम् त्यागें और मिलबैठकर समस्या का समाधान करें, जो अनुभवी लोग हैं, वे आगे आये, अपने ही समाज के बड़े-बुजूर्गों का इसमें अनुभव लाभ लें, निश्चय ही इसका फायदा दिखेगा, नहीं तो इस प्रकार की थूकम-फजीहत पत्रकार कहेजानेवाले बुद्धिजीवियों के उपर लानत हैं, इससे ज्यादा और कुछ कहने की भी जरुरत नहीं।

इन वयोवृद्ध पत्रकारों ने यह भी कहा कि उन्हें खुशी हुई कि राजधानी के सभी प्रमुख अखबारों ने इस प्रकरण से स्वयं को किनारा किया, यहां तक की रांची प्रेस क्लब के लोगों ने जो प्रेस कांफ्रेस आयोजित किया था, उस प्रेस कांफ्रेस को भी न तो कवर किया और न ही जगह दी। जगह तो उन अखबारों ने भी नहीं दी, जहां से वे महाशय जुड़े थे। इसलिए ये सारी बातें समझने की जरुरत हैं, समझेंगे तो बेहतर माहौल बनेगा, नहीं समझेंगे तो जायेंगे। सच्चाई यह है कि अभी कोरोना से जूझ रहे पत्रकारों और उनके परिवारों को मदद करने का समय हैं, तो ये लोग चल रहे हैं कानूनी लड़ाई लड़ने, पता नहीं ऐसे लोगों को कौन बुद्धि देता है, ये समझ से परे हैं।

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