कोरोना को लेकर कुछ भी निर्णय लेने के पहले हेमन्त सरकार गरीबों को केन्द्र में अवश्य रखें, नहीं तो ऐसा नहीं कि लोग कोरोना के चक्कर में भूख से ही दम तोड़ दें

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मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन ने राज्य में बढ़ते कोरोना के प्रकोप को देखते हुए धुर्वा स्थित झारखण्ड मंत्रालय में एक उच्चस्तरीय बैठक की। जिसमें राज्य के स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता, मुख्य सचिव सुखदेव सिंह, स्वास्थ्य सचिव के के सोन समेत अन्य अधिकारियों ने भाग लिया। यह बैठक स्पष्ट रुप से बता रही है कि सरकार कोरोना को लेकर कितनी गंभीर है।

गंभीर इसलिए कि आजकल रांची से प्रकाशित ज्यादातर अखबार कोरोना को लेकर ही ज्यादा मुखर है, ये प्रतिदिन हो रहे कोरोना मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए, उसकी भयावहता को जनता/सरकार के समक्ष रख रहे हैं, ताकि जनता/सरकार सावधानी बरतें, क्योंकि कोरोना से आप तभी लड़ सकते हैं, या बच सकते हैं, जब आप सावधानी बरतेंगे, जैसे मास्क का उपयोग करेंगे, कम से कम छह फीट की दूरी पर स्वयं को रख किसी से बात करेंगे, बराबर हाथ धोते रहेंगे, खुद को सैनिटाइज्ड करते रहेंगे।

सच्चाई भी यही है कि जैसे ही कोरोना कमजोर पड़ता गया, लोग खुद को या यूं कहे कि कोरोना से बचाव पर ध्यान देना छोड़ दिया, नतीजा सामने है कि कोरोना फिर हमारे सामने मुंह बाएं खड़ा है, अब ऐसी स्थिति में जबकि राज्य के ही एक प्रशासनिक अधिकारी को कोरोना हो जाने पर एक बेड तक उपलब्ध नहीं होता है, और वो इलाज के लिए दूसरे राज्य जाने लगते हैं और रास्ते में ही मौत हो जाती हैं तो यह घटना अपने आप में बता देती है कि स्थिति कितनी गंभीर होती चली जा रही है, ऐसे में सरकार और सरकार को सुझाव देनेवाले अधिकारियों का दल कुछ न कुछ प्रावधानों को जमीन पर उतारने के लिए कठोरता से जरुर ही पेश आयेगा।

इन्ही कठोरता में पुनः लॉकडाउन न हो जाये, यह लॉकडाउन की पीड़ा, उन गरीबों को सालती जा रही है, जो लॉकडाउन के आसन्न आहट को देखने के पूर्व ही भयभीत है, क्योंकि एक तरफ उसके सामने कोरोना है तो दूसरा उसके लिए जीने की सामग्रियों पर फिर से पहरा, ऐसे में वो और उसका परिवार जियेगा कैसे? सवाल तो यह भी है, लेकिन जिस प्रकार से पिछले साल हेमन्त सरकार ने राज्य की जनता के साथ मिलकर कोरोना से लड़ाईया लड़ी, लोगों के हौसले बुलंद किये, जिजीविषा को समझा, आशा करनी चाहिए कि वो चीजें इस बार भी दिखेंगी।

इस बार की कोरोना के लहर से ज्यादा वे लोग दुखी है, जो अत्यंत निर्धन है, जिनकी रोजी-रोटी प्रतिदिन के आमदनी पर टिकी रहती है, अगर बाजार बंद हुआ, लॉकडाउन हुआ, उनकी प्रतिदिन की आमदनी पर रोक लगी, तो निश्चय ही अबकी बार की दुबारा मार से इनकी आवाज ही सदा के लिए बंद हो जायेगी।

मैं देख रहा हूं कि रांची में रिक्शा चलानेवाला, खोमचा लगानेवाला, सड़कों पर चाट बेचनेवाला, सड़कों पर टायर-ट्यूब का मरम्मत करनेवाला, सिलाई करनेवाला, जूते-चप्पलों की मरम्मत करनेवाला, टेम्पू चलानेवाला, मंदिर में घंटी बजानेवाला अभी से ही परेशान हो चला है, उसे समझ नहीं आ रहा कि अगर फिर से लॉकडाउन हो गया तो वह अपने परिवार को कैसे चलायेगा?

सरकारी नौकरीपेशावाले लोगों का क्या है? वे तो जैसे-तैसे खुद को संभाल लेंगे, उन्हें तो वेतन भी नहीं कटेगा, पर जो निजी क्षेत्रों में काम करते हैं, उनका तो अभी से पिछले साल का ट्रेलर सामने दिखने लगा है, उन्हें डर सता रहा है कि, कही फिर से उनके वेतन न काट लिये जाये, कही नौकरी न चली जाये, ऐसे में इन सभी पर ध्यान देने की जरुरत हैं, और यह सरकार का धर्म भी बनता है।

विद्रोही24 का सुझाव होगा कि राज्य सरकार, गरीबों के जीवन प्रभावित न हो, इसका विशेष ख्याल रखें, उनके जीवन प्रभावित न हो, इस पर विशेष ध्यान रखते हुए ही किसी बिंदु पर आकर, कोई निर्णय करें, ज्यादा से ज्यादा लोगों को टीकाकरण करायें, लॉकडाउन की घोषणा तभी हो, जब स्थिति हाथ से निकलता दिखाई दें, क्योंकि वर्तमान में कही ऐसा न हो कि लोग कोरोना से कम और भूख से ज्यादा ही मर जाये।

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