क्योंकि उस वक्त आप थोड़ा वक्त की भीख मांगेंगे, और वक्त के पास आपको देने के लिए वक्त नहीं होगा

जो आप चाहते हो, ईश्वर उसे खुलकर देता है, वो कोई कटौती नहीं करता, बस ये आपके उपर निर्भर करता है कि आपने ईश्वर से मांगा क्या? मैं 53 वर्ष में प्रवेश कर चुका हूं, इस दौरान जीवन-पथ पर अनेक लोग मिले, जिनसे मैंने सीखा और जो लोग मुझसे सीखना चाहे, उन्हें निस्वार्थ भाव से सिखाया, और मन में कोई लालसा भी नहीं रही कि जिन्हें मैंने सिखाया, उनसे कुछ प्राप्त हो, या वे मुझे सम्मान दें। 

जो आप चाहते हो, ईश्वर उसे खुलकर देता है, वो कोई कटौती नहीं करता, बस ये आपके उपर निर्भर करता है कि आपने ईश्वर से मांगा क्या? मैं 53 वर्ष में प्रवेश कर चुका हूं, इस दौरान जीवनपथ पर अनेक लोग मिले, जिनसे मैंने सीखा और जो लोग मुझसे सीखना चाहे, उन्हें निस्वार्थ भाव से सिखाया, और मन में कोई लालसा भी नहीं रही कि जिन्हें मैंने सिखाया, उनसे कुछ प्राप्त हो, या वे मुझे सम्मान दें। 

क्योंकि जब मैं कक्षा छठी में था तो मेरे बाबुजी ने कहा कि तुम्हें योगेन्द्र बाबू के यहां श्रीरामचरितमानस का पाठ करना है, मैं जल्द से तैयार हो गया और लीजिये आश्विन शुक्लप्रतिपदा के नवाह्ण परायण के अवसर पर श्रीरामचरितमानस का पाठ शुरु कर दिया। योगेन्द्र बाबू अपने मुहल्ले के बहुत ही सामाजिक और आध्यात्मिक पुरुष थे, रेलवे में काम करते थे, और धर्म के प्रति उनकी गहरी अभिरुचि थी। 

जब श्रीरामचरितमानस का पाठ समाप्त होता तो वे श्रीरामचरितमानस के अनछूए पहलूओं पर बातचीत करते। इसी दौरान श्रीरामचरितमानस के एक दोहे ने मेरे जीवन में अमिट छाप छोड़ दी, प्रसंग महाराज दशरथ के निधन से जुड़ा हैं और महर्षि वशिष्ठ और भरतसंवाद का है, जब महर्षि वशिष्ठ भरत से कहते हैं

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ।

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।

ये दोहा इतना सरल है कि इसका भावार्थ लिखना मैं जरुरी नहीं समझता, क्योंकि मेरे आलेख को पढ़नेवाले इतना तो जरुर ही समझ लेंगे कि इस दोहे के माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने क्या कहना चाहा है?

इधर देख रहा हूं कि आजकल कुकुरमुत्ते की तरह बहुत सारे चैनल, अखबार पोर्टल खुल गये हैं, जहां चिरकूट टाइप के संपादकों, संवाददाताओं ने कब्जा जमा लिया हैं, ये संपादकसंवाददाता सोशल साइट पर तो खुब मर्यादा पुरुषोत्तम बन रहे हैं, पर जहां काम कर रहे हैं, वहां वे क्या बन रहे हैं, उन्हें अच्छी तरह से पता हैं, पर बेशर्मी के आवरण को ओढ़कर, उन्होंने बेशर्मों को भी मात दे दी हैं, इसमें आप एक को दोषी नहीं ठहरा सकते, एक ढूंढेंगे, हजारों मिल जायेंगे।

इसी रांची में कई संपादक आपको ऐसे मिल जायेंगे, जिनके मातापिता आज भी जीवित है, पर उनके सोशल साइट पर उनके मातापिता या जिन्होंने इस मुकाम तक उसे पहुंचाया, उसके प्रति दो शब्द कहने को उनके पास टाइम नहीं हैं और श्रद्धा दिखा रहे हैं, पर अपने चैनल मालिकों के साथ फोटो खिंचाने, चिरकूट टाइप के अपने सीनियर्स के साथ सेल्फी लेकर, उसे सोशल साइट्स पर डालने और घटिया स्तर के नेताओं/अधिकारियों के साथ सेल्फी लेने में गजब की तेजी दिखा रहे हैं। 

लेकिन सत्य को प्रतिष्ठित करने की बात आयेगी तो देखिये इनका चेहरा कैसे गिरगिट की तरह रंग बदलता है, लेकिन इन्हीं गिरावटों के बीच कुछ ऐसे पत्रकार भी है, जिन्होंने कुछ बेहतर करने का संकल्प लिया है, बेहतर कर रहे हैं और वे एक बेहतर दिशा में देश को ले जाने के लिए वचनबद्ध है, और हमें लगता है कि निश्चय ही इनका प्रयास रंग लायेगा। एक सुन्दर परिदृश्य आनेवाले समय में दिखेगा।

और अब एक दृष्टांत सुनाता हूं झारखण्ड विधानसभा का मानसून सत्र 22 जुलाई से प्रारम्भ हुआ और 26 जुलाई तक चला। इस दौरान कई अखबारों चैनलों के रिपोर्टर्सछायाकार विधानसभा जाते, समाचार चयन करते और अपने संस्थानों के माध्यम से लोगों तक पहुंचाते, पर सच पूछिये तो इस भीड़ में, इस मानसून सत्र में लोगों ने एक ही पत्रकार को जाना, उसका नाम था सन्नी शरद।

पत्थरगामा झारखण्ड का रहनेवाला यह बच्चा, अपने सत्कार्यों से बहुत तेजी से लोगों के दिलों में जगह बनाई है, उसने बहुत को खिलखिलाने पर मजबूर किया है, बहुत के हृदय में जीने की लालसा जगाई है, बहुत को मदद किया है, पर निस्वार्थ भाव से। उसके साथ कुछ लोगो की टीम भी है, जो उसके फैन है, संयोग हैं, वो टीम मुझे भी पसंद है। उसके जो कुछ दोस्त हैं, मैं मानता हूं कि उन्होंने बहुत अच्छे प्रयास करने शुरु किये है, और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इनके रहते पत्रकारिता मैली नहीं होगी। उनमें नाम है आनन्द दत्ता, अखिलेश कुमार सिंह, पंकज पाठक और राहुल गुरु का।

इन दिनों सन्नी शरद चर्चा में हैं। रांची से लेकर दिल्ली और देश के अन्य शहरों में। चर्चा है कि उन्होंने नगर विकास मंत्री सी पी सिंह और इरफान अंसारी के बीच हुए वादविवाद को जनता के बीच रखा और फिर ये खबर देशविदेश के चैनलों तक पहुंच गई। मेरा मानना है कि कोई भी खबर, कोई भी चैनल तभी चलाता है, जब खबर में कोई जान होती है, या उक्त चैनल को लगता है कि इस खबर से उसे लोकप्रियता मिलेगी, उसकी साख बढ़ेगी, निःसंदेह सभी ने इसका फायदा उठाया और चूंकि ये खबर सिर्फ सन्नी शरद के पास थीतो निःसंदेह फायदा सन्नी शरद को ही मिलना था।

आखिर सन्नी शरद को ये फायदा क्यों मिला, आखिर जो बात सदन के अंदर हुई, वहीं बात तो सदन के बाहर हुई, तो हमारा मानना है कि जब आप अच्छा काम करते हैं और लोगों की दुआएं जब भारी मात्रा में आपको मिलती है, तो ईश्वर के यहां भी आपकी दुआएं जब घड़े में भरकर छलकने की ओर जाती हैं तो ईश्वर अपनी शक्ति का ऐहसास कराता हैं और आपके ही उस घट से वह चीजें प्रदान करता हैं, जिसे आप यश कहते हैं, जो मनुष्य के जीवन में प्रारब्ध, प्रार्थना और प्रयास से जुड़ा होता है। इसमें बड़ा संस्थान या छोटा संस्थान काम नहीं करता, आप कही भी रहेंगे, वो यश आपको प्राप्त होगा, इसे सभी को गांठ बांध लेना चाहिए।

अगर कोई यह कहता है कि बड़ा संस्थान में काम करने से यश और धन मिलते हैं, तो मैं इसे नहीं मानता, रांची में बहुत सारे लोग बड़ेबड़े संस्थानों में काम करते हैं, जवानी ठीक से देखा नहीं, भाषा पर पकड़ नहीं, बोलने तक नहीं आता, केवल लायजनिंग और पैसे बटोरने की कला थोड़ी सी गई, चाटुकारिता में पीएचडी कर लिये, और संपादक बन गये, ऐसे लोग जब किसी आइएएस या आइपीएस या किसी नेता के पास जाते हैं तो वे भ्रष्ट लोग, उन्हें किस निगाहों से देखते हैं, वो मैंने नजदीक से देखा हैं, क्योंकि संयोग से मैंने कुछ पल सरकारी विभाग में काम कर बिताएं हैं।

और इधर देखिये, सन्नी शरद की। वो संयोग से उस संस्थान में भी काम किया है, जहां मैंने भी कुछ महीने बिताए हैं, और देखा जाये तो उस संस्थान को सबसे पहले अलविदा करने का सौभाग्य भी मुझे ही प्राप्त है। आज सन्नी शरद हर जगह छाया हुआ है, क्योंकि उसकी खबर ने धमाल मचाया है, आखिर ये धमाल कैसे मचता है, मैंने उसका जिक्र उपर में कर दिया है। उसे समझने की कोशिश करिये, भीड़ मत बनिये, भीड़ से अलग हटिये। संस्कृत साहित्य में लिखा है

अधमाः धनम् इच्छन्ति, धनं मानं मध्यमाः।

उत्तमाः मानम् इच्छन्ति, मानो हि महतां धनम्।

कहने का मतलब है, धनपशु मत बनिये। राजकोट के दीवान के बेटे थे, गांधी जब उन्होंने धन फैशन दोनों को ठुकराया तो आज देख लीजिये, पूरा विश्व उनका मुरीद हो गया। जवाहर लाल नेहरु बहुत बड़े धनाढ्य घर के थे, जब उन्होंने फूलों की सेज को छोड़ा, तो वे कहां से कहां पहुंच गये। लाल बहादुर शास्त्री को देखिये वे प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे और उसके बाद भी जो उन्होंने सादगी अपनाई, उस सादगी के आगे आज पूरा भारत नतमस्तक हैं। 

मैं तो अभी भी कहता हूं कि देश को स्वामी योगानन्दस्वामी विवेकानन्द जी जैसे महायोगियों की आवश्यकता है, कि आजकल के छद्म योगियों जो धन का पहाड़ खड़ा करने में लगे है, देश को पीएम के रुप में लाल बहादुर शास्त्री चाहिए, जो देश के लिए कुछ करें, कि डिस्कवरी चैनल में जाने के लिए माथा खपाएं, कहने को तो बहुत कुछ है, समझना है समझिए, नहीं तो दरवाजा खुला है, आप को जहां जाना है, ईश्वर आराम से भेज देगा, पर याद रखियेगा, जब मृत्यु निकट आयेगी और आपके गत जीवन का संक्षिप्त ट्रेलर दिखायेगी तो सिर्फ आपको रोने के सिवा कुछ प्राप्त नहीं होगा, क्योंकि उस वक्त आप थोड़ा वक्त की भीख मांगेंगे, और वक्त के पास आपको देने के लिए वक्त नहीं होगा।

Krishna Bihari Mishra

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