राजनीति

बाबूलाल मरांडी ने कहा CNT/SPT संशोधन विधेयक लाने का प्रयास बंद करे रघुवर सरकार

राज्य के प्रथम मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री रघुवर सरकार को पत्र लिखकर आगाह किया है कि वो सीएनटी/एसपीटी संशोधन विधेयक को नये सिरे से लाने का प्रयास न करें। उन्होंने कहा कि सीएनटी/एसपीटी संशोधन के लिए कोई कदम नहीं उठाना चाहिए, क्योंकि आजादी से पूर्व जो भी यहां संघर्ष हुए है, वे जमीन को लेकर ही हुए, जिसके परिणामस्वरुप सीएनटी/एसपीटी एक्ट का गठन हुआ।

सीएनटी/एसपीटी एक्ट में पूर्व से ही प्रावधान है कि सरकार विकास कार्यों के लिए जमीन का अधिग्रहण कर सकती है, ऐसे भी आजादी के बाद बड़े-बड़े कल-कारखानों/खादानों/डैमों आदि के निर्माण के लिए सरकारें यहां की जमीन अधिग्रहण की है। जिससे कई गांव उजड़ गये, जो गांव उजड़े वहां के लोग कहां गये, कोई अता-पता नहीं है, विस्थापन का सर्वाधिक प्रभाव यहां के आदिवासियों पर ही पड़ा, जो 1951 में कुल आबादी के 36% थे, आज घटकर 26% हो गये। उन्होंने सरकार को कुछ सुझाव भी दिये। जो इस प्रकार है –

  • विस्थापन एवं पुनर्वास आयोग गठित करें, ताकि पूर्व में ऊजाड़े गये लोगों की हालातों का अध्ययन किया जा सकें, सर्वेक्षण रिपोर्ट सार्वजनिक किया जा सकें।
  • कल-कारखानें, शिक्षण संस्थानों एवं अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए सरकार लीज रेंट की व्यवस्था करें, ताकि उन्हें प्रत्येक माह एक निश्चित रेंट मिलता रहे और जमीन का मालिकाना हक भी बनी रहे। सरकार या निजी उद्यमी, परियोजना के समाप्त होने पर उस जमीन की खरीद-बिक्री नहीं कर पायें। पूर्व मे भी भिन्न-भिन्न परियोजनाओं के लिए भूमि का अधिग्रहण किया गया, परियोजना के बंद होने पर या अधिग्रहीत अतिरिक्त भूमि रहने पर सरकार या निजी उद्यमियों ने भूमि को अन्यत्र बेचने का काम किया। उदाहरणस्वरुप एकीकृत बिहार में गरीब किसानों से हाउसिंग बोर्ड ने जमीन अधिग्रहण किया। हाउसिंग बोर्ड का मूल उद्देश्य अधिगृहीत जमीन पर मकान/फ्लैट/प्लॉट विकसित कर जरुरतमंद लोगों को आवास उपलब्ध कराना था, कुछ हद तक यह प्रक्रिया सफल भी रही लेकिन झारखण्ड के विभिन्न शहरों में हाउसिंग बोर्ड द्वारा अधिग्रहित खाली पड़ी जमीन को टेंडर कर फ्लैट और दुकान निर्माण के लिए एंजेंसी को दिया गया एवं  हाउसिंग बोर्ड ने व्यावसायिक उपयोग के लिए दुकान को ऊंची बोली लगाकर बाजार में बेच दिया। जिन किसानों से जमीन अधिग्रहण किया गया, उन किसानों को लाभांश नहीं मिला।
  • होटवार में पशुपालन, संरक्षण एवं संवर्धन के लिए सरकार द्वारा जमीन का अधिग्रहण किया गया, उसी अधिग्रहित जमीन पर केन्द्रीय कारा, स्पोर्ट्स कॉम्पलेक्स बनाया गया। सरकार ने बची अतिरिक्त जमीन नागार्जुन कंपनी से अपार्टमेंट बनाकर मंहगे दाम पर बेच दिया। अभी हाल में पशुपालन विभाग के 20 एकड़ जमीन को टेक्सटाइल पार्क के निर्माण के लिए 200 करोड़ में एक कंपनी को दे दिया गया, यानि सरकार किसानों से कौड़ी के भाव जमीन जोर-जबर्दस्ती कर अधिग्रहण करती है और फिर उसी जमीन को सरकार बेचकर मुनाफा कमाती है, इसके बदले में किसानों को कुछ नहीं मिलता।
  • देवघर स्थित डाबर ग्राम में आज से 45-50 वर्ष पूर्व सरकार ने जमीन अधिग्रहण कर डाबर कंपनी को द्वा उत्पादन फैक्ट्री के निर्माण के लिए दिया था। 40 साल तक उदयोग चला भी और कंपनी ने मुनाफा कमाया। उद्योग बंद हो जाने पर सरकार द्वारा उक्त अधिग्रहीत जमीन को डाबर कंपनी ने बड़े-बड़े मालिकों को बेच दिया।
  • सरकारी उपक्रमों जैसे एचईसी रांची, बोकारो स्टील प्लांट ने अतिरिक्त जमीन को ऊंचे दामों पर व्यवसायिक कार्यों के लिए छोटे-छोटे उद्यमियों/व्यक्तियों को बेच दिया।
  • टाटा कंपनी ने भी जमशेदपुर में अतिरिक्त जमीन को व्यवसायिक कार्यों के लिए निजी उद्यमी/व्यक्ति के हाथों बेच दिया।

इसलिए सरकार कोई ऐसा कार्य न करें, जिससे झारखण्ड की जनता को पुनः नुकसान उठाना पड़े।

झारखण्ड धर्म स्वतंत्र विधेयक की आलोचना

पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने कल कैबिनेट से पास झारखण्ड धर्म स्वतंत्र विधेयक की कड़ी आलोचना की है, उन्होंने कहा कि इससे जनता को मिले मौलिक अधिकार – धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन हो रहा है। उन्होंने कहा कि अगर कोई जबरन धर्मांतरण कराता है, तो उसे रोकने तथा उस पर कड़ी कार्रवाई के लिए पहले से ही संविधान में प्रावधान है, तो फिर ऐसे विधेयक की क्या जरुरत। उन्होंने कहा कि तारा शाहदेव उसका स्पष्ट उदाहरण है कि उस कानून के तहत आरोपी के खिलाफ कानून अपना काम कर रहा है, इसलिए सरकार को चाहिए कि ऐसा कोई काम न करें, जिससे लोगों के संवैधानिक अधिकार का हनन होता हो।