रांची बन रहा आत्महत्या करनेवाले नागरिकों का शहर

जिस शहर को झरनों के शहर के नाम से जाना, जाना चाहिए, जिस शहर को मंदिरों के शहर के नाम से जाना, जाना चाहिए। आज वह आत्महत्या करनेवाले नागरिकों के नाम से जाना जा रहा है। इन दिनों आत्महत्या करनेवालो की रफ्तार बढ़ सी गई है, हालात यह है कि एक ही दिन में दो-दो आत्महत्याएं हो रही है और पूरा शहर सोया हुआ है।

जिस शहर को झरनों के शहर के नाम से जाना, जाना चाहिए, जिस शहर को मंदिरों के शहर के नाम से जाना, जाना चाहिए। आज वह आत्महत्या करनेवाले नागरिकों के नाम से जाना जा रहा है। इन दिनों आत्महत्या करनेवालो की रफ्तार बढ़ सी गई है, हालात यह है कि एक ही दिन में दो-दो आत्महत्याएं हो रही है और पूरा शहर सोया हुआ है। आखिर रांची शहर की ये हालत क्यों है?  स्थानीय नागरिक बताते है कि पूर्व में ऐसी हालात नहीं थी, लोग जीवट थे, और जीना जानते थे, पर इधर निराशा ने ऐसा माहौल तैयार किया है कि लोग अब जीना नहीं चाहते। जरा देखिये इन दिनों कैसे- कैसे लोगों ने आत्महत्या किये है –

  • 10 जून को पिठोरिया के सिमलबेड़ा गांव के किसान कलेश्वर महतो ने फांसी लगाकर आत्महत्या की। पत्नी के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड पर 40 हजार का लोन इन्हें मिला था, जिसे वे चुका सकने में असमर्थ थे।
  • 15 जून को पिठोरिया के ही सुतियांबे में किसान बालदेव महतो ने कुएं में कूद कर जान दे दी, उन्होंने 25 हजार का कर्ज बैंक से लिया था।
  • 2 जुलाई ओरमांझी के विजांग गांव में किसान राजदीप ने कीटनाशक खाकर जान दे दी थी, इनके परिजनों ने बताया कि इन्होंने बैंक से 90 हजार का लोन लिया था।
  • 1 अगस्त को स्पेशल ब्रांच के इंस्पेक्टर की बेटी पूजा आनन्द ने धुर्वा डैम में कुद कर जान दे दी, बताया जाता है कि कॉलेज ड्रेस खरीदने को लेकर मां से विवाद होने के कारण, उनसे आत्महत्या कर ली, जबकि वह गोस्सनर कॉलेज में बीटेक की छात्रा थी।
  • 1 अगस्त को ही कांके रोड के विनय शांति अपार्टमेंट के पांचवे तल्ले पर रहनेवाली युवती राखी ने आत्महत्या कर ली। राखी धनबाद के राजगंज की रहनेवाली थी और वह कांके के विनयशांति अपार्टमेंट में सेवानिवृत्त अवर सचिव मनोज मिश्रा के घर में काम करती थी।
  • 3 अगस्त – रांची के सेवा सदन अस्पताल के ठीक सामने पार्किंग में एक युवक ने पेड़ से लटककर आत्महत्या कर ली।

आश्चर्य इस बात की है, पूरे शहर में आत्महत्या करने की प्रतियोगिता सी चल रही है, और लोग शांत बैठे है, अखबारों में समाचार छप गया, चैनल में बाते आ गयी और काम तमाम। सरकार और उनसे जुड़ी संस्थाओं का बुरा हाल है, रही निजी संस्थाओं की तो उन्हें नेताओं के पैसे से गुलछर्रे उड़ाने से सिर्फ मतलब है, रांची में क्या हो रहा है? कोई मतलब नहीं। जिनके घर में आत्महत्या जैसी घटनाएं हो रही है, उनका तो दिल ही टूट गया है, वे क्या करें, क्या नहीं करें, जैसे हालात में है। पहले गरीबी से तंग आकर लोग आत्महत्या करें, तो बातें समझ में आती थी, पर अब जो आत्महत्या के कारण मिल रहे है, उन कारणों को सुनकर दिल दहल जाता है कि क्या ये भी कोई कारण हो सकता है। जरा देखिये – पूजा ने कॉलेज ड्रेस खरीदने को लेकर मां से विवाद हुआ और उसने आत्महत्या कर ली। इसी प्रकार एक दो साल पहले की घटना है कांके डैम में एक लड़की की लाश मिली, पता चला कि उसने आत्महत्या इसलिए की, क्योंकि उसकी मां ने छोटे ड्रेस पहनने को मना किया था।  जहां इस प्रकार की मनःस्थिति हो जाय तो साफ है कि हमारा समाज बहुत नीचे तक चला गया।

रांची के सुप्रसिद्ध चिकित्सक एवं आइएमए के वरीय पदाधिकारी डा. अजय कुमार सिंह बताते है कि चूंकि रांची शहर परंपरागत ढंग से जीनेवालों का शहर रहा है, जिस पर आधुनिकीकरण ने ऐसा प्रभाव डाला कि इस आधुनिकीकरण ने यहां के जीने के तरीके में मानसिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भारी बदलाव लाया और इस बदलाव ने प्रतिस्पर्द्धा का ऐसा बयार लाया कि लोग इसमें चाहे-अनचाहे डूबने लगे, जिसका नतीजा सामने है। इस प्रतिस्पर्द्धा में जो लोग संघर्ष किये वे आगे निकले और जिन्होंने हार मान ली, उन्होंने मौत को गले लगाने में ही शान समझी। ऐसे भी यहां संघर्ष करनेवालों की अभी भी कमी नहीं, पर हार माननेवालों की भी कमी नहीं। स्थिति ऐसी है कि जब संघर्ष करनेवाले बार्डर लाइन तक पहुंचते है, तो वे निराशा के भाव में चले जाते है, ऐसी निराशा जिसे बचाया जा सकता है, समय पर, पर समय बीत जाने के बाद इन्हें घोर निराशा से बचाना थोड़ा कष्टप्रद हो जाता है। वे यह भी कहते है कि समाज और परिवार की मानसिकता भी इसके लिए जिम्मेवार है। डा. अजय कुमार सिंह, शहर के हालात देखकर, खासकर युवाओं द्वारा आत्महत्या करने की प्रवृत्ति को देखकर कहते है—

सीने पे जलन

आंखों में तूफान सा क्यों हैं?

इस शहर में,

हर शख्स परेशान सा क्यूं हैं?

कुल मिलाकर देखा जाय, तो सभी आत्महत्या के इस दौर को, समाज के आधुनिकीकरण से जोड़कर देख रहे है। वे कहते है कि लोग आज ज्यादा परेशान इसलिए है कि वे यह देख रहे है कि हमारे बगलवाला पड़ोसी सुखी और प्रसन्न क्यों है? वह स्वयं सुखी होने या प्रसन्न होने का प्रयास नहीं करता, बल्कि दूसरों को तंग करने और बर्बाद करने में ज्यादा समय लगा रहा है, और इसी सोच ने उसे आत्महत्या के जाल में ऐसा फंसाने लगा कि आज के व्यक्ति को आत्महत्या ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प सूझता है, और यह विकल्प उसके परिवार या आनेवाली पीढ़ी को ऐसा रोग दे जाता है कि उस परिवार को संभलने में कई बरस गुजर जाते हैं।

Krishna Bihari Mishra

One thought on “रांची बन रहा आत्महत्या करनेवाले नागरिकों का शहर

  1. वाकई बहुत चिंता का विषय है सर। झारखंड तो है ही, पूरे देश में इस तरह की घटनाएं अब आम हो गयी हैं। चाहे वो सेलिब्रिटी हो, या कोई आम आदमी।

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