चूंकि वे माननीय है, इसलिए उन्हें करोड़ों की जमीन कौड़ियों में प्राप्त करने का अधिकार हैं…

क्या हमारे माननीय इतने दरिद्र है कि वे अपने से, अपने लिए एक जमीन का टूकड़ा नहीं खरीद सकते?
क्या हमारे यहां के माननीयों को रहने के लिए झारखण्ड में कहीं भी जमीन का टूकड़ा नहीं है?
क्या हमारे माननीयों को रांची में जमीन लेना अतिआवश्यक है? क्या रांची में जमीन नहीं रहने पर, वे सम्मानपूर्वक दूसरी जगह जीवित नहीं रह सकते?
क्या वे बिना सरकारी सहयोग के अपना घर नहीं बना सकते?

  • क्या हमारे माननीय इतने दरिद्र है कि वे अपने से, अपने लिए एक जमीन का टूकड़ा नहीं खरीद सकते?
  • क्या हमारे यहां के माननीयों को रहने के लिए झारखण्ड में कहीं भी जमीन का टूकड़ा नहीं है?
  • क्या हमारे माननीयों को रांची में जमीन लेना अतिआवश्यक है? क्या रांची में जमीन नहीं रहने पर, वे सम्मानपूर्वक दूसरी जगह जीवित नहीं रह सकते?
  • क्या वे बिना सरकारी सहयोग के अपना घर नहीं बना सकते?

जब वे अपने लिए, अपने से, ऐसा नहीं कर सकते, तो फिर ये सामान्य जनता के लिए क्या करेंगे? ऐसे माननीयों को तो माननीय कहलाने का भी हक नहीं। जरा देखिये, कल रघुवर सरकार के कैबिनेट का फैसला – जिसमें सरकार ने यहां के विधायकों और सांसदों की गृह निर्माण समिति को 35 एकड़ जमीन उपलब्ध करायी है। यह जमीन रांची के कांके प्रखण्ड के चुटू मौजा में 70.83 करोड़ की लागत पर उपलब्ध करायी गई है। जमीन का मूल्य निर्धारित करने के लिए 2014 में राज्य सरकार की ओर से तय दर को आधार बनाया गया है।

सवाल उठता है कि भाई, ये सब क्यों?

वर्तमान में 20 सांसद है, लोकसभा और राज्यसभा मिलाकर, जबकि 81 निर्वाचित विधायक और एक मनोनीत विधायक है। सवाल उठता है कि आम जनता लाखों खर्च कर जमीन खरीदे और माननीय कौड़ियों के भाव से जमीन प्राप्त करें, ये किस संविधान में लिखा है भाई? क्या इस राज्य में सांसद और विधायक इसीलिए बनते है, ताकि वे जनता की छाती पर ईट, बालू, छड़ और कंक्रीट गिराकर अपने लिए महल तैयार करें. ये तो शर्मनाक है।

कमाल है, अपने और अपने परिवार के लिए मेवे की तैयारी करनेवाली इस सरकार के इस निर्णय के खिलाफ, सभी विपक्षी दलों ने भी चुप्पी साध ली है, क्योंकि मेवा किसे अच्छा नही लगता, बेचारी झारखण्ड की मूर्ख जनता, तो मूर्ख ही रहेगी…

 

Krishna Bihari Mishra

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