जैसे-जैसे साल बदलता चला गया, आजादी के जश्न मनाने का जोश भी काफूर होता…

बात उन दिनों की है, जब मैं आकाशवाणी पटना के युववाणी एकांश में आकस्मिक उद्घोषक के रुप में कार्यरत था। उस वक्त हमारे कार्यक्रम अधिशाषी रमा शंकर थे। उन्होंने ‘घूमता माइक्रोफोन’ के लिए भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर लोगों की राय मंगवाई, जो स्वतंत्रता दिवस को लेकर, लोगों के बदलते दृष्टिकोण से संबंधित था।

बात उन दिनों की है, जब मैं आकाशवाणी पटना के युववाणी एकांश में आकस्मिक उद्घोषक के रुप में कार्यरत था। उस वक्त हमारे कार्यक्रम अधिशाषी रमा शंकर थे। उन्होंने ‘घूमता माइक्रोफोन’ के लिए भारतीय स्वतंत्रता दिवस पर लोगों की राय मंगवाई, जो स्वतंत्रता दिवस को लेकर, लोगों के बदलते दृष्टिकोण से संबंधित था। हमने इस कार्यक्रम के लिए चुनाव किया, ऐसे लोगों की जिनकी उम्र 15 अगस्त 1947 के समय 18 से 25 वर्ष की रही हो और संयोग से ऐसे लोग मिल भी गये, जिनकी उम्र 15 अगस्त 1947 के समय 18 से 25 वर्ष की थी और कार्यक्रम जिस दिन प्रसारण  होना था, उस वक्त वे 70 से 77 वर्ष के हो चुके थे।

पटना दानापुर निवासी कृष्ण चंद्र केसरी उस वक्त सरकारी सेवा से करीब दस वर्ष पूर्व सेवा निवृत्त हो चुके थे। उन्होंने बताया था कि जब देश को रात्रि में आजादी मिली थी, तो उन्हें याद है कि कोई भी युवा या वृद्ध रात्रि में सोया ही नहीं था, सभी सुबह का इंतजार कर रहे थे, जैसे ही सुबह हुआ, सभी ने अपने घरों पर तिरंगा फहराया, स्कूल-कॉलेज तो छोड़ दीजिये, मंदिरों में भी झंडे फहराये गये, मिठाइयां बांटी गई थी, चारों ओर उल्लास था, ये सही है कि देश के कुछ इलाकों में दंगे भड़के हुए थे, पर लोगों को विश्वास था कि अंग्रेज चले गये, उनकी मंशा समाप्त, अब कोई दंगे नहीं होंगे, सभी मिलकर रहेंगे, और ये उल्लास का सिलसिला जैसे-जैसे साल बीतता गया, धूमिल होता चला गया।

कृष्ण चंद्र केसरी ने ही कहा था कि अब तो केवल स्वतंत्रता दिवस की फार्मिलिटी निभाई जाती है, केवल स्कूल-कॉलेजों में झंडे दिखाई पड़ते हैं, अब तो शायद ही किसी के घर में इक्के-दुक्के झंडे दिखाई पड़ते हैं, दरअसल किसी ने स्वतंत्रता का मूल्य पहचाना ही नहीं, और न ही सरकार ने स्वतंत्रता के मूल्य को पहचनवाने की जरुरत समझी, लोगों को लगता है कि आजादी ऐसे ही मिल गई, पर आजादी कैसे मिली? वो तो हमलोगों ने देखा है, दुख होता है कि अब लोग राष्ट्रीय ध्वज का भी सम्मान नहीं करते और न ही राष्ट्र गान का। अब तो वंदे मातरम् पर भी लोग सवाल उठा देते हैं, जबकि आजादी के समय कौन ऐसा क्रांतिकारी नहीं था, जिसने वंदे मातरम् न कहा हो, पर देखिये आजादी के बाद की स्थिति, लोगों को वंदे मातरम् कहने में भी धर्म खतरे में पड़ जाता है।

कृष्ण चंद्र केसरी का ये दर्द, हम भी महसूस करते है। मेरा रांची से अप्रत्यक्ष रुप से 33 वर्षों से और प्रत्यक्ष रुप से 20 वर्षों से संबंध रहा हैं, परिकल्पना करता हूं कि जब आजादी मिली होगी तो रांची का दृश्य कैसा रहा होगा। मैं जब भी पहाड़ी मंदिर जाता हूं, तब शिवलिंग के ठीक उपर लिखे शिलापट्ट को देखे और उसे पढ़े नहीं रह पाता, जिसमें लिखा है कि 14-15 अगस्त 1947 की रात्रि, जैसे ही आजादी की घोषणा हुई, युवाओं ने उसी रात इस पहाड़ी मंदिर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया, अब परिकल्पना करिये कि उस वक्त युवाओं में कितनी जोश होगी, पर आज की स्थिति क्या है?

क्या वहीं जोश, उमंग, उत्साह, आज के लोगों में हैं, वे तो भारतीय स्वतंत्रता दिवस को महत्व ही नहीं देते, वे तो समझते है कि जैसे सभी दिन है, वैसे ये भी दिन हैं, न तो वीरों को श्रद्धांजलि देने से मतलब, न तो देश को सम्मान करने से मतलब, न राष्ट्रीय ध्वज को अभिनन्दन करने से मतलब, पर नेताओं को गरियाने के लिए कहिये तो दम भर गरियाएंगे कि इन नेताओं ने देश को बर्बाद कर दिया और जब उनसे पूछिये कि ये देश तो आपका भी हैं, आपने देश के लिए क्या किया? तो इनकी घिग्घी बंद हो जायेगी।

दरअसल, हमने कभी देश को समझा ही नहीं और न ही हमारे अंदर देशभक्ति का जज्बा हैं, हम मृतप्रायः लोग हैं, कृतघ्न है, जो देश के लिए कुर्बान हो गये उन अमर शहीदों को याद भी नहीं करते, और न याद करते हैं उन सैनिकों को जो विपरीत परिस्थितियों में हमारे देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, और जहां ऐसी स्थिति होगी, उस देश का क्या हाल होगा? वो सबके सामने हैं।

अगर देश के नेता गद्दार हैं, वो ठीक से काम नहीं कर रहे तो हम क्या कर रहे और हमने कौन सी उन्हें सबक सीखा दी कि वे सबक को सीख कर, अपनी गलती सुधारे, यह देश राजा-महाराजाओं का तो है नहीं, यहां तो लोकतंत्र हैं, जैसा हम चुनेंगे, वैसा ही हमारा पीएम होगा, अगर हम चोरों को चुनेंगे, प्रचार-प्रसार से प्रभावित होकर मतदान करेंगे तो पीसायेंगे हम ही, इतनी भी बुद्धि नहीं, इसलिए हमें स्वयं सुधरना होगा, और इसकी शुरुआत भारतीय स्वतंत्रता दिवस से ही करनी होगी, कोई लंदन से हमें सुधारने नहीं आयेगा, हमें खुद सुधरना होगा, तभी हम सही मायनों में आजादी की कीमत को समझ पायेंगे।

स्वतंत्रता अनुशासनहीनता का नाम नहीं हैं, बल्कि स्वतंत्रता अनुशासन के साथ देश को याद करते हुए, उसके लिए कुछ करने का नाम हैं, आप जहां है, वहीं देश के लिए, कुछ करते रहिये, ईमानदार बनिये, फिर देखिये कैसे आप स्वतंत्रता का आनन्द लेते हैं, पर आप सुधरेंगे, हमें तो नहीं लगता, क्योंकि आपने तो कसम खा रखी हैं, नहीं सुधरने की, ऐसे भी आपके यहां से देश के लिए कोई मरा हैं क्या? या आपके यहां से देश के लिए मर-मिटने का संकल्प ले रखा है क्या? गर नहीं, तो फिर जो देश का आज हाल है, आप भी झेलिए और अपने आनेवाले भविष्य को भी झेलाने के लिए तैयार रहिये।

Krishna Bihari Mishra

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