नेत्रदान को इच्छुक एक परिवार ने स्वास्थ्य सचिव को फोन कर मदद मांगी, जनाब ने फोन ही काट दी

सचमुच झारखण्ड बहुत तेजी से तरक्की कर रहा है, मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में उनके अधिकारी इस प्रकार से खुद को काम में बिजी रखे हुए है कि वे किसी को सहयोग करने के बजाय, फोन काटने में ज्यादा रुचि दिखा रहे है, भला इससे बड़ा तरक्की और क्या हो सकता है। जरा देखिये, सोशल साइट पर फेसबुक पर अंकित राजगढ़िया ने क्या लिखा है? आपको पता लग जायेगा कि राज्य में अधिकारियों ने जनता को क्या समझ रखा है

सचमुच झारखण्ड बहुत तेजी से तरक्की कर रहा है, मुख्यमंत्री रघुवर दास के नेतृत्व में उनके अधिकारी इस प्रकार से खुद को काम में बिजी रखे हुए है कि वे किसी को सहयोग करने के बजाय, फोन काटने में ज्यादा रुचि दिखा रहे है, भला इससे बड़ा तरक्की और क्या हो सकता है। जरा देखिये, सोशल साइट पर फेसबुक पर अंकित राजगढ़िया ने क्या लिखा है? आपको पता लग जायेगा कि राज्य में अधिकारियों ने जनता को क्या समझ रखा है और उनके साथ वे कैसा व्यवहार करते हैं?

अंकित राजगढ़िया बताते है कि उनका परिवार हमेशा से मरणोपरांत नेत्रदान करता आया है। उनके मामा सुरेश अग्रवाल का गत बुधवार को निधन हो गया। चूंकि अंकित के मामा जी ने मरणोपरांत नेत्रदान करने की इच्छा जाहिर की थी, इसलिए अंकित  नेत्रदान कराने के लिए जी-जान से जुट गये। उन्होंने इसके लिए सबसे पहले धनबाद स्थित पाटलिपुत्र मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल से सम्पर्क किया।

पाटलिपुत्र मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल के अधीक्षक ने अंकित को बताया कि नेत्र को सुरक्षित रखने के लिए उनके पास केमिकल उपलब्ध नहीं है, जिसके कारण वह नेत्रदान करवाने में असमर्थ है, अंकित का कहना है कि यह जानकर उन्हें बहुत पीड़ा हुई, जब अस्पताल अधीक्षक ने केमिकल नहीं होने का रोना रोया। तत्पश्चात उन्होंने अपने रोटरी क्लब से जुड़े राजेश मतालिया से संपर्क किया। राजेश मतालिया ने कॉर्निया को सुरक्षित रखने के लिए आसनसोल के पुनर्दृष्टि आई बैंक से केमिकल उपलब्ध करा दिया।

रात एक बजे केमिकल आसनसोल से धनबाद लाया गया और फिर पीएमसीएच के डाक्टरों की सहायता से नेत्रदान संपन्न कराया गया। अंकित का कहना है कि राजेश मतालिया ने अगर उन्हें सहयोग नहीं किया होता तो वे अपने मामा सुरेश अग्रवाल की अंतिम इच्छा नहीं करवा पाते। इसी बीच अंकित का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में सहयोग के लिए धनबाद के भाजपा विधायक राज सिन्हा को संपर्क किया, पर उन्होंने फोन नहीं उठाया।

इसी बीच अंकित ने झारखण्ड के स्वास्थ्य सचिव को फोन किया, करीब रात के दस बजे जब अंकित ने स्वास्थ्य सचिव को फोन लगाया और बताया कि वे नेत्रदान करवाना चाहते हैं, पर पीएमसीएच में केमिकल नहीं होने से नेत्रदान नहीं हो पा रहा, स्वास्थ्य सचिव का कहना था कि वे ऐसे में, वह भी रात को क्या कर सकते हैं, और यह कहकर फोन काट दिया, यानी जिसे सहयोग करना चाहिए था, जो राज्य का स्वास्थ्य सचिव है, वह सहयोग के बदले, खुद को असहाय कहते हुए सहयोग करने से इनकार कर दिया।

अंकित का कहना है कि क्या नेत्रदान करवाने के लिए किसी परिवार को इतनी मशक्कत करनी पड़ती हैं? सवाल तो यह भी है कि जब धनबाद के पीएमसीएच में नेत्र को रखने के लिए केमिकल उपलब्ध नहीं होगी तो नेत्रहीन लोगों को नेत्र कैसे मिलेंगे, नेत्रदान जैसे पवित्र कार्य को बढ़ावा कैसे मिलेगा, एक तो जब नेत्रदान की बात आती है, तो पूरा परिवार शोकाकुल होता है, ऐसे समय में स्वास्थ्य सचिव के बयान इस प्रकार के आये कि वे रात के समय कर ही क्या सकते हैं, तो फिर आप स्वास्थ्य सचिव क्यों बने हैं? आराम करिये घर पर, दूसरे को मौका दीजिये, और अगर ऐसे पद पर हैं, तो आप सेवा मुहैया कराये।

झारखण्ड का दुर्भाग्य है कि हर विभाग में ऐसे अधिकारी बैठे हैं, जो सहयोग-सेवा की भावना छोड़कर, स्वयं को अधिष्ठाता मानकर बैठे हैं, जैसे लगता है कि उनका काम सेवा नहीं, बल्कि सेवा लेने का हो गया है, और वे जब तक उक्त पद पर बैठे रहेंगे, मस्ती करते रहेंगे, क्योंकि सरकार भी तो उन्हीं के साथ है, ऐसे में नेत्रदान जैसा पवित्र कार्य भाड़ में ही क्यों न चला जाये।

Krishna Bihari Mishra

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