विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस को मार गोली, फिलहाल हर-हर मोदी बोल और जब राहुल युग आयेगा तो राहुल-राहुल चिल्लाना

कल यानी 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस था। कई अखबार मेरे सामने पड़ी थी। कई चैनलों व पोर्टलों के दृश्य मेरे आंखों के सामने तैर रहे थे। मेरे आंखों के सामने पड़ी अखबारों, चैनलों व पोर्टलों के दृश्यों में से मैं विश्व, प्रेस, स्वतंत्रता और दिवस को ढूंढ रहा था, पर अफसोस की इन चार शब्दों को छोड़ बाकी सारे शब्द मेरे सामने बड़ी संख्या में पड़े थे, जिससे हमको कोई लेना देना नहीं था,

कल यानी 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस था। कई अखबार मेरे सामने पड़ी थी। कई चैनलों व पोर्टलों के दृश्य मेरे आंखों के सामने तैर रहे थे। मेरे आंखों के सामने पड़ी अखबारों, चैनलों व पोर्टलों के दृश्यों में से मैं विश्व, प्रेस, स्वतंत्रता और दिवस को ढूंढ रहा था, पर अफसोस की इन चार शब्दों को छोड़ बाकी सारे शब्द मेरे सामने बड़ी संख्या में पड़े थे, जिससे हमको कोई लेना देना नहीं था, ठीक उसी प्रकार जैसे एक भूखे व्यक्ति के सामने आप कितना भी ज्ञान बघार दें, उसे उन ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं होता, वो तो उस ज्ञान में भी रोटी की तलाश करता है, कि कब ये ज्ञान की बातें खत्म हो और उसकी रोटी की समस्या खत्म हो।

हमारे देश में इन दिनों चुनाव का माहौल है। याद रखियेगा, ये चुनाव ही हैं, जो नेताओं और पत्रकारों को एक दूसरे के बहुत निकट लाता है, नहीं तो हमने ज्यादातर समय नेताओं के सामने एक मामूली बाइट तथा इंटरव्यू के लिए या अपने संस्थान के लिए विज्ञापन लाने या अपने बेटे-बेटियों के वैवाहिक अथवा विभिन्न प्रकार के संस्कारों/उत्सवों में शामिल होने के लिए इन पत्रकारों को नेताओं के सामने नाक रगड़ते/पापड़ बेलते देखे हैं।

जरा देखिये न हमारे देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेता अक्षय कुमार को तो इंटरव्यू दे देते हैं, पर एनडीटीवी के रवीश कुमार पिछले दो साल से उनके इंटरव्यू के लिए छटपटा रहे हैं, पर उन्हें यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ, पर वे अखबार या चैनल या पोर्टल जो पीएम मोदी के आगे नतमस्तक है, या उन्हीं के बताए प्रश्न या उत्तर पर बलिहारी हैं, उन्हें इंटरव्यू करने को आराम से मिल जाता है, ऐसे तो आजकल एक नया फैशन भी चला है कि आपको इंटरव्यू करने का मौका मिले या न मिले, सीधे बड़े-बड़े महान लोग, इंटरव्यू के शक्ल में मैटेरियल अखबार वालों के पास भेज देते हैं, और आराम से वो छप भी जाता है, तथा उसके बदले भुगतान भी हो जाता है, क्योंकि ये नये युग की पत्रकारिता है, जहां स्वतंत्रता के मायने ही अलग हो चुके है।

जरा देखिये रांची में क्या हो रहा है। पीएम मोदी की सभा लोहरदगा या रांची में हो तो सारी अखबारें उनके आगे बिस्तर की तरह बिछ जा रही है, कोई उनके लिए तीन विशेष पेज, कोई चार पेज तो कोई छःछः पेज देकर, अपना साष्टांग निवेदन प्रस्तुत कर रहा हैं, और जब विपक्ष का कोई नेता जैसे राहुल गांधी का आगमन हो रहा है, तो बस उसे कभी एक पेज तो कभी मामूली समाचार बनाकर ही उसके कार्यक्रम का इतिश्री कर दिया जा रहा हैं।

जरा याद करिये, हाल ही में 23 अप्रैल को पीएम मोदी का रांची में रोड शो तथा 24 अप्रैल को लोहरदगा में एक चुनावी सभा था, जरा 24 और 25 अप्रैल का प्रभात खबर, उठाकर देख लीजिये, कि उसने पीएम मोदी के लिए किस प्रकार अपने अखबारों को सेज की तरह प्रस्तुत किया, उन पर एक नहीं बल्कि कई-कई पेज दे दिये, जबकि पिछले 2 मार्च को राहुल गांधी का रांची में आम सभा था, इस अखबार ने मात्र एक पेज देकर, उक्त राहुल गांधी की परिवर्तन उलगुलान रैली की इतिश्री कर ली। 2 मई को राहुल गांधी की सिमडेगा में सभा थी और उसकी 3 मई को एक समाचार चार कॉलम में देकर इतिश्री कर लिया गया, जबकि इसी दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक इंटरव्यू को विशेष तौर प्रथम पृष्ठ एवं इसके अलावे एक विशेष पृष्ठ पर प्रकाशित कर दिया, वह भी कब जिस दिन विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस था।

अरे भाई ये कैसी विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है, जहां विपक्ष के आवाज को दबा कर सत्ता पक्ष की आवाज को मुखर करने के लिए खुद को अखबार नहीं आंदोलन कहनेवाला, खुद को झारखण्ड में सर्वाधिक प्रसारित अखबार का दर्जा देनेवाला अखबार इस प्रकार की हरकतें करता है। इन दिनों रांची की सभी अखबारों को देख लीजिये, वे खुद को इस प्रकार जनता के सामने परोस रहे हैं, जैसे वे अखबार न होकर भाजपा के एजेन्ट हो, पूरा अखबार भाजपा-भाजपा से रंगा है, जबकि लोकतंत्र में विपक्ष की आवाज भी काफी महत्वपूर्ण होती है, क्या विपक्ष को भी सत्ता पक्ष के बराबर हक मिल रहा हैं, या नहीं, इस पर संपादक ध्यान देते हैं? यहां तो ऐसा है ही नहीं। जो भी अखबार देखिये, उसके पेज पलटिये, जैसे लगता है कि किसी ने भाजपा के लिए विशेष तौर पर उसे खरीद लिया है और ये अखबार उन्हीं के इशारे पर ये सब कर रहे हैं।

कमाल हैं, चैनल वाले भी खुब लाइभ दिखा रहे हैं, पर जब बात विपक्ष की आ रही हैं तो उनको सांप सूंघ जा रहा है, 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के दिन पीएम मोदी का जिस प्रकार इंटरव्यू प्रकाशित किया गया, और जिस प्रकार राहुल गांधी के समाचार को चार कॉलम में प्रकाशित कर उनका इतिश्री कर लिया गया, उससे साफ जाहिर है कि यहां विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस की किस प्रकार धज्जियां उड़ाई गई। ऐसे भी मैं आपको बता दूं कि हमारी पत्रकारिता की उम्र 30 साल से भी ज्यादा है, पर मैं बचपन से ही अखबारों को देखता रहा हूं, घर और पड़ोस में राजनीति की बाते होती रहती, सुनता रहता, और उसे अखबारों में देखकर मिलाने की कोशिश करता, शुरुआत में तो मुझे वैसी बाते देखने को नहीं मिली, सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों को प्रमुखता से स्थान दिया जाता, अगर श्रीमती इन्दिरा गांधी का कार्यक्रम होता तो उन्हें भी अखबार वाले अपने यहां सम्मानजनक स्थान देते, लोकनायक जयप्रकाश नारायण का कार्यक्रम होता तो उन्हें भी वहीं स्थान मिलता।

पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, आर्थिक युग का समावेश हुआ, उदारीकरण ने अपना बाजार बढ़ाना शुरु किया, चरित्र और अनुशासन दुकान में तेल लेने चली गई और अखबारों-चैनलों-पोर्टलों पर आला दर्जें के काइयों/चिरकूट संपादकों ने खुद को भेड़िये का खाल पहनकर, देश व राज्य को धोखा देने लगे, जिसका परिणाम यह हुआ कि अखबारों/चैनलों/पोर्टलों से विपक्ष गायब हो गया। उन्हें लगता कि अगर विपक्ष को हम ज्यादा स्थान देंगे तो सत्तापक्ष जहां से अभी विज्ञापन का खेल चल रहा हैं, उसका कोपभाजन बनना पड़ेगा, और शुरु हुआ पेड न्यूज का धंधा।

हालांकि चुनाव आयोग ने पेड न्यूज पर रोक लगाने के लिए कई कमेटियां बनाकर रख दी हैं, पर जब उस कमेटी में ही आला दर्जें के धूर्त और बेईमान लोग बैठ गये हो, जिन पर नाना प्रकार के आरोप हो, तो भला वे क्या पेड न्यूज पर अपनी बातें रखेंगे, यहां तो मैं देख रहा हूं कि जिन्हें पेड न्यूज पर रोक लगानी है, उन्हें सेल्फी लेने और उसे सोशल साइट पर डालने से फूर्सत ही नहीं।

कभी मोदी के शासन संभालने के पूर्व दस साल तक यहीं हालात थे, जो आज है, इसलिए अभी मजा मोदी जी ले रहे हैं, यकीन मानिये अगर राहुल गांधी का शासन आया तो ये सारे अखबार, चैनल और पोर्टल के लोग उनके आगे ता-ता, थै-या कर नहीं नाचने लगे, उनके आगे बलिहारी नहीं होने लगे, उन्हें राहुल के चेहरे में खुदा का नूर नजर नहीं आने लगा तो फिर कहियेगा, फिलहाल मोदी के आगे बलिहारी मीडिया का मजा लीजिये, और राहुल के लिए थोड़ा इंतजार कीजिये।

Krishna Bihari Mishra

Next Post

क्या असरानी भाई, इटावा में PM मोदी की प्रशंसा और रांची में मोदी की आलोचना व राहुल का गुणगान

Sat May 4 , 2019
इन दिनों फिल्मी दुनिया के लोग खुब राजनीति में प्रवेश कर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं और जनता ऐसी है कि कभी – कभी इन फिल्मी दुनिया के लोगों के डायलॉगबाजी में आकर, अपना वोट भी खराब कर देती है, अब असरानी को देख लीजिये, ये वहीं असरानी है, जिन्होंने सुपर-डूपर हिट फिल्म “शोले” में जेलर का रोल किया था, जिनका डायलॉग “हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर” और “आधे इधर, आधे उधर जाओ और बाकी मेरे पीछे आओ” ने धमाल मचा दिया था।

You May Like

Breaking News