“दवाई दोस्त” को ठिकाने लगाने का काम शुरु, गरीबों से जीने का अधिकार मतलब सस्ती दवाएं छीनने की भी कोशिश

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“दवाई दोस्त” नाम ही काफी है। जिन्हें सस्ती दवाइयां चाहिए, उपयोगी दवाइयां चाहिए, वे दवाई दोस्त प्रतिष्ठान का ही रुख करते हैं। अब तो झारखण्ड के निम्नवर्गीय व मध्यमवर्गीय परिवारों की पहली और अंतिम पसंद हो  गई है – दवाई दोस्त। जो लोग अपनी बिमारियों के कारण दवाओं के बिना एक पल भी नहीं रह सकते, उनके लिए दवाई दोस्त किसी संजीवनी से कम नहीं, क्योंकि जो दवाएं बाजार में एक सौ रुपये में मिलती है, वो दवाएं यहां मात्र पन्द्रह रुपये में आपको मिल जायेंगी।

ऐसे भी दवाई दोस्त को जो लोग चलाते हैं, उनको मैंने नजदीक से जाना है, वे इसे बिना किसी लोभ लालच के चला रहे हैं, ताकि गरीबों का पॉकेट सुरक्षित रहे। कमाल की बात तो यह भी है कि रिम्स, जहां झारखण्ड के कोने-कोने से लोग इलाज के लिए आते हैं, उसके मुख्य द्वार पर आपको दो दवा दुकाने मिलेंगी, एक केन्द्र सरकार की जन-औषधि केन्द्र हैं, जहां आपको न तो दवाएं मिलेंगी और न ही दवा खरीदनेवाले, जबकि रिम्स में सेवा दे रही दवाई दोस्त की दुकान पर आपको हमेशा भीड़ दिखाई पड़ेंगी।

भाई जब रोग के रुप में घर में विपत्ति आती हैं तो हर व्यक्ति दो पैसे बचाकर, अपने परिवार की बेहतर इलाज के लिए कामना करता है, पर शायद इस प्रकार का दृश्य देखना बहुत सारे लोगों को अच्छा नहीं लग  रहा, वे चाहते हैं कि दवाई दोस्त का यह प्रतिष्ठान सदा के लिए बंद हो जाये। खासकर वे लोग जो दवाई-दोस्त को वहां देखना पसन्द नहीं करते, तथा उस जगह पर अपना दवा का प्रतिष्ठान खोलना चाहते हैं, जिसकी बुनियाद रखी भी जा चुकी है। उस बुनियाद को प्रतिष्ठित करने के लिए सरकारी महकमे ने अपना काम करना शुरु कर दिया है। उसी की यह दूसरी कड़ी है – रिम्स स्थित दवाई दोस्त के दुकान का औचक निरीक्षण।

पहली कड़ी था वह पैरवी पत्र जो औषधि निदेशक ने रिम्स के डायरेक्टर को लिखा था कि आप फलां व्यक्ति को रिम्स परिसर में औषधि प्रतिष्ठान खोलने का स्थान दें, अब रिम्स के निदेशक उस पैरवी पत्र को कैसे नजरंदाज कर दें, अरे भाई उनको भी तो रहना रांची में ही हैं, इसलिए उन्होंने पैरवी पत्र को सर-आंखों बिठाया और शुरु हो गया उस पर काम करना। अब इस कार्रवाई से किसको फायदा होगा, आम जनता नहीं जानती, पर स्वास्थ्य विभाग से जुड़े तथा सरकार में शामिल  जितने भी महान लोग हैं, वे जानते हैं। लेकिन इनके इन घटियास्तर की हरकतों से इतना तो तय हो गया कि निःसहाय-गरीबों के पेट पर तो लात मारने की तैयारी बड़ी तेज गति से हो रही हैं।

जिसमें हो सकता है कि दवाई दोस्त से जुड़े लोगों को कई विभिन्न अपराधिक धाराओं में फंसाकर उनका जीवन तबाह करने की कोशिश कर दी जाय, क्योंकि आम तौर पर तथाकथित गलत कार्य में लिप्त लोगों के ये सब काम बाये हाथ का खेल हैं, सच्चाई यह भी है कि पहले से ही एक अच्छे काम की सजा दवाई दोस्त प्रबंधन को दी जा चुकी है, वे एक केस पहले से लड़ रहे हैं और अब दूसरे मामले में फंसाने की अच्छी तैयारी चल रही हैं, साथ ही इन्हें बदनाम करने की भी कल से प्रयास जारी है।

क्योंकि, जो-जो आरोप दवाई दोस्त प्रबंधन पर लगाये गये हैं, उसका सही जवाब दवाई दोस्त प्रबंधन दे चुका है, पर उनकी सुनेगा कौन? जैसे दवाई दोस्त पर आरोप लगाया गया है कि बिना फार्मासिस्ट के दवा की बिक्री करते हैं, जबकि प्रबंधन का कहना था कि फार्मासिस्ट की उपस्थिति में ही दवाओं की बिक्री की जा रही थी। दवाई दोस्त पर आरोप लगाया गया कि ऑक्सीजन का सिलिण्डर रखे हुए थे, प्रबंधन का कहना था कि मारवाड़ी समाज द्वारा निशुल्क सेवा के तहत ऑक्सीजन सिलिण्डर रखा गया था, जिसके सारे कागजात भी जांचकर्मियों को उपलब्ध करा दिये गये।

इधर औषधि निदेशालय कर्मियों द्वारा इस प्रकार की चलाई गई गतिविधियों से आम आदमी अभी से ही आतंकित है, कि कही ऐसा नहीं कि दवाई दोस्त पर प्रतिबंध लगा दिया जाय, या कही ऐसा नहीं कि इस प्रकार की हरकतों से तंग आकर दवाई दोस्त के नाम से सेवाकार्य चला रहे इसके प्रबंधक इन सेवा कार्यों से मुंह मोड़ लें, अगर ऐसा होता है तो औषधि निदेशालय या राज्य सरकार या जिन नये लोगों को औषधि प्रतिष्ठान देने के लिए जगह की तलाश के लिए जो नया बबंडर खड़ा किया जा रहा हैं, उससे इतना तो तय है कि आम आदमी को चक्की में पीस कर उसका रक्त निकालने का प्रयास शुरु जरुर कर दिया गया, जिसकी सजा ऐसे भयंकर पापकर्म करनेवालों लोगों को मिलना उतना ही सुनिश्चित है, जितना दिन और रात का होना।

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