वो आखिरी call और सपना (पार्ट – वन)

वो आखिरी बात जो भूलती नहीं और अब ये बात कोई भूलेगा नहीं कि जो चला गया उसके अधूरे सपनों को कोई और नहीं बल्कि उसकी जीवनसंगिनी ही पूरा करेगी। आपलोग सोच रहे होंगे कि मैं किसकी बात कर रही हूं। इस कोरोना काल में प्रति पल अपने मित्रों, परिचितों, शुभचिंतकों को खोते रहने के माहौल में कुछ लोगों का यूं चले जाना बहुत खल गया। झारखण्ड से 35 पत्रकारों को कोरोना ने छीन लिया। सबको तो नहीं जानती मगर दो लोग थे जिन्हें जानती थी, जिनसे जुड़ी थी। ये दोनों ऐसे चले गए कि मैं नि:शब्द और निस्तब्ध रह गई।

वो आखिरी बात जो भूलती नहीं और अब ये बात कोई भूलेगा नहीं कि जो चला गया उसके अधूरे सपनों को कोई और नहीं बल्कि उसकी जीवनसंगिनी ही पूरा करेगी। आपलोग सोच रहे होंगे कि मैं किसकी बात कर रही हूं। इस कोरोना काल में प्रति पल अपने मित्रों, परिचितों, शुभचिंतकों को खोते रहने के माहौल में कुछ लोगों का यूं चले जाना बहुत खल गया। झारखण्ड से 35 पत्रकारों को कोरोना ने छीन लिया। सबको तो नहीं जानती मगर दो लोग थे जिन्हें जानती थी, जिनसे जुड़ी थी। ये दोनों ऐसे चले गए कि मैं नि:शब्द और निस्तब्ध रह गई।

“मैडम हम तो रिम्स रांची में कोरोना से जूझ रहे हैं” हांफते हुए राजेश पति ने ये कहा था। वो 07 मई थी। मैं अवाक रह गई थी। तब मैं न्यूज 11 की कोल्हान हेड थी और राजेश पति चाईबासा के हमारे सहयोगी जो अनवरत एक से बढकर एक न्यूज स्टोरी दिया करते थे। कुछ दिनों से उनकी सक्रियता न देखकर हाल चाल जानने और चाईबासा में किसी को oxygen सिलेंडर की जरुरत वाली ट्वीट को लेकर मदद के संदर्भ में मैंने राजेश पति को जब फोन किया, तब ये जानकर अवाक रह गई।

आज भी ये आवाज कानों में गूंजती है – मैडम, हम तो रांची रिम्स में कोरोना से जूझ रहे हैं। सांस फूल रही थी राजेश की, और फिर भी हंसते मुस्कराते बोल बैठे – कैसे याद किया मैम (वो समझ गए थे कि जरुर किसी को मदद की जरूरत है)।  मैंने बताया कि किसी को oxygen सिलेंडर की जरूरत है चाईबासा में। मैंने ट्वीट का जिक्र किया लेकिन राजेश की हालत पर चिंता जाहिर करते हुए उन्हें आराम करने की सलाह दी।

लेकिन राजेश कहां मानने वाले थे,  उन्होंने झट मुझे वाट्सएप्प पर मारवाड़ी युवा मंच के नारायण पांडेय जी का नं भेजा। तब मैंने सोचा न था कि ये अंतिम मैसेज है, जाते जाते भी लोगों की मदद की उनकी भावना काम करती रही। स्क्रीन shot देखिए कैसे खुद जीवन- मौत से लड़ते उखड़ती स़ासों के बीच राजेश पति दूसरे की सांस की चिंता में था।

राजेश पति को कोरोना ने छीन लिया। न्यूज 11 पर अपने सहयोगी के हमेशा के लिए अलविदा कह जाने की खबर सबको आंसुओ से भिगो गई। लगातार कई दिनों तक राजेश का हंसता मुस्कराता चेहरा घूमता रहा। एक दिन सपने में राजेश पति आए। ठीक वैसे ही जैसे स्टोरी को लेकर चाईबासा जाने पर मिला करते थे। सपने में, मैं किसी स्टोरी को लेकर खुद को चाईबासा सर्किट हाऊस के पास खड़ी पा रही हूं, इतने में नगर निकाय की कोई खबर करके राजेश पति आते हैं और खबर के बारे में बताते हैं।

फिर वे शांत हो जाते हैं,  मानो कुछ कहना चाहते हों। नींद खुल गई। अब जून आ गया था। मैं अगले कुछ दिन सपने के बारे में सोचती रही। राजेश पति का अंदाज़ ऐसा ही था कि कम शब्दों में अपनी बात कह जाते थे, बहुत कम बोलते थे। लेकिन अपनी टीम की सुविधा का पूरा ख्याल रखते थे। वे मेरे लिए छोटे भाई सरीखे थे। फरवरी में सीएम के कवरेज को लेकर चाईबासा जाना हुआ तो राजेश पति ने टीम का पूरा ख्याल रखा, दूर दराज के इलाके में जाना था तो वहां पहुंचने से पहले राजेश पूरी टीम को एक गेस्ट हाऊस ले गए।

मैं आम तौर पर गैस और एलर्जी की वजह से अंडा या आमलेट नहीं खा पाती मगर राजेश ने बड़े स्नेह से अपनी इस बड़ी बहन को आमलेट खाने को दिया जिसे लेने से इंकार न कर सकी। मुझे न तो गैस हुआ न ही कोई और दिक्कत। ये छोटी छोटी बातें बहुत याद आ रही हैं और मन रो रहा है। एक पत्रकार कितनी खतरनाक परिस्थितियों में काम करता है ये एक दूसरा पत्रकार बखूबी समझता है। जब मेरे मन की ये हालत थी तब सोचिए परिवार पर क्या बीत रही होगी?

हिम्मत न थी कि राजेश के परिजनों से बात की जाए। क्या बीत रही होगी उसकी पत्नी, भाई, माता पिता और अन्य पर। फिर किसी से कोई संपर्क भी नहीं था। इधर केन्द्र सरकार की ओर से कोरोना से मारे गए पत्रकारों के लिए पांच लाख के मुआवजे की स्कीम को लेकर पत्रकार संगठन एआईएसएम के झारखंड प्रभारी प्रीतम भाटिया लगातार जागरूकता फैलाने में जुटे थे, जिनसे दिवंगत पत्रकार राजेश पति के संदर्भ में बात हुई।

प्रीतम लगातार मृतक पत्रकारों के परिजनों को मुआवजे के लिए भरे जा रहे online form की जानकारी देने के साथ भरने में मदद कर रहे थे। मैंने उनको राजेश को लेकर अपने सपने की बात बताई। प्रीतम भाटिया भावुक हो गए और तय हुआ कि मैं राजेश पति की पत्नी से बात करूंगी और मुआवजे को लेकर form भरने के लिए प्रेरित करूंगी। कभी संपर्क तो नहीं हुआ था तो नंबर भी नहीं था, लेकिन प्रीतम जी ने बताया कि राजेश पति के ही नंबर पर उनकी पत्नी से बात हो जाएगी। मैंने जब राजेश पति का वाट्सएप्प देखा तो कलेजा मुंह को आ गया। पहली बार डीपी पर पत्नी के साथ राजेश की फोटो दिखी।

मैंने बड़ी हिम्मत से फोन किया। बड़ी मधुर सी आवाज़ आई। रूम्पा नाम है राजेश पति की पत्नी का। राजेश की मौत से टूटी है पर बिखरी नहीं। संवेदनाएं ऐसी जो कभी मद्धिम नहीं पड़ेगीं। बातचीत के क्रम में पता चला कि बच्चे नहीं हैं, ससुराल में पूरा परिवार है। मैंने रूम्पा को बताया कि प्रीतम भाटिया संपर्क करेंगे जो मुआवजे के form के बारे में बताएंगे। मैंने रूम्पा से कहा कि वह जरूर इसे भरे, ये मुआवजा उसका अधिकार है। उसने हामी भरी। चूंकि पहले कभी बातचीत नहीं हुई थी तो जाहिर है वह उतना खुलकर बात नहीं कर रही थी, लेकिन मैंने उसे कहा कि वह जब चाहे वह मुझे फोन कर सकती है। उसने कहा कि जब भी घाटशिला(मायका) जाना हुआ वह जरुर टाटा आकर मुझसे मिलेगी।

बात यही खत्म नहीं हुई। एक नया सिलसिला अगले दिन शुरू हुआ जब रूम्पा ने मुझे वाट्सएप पर गुड morning लिखा। उसी नं जिससे राजेश पति से बात और वाट्सअप पर चैट होती थी, अब रूम्पा का मैसेज देखकर बदलते वक्त की दस्तक मिली। बातों का सिलसिला शुरू हुआ और जो रुम्पा ने कहा वह सुनकर मैं न सिर्फ भावुक हो गई बल्कि गर्व हुआ कि ऐसे लोग,  ऐसी महिलाएं हमारे समाज में हैं। देखिए रुम्पा ने क्या लिखा—

मैं राजेश के अधूरे सपने को पूरा करना चाहती हूं। मैं वही काम करना चाहती हूं जो वह करते थे अगर कोई मीडिया हाऊस रखे। राजेश इस चाईबासा, सारंडा क्षेत्र के बच्चों की शिक्षा से लेकर अन्य विकास को लेकर बहुत कुछ सपना देखते थे, उनका सपना पूरा करना है। मुझे पैसे नहीं चाहिए, बस राजेश के अधूरे सपने को पूरा करना है। मैं ये पढ़ते जा रही थी और आंखों से अश्रू धारा बहती जा रही थी। मेरे पास शब्द नहीं जो इसको व्यक्त कर सकूं।

रूम्पा की इन भावनाओं के बारे में पता चलने पर प्रदेश भाजपा प्रवक्ता कुणाल षाड़ंगी ने मुझसे उसका नं मांगा है और वे रूम्पा की भावनाओं के अनुरूप मदद करने के इच्छुक हैं। मैंने यूं ही रुम्पा से उसकी शैक्षणिक योग्यता के बारे में पूछा तो उसका मासूमियत भरा जवाब देखिये –“मैं ग्रेजुएट हूं और कंप्यूटर किया है, पर किसी कारण मैं फिलहाल इंटर तक ही सर्टिफिकेट दे सकती हूं, साथ ही कंप्यूटर वाला भी दे पाऊंगी। लेकिन जिस काम को मुझे एक बार सिखा दिया जाएगा उसको लेकर मैं कभी किसी को निराश नहीं करूंगी।”

मुझे नहीं पता कोई मीडिया हाऊस रूम्पा को मौका देगा या नहीं, पर हम सबको रूम्पा के इस जज़्बे और आत्मविश्वास को सलाम करना चाहिए और उसके काम आना चाहिए। खुशी की बात है कि कुणाल षाड़ंगी ने इस दिशा में मदद की इच्छा जताई है और प्रीतम भाटिया ने भरोसा दिलाया है कि रूम्पा को स्थानीय स्तर पर मीडिया से जोड़ने की कोशिश होगी। मुआवजे के form भरवाने में मदद के लिए और उसे स्थानीय मीडिया से जोड़ने के लिए एआईएसएम संगठन के जीतेन्द्र ज्योतिष रूम्पा से जल्द मिलेंगे। एक बार फिर रूम्पा को सलाम है।  (जारी)

Krishna Bihari Mishra

One thought on “वो आखिरी call और सपना (पार्ट – वन)

  1. शुक्रिया ! जिस दर्द को शब्दों में बयां किया गया है उससे महसूस करने के लिए काश, हेमंत सरकार के पास वो दिल होता । तो आज तीन दर्जन से ज्यादा पत्रकारों के मौत के बाद आसमय मौत को गले लगा चुके पत्रकारों के परिवारों की चीख अवश्य सुनाई देती। पत्रकारों के भाव और उनके परिवारों पर क्या बित रही है इस पीड़ा को समझने और समझाने के लिए इससे बढ़िया और दूसरा कोई आलेख हो ही नहीं सकता है। हां ! भले यह दर्द किसी खास राजेश पति के संदर्भ में लिखी गयी है लेकिन मौत के मुंह में समां गये कितने ही राजेश पति है जिनके बारे में कहीं कुछ लिखा नहीं गया है लेकिन उनकी आवाज और उनके परिवार के दर्द को हम पत्रकार ज़रूर महसूस कर रहे हैं।
    ऐसे में राज्य के सीएम माननीय हेमंत सोरेन जी आत्मयिता के साथ भावपूर्ण अनुरोध है मुख्यमंत्री जी प्लीज ! समाज के ऐसे सजग प्रहरी के पीड़ा को नजरंदाज मत कीजिए आपसे हम पत्रकारों को बड़ी उम्मीदें है। दीपक कुमार 9234702701

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