जहां-जहां CM का जन-चौपाल, उस क्षेत्र के पारा-टीचरों पर आफत, उनके घरों से उठा ले जा रही पुलिस

भाई, ये झारखण्ड में क्या हो रहा है? आखिर राज्य के सीएम को किस बात का डर? वे तो सबको एक ही लाठी से हांकने के लिए जाने जाते हैं, ऐसे में पारा टीचरों को रातों-रात उनके घरों से उठाने की बात तो शर्मनाक है, भला पारा-टीचर उनका क्या बिगाड़ लेंगे, बेचारे सात-आठ हजार रुपये में खटनेवाले पारा-टीचरों की एक सीएम के सामने क्या औकात?  पर जिस प्रकार से पारा-टीचरों पर दमन का नया फार्मूला इजाद हुआ है, वह लोकतंत्र के लिए घातक है।

पिछले गुरुवार को मुख्यमंत्री रघुवर दास की जामताड़ा में जन-चौपाल का कार्यक्रम था, पता चला कि वहां के नगर थाना प्रभारी रवीन्द्र कुमार सिंह ने बुधवार को ही पारा शिक्षकों को हिरासत में ले लिया, नगर थाना प्रभारी ने सारे पारा-शिक्षकों को पहले चिह्नित किया और फिर थाना बुला लिया, इसी प्रकार नारायणपुर थाना प्रभारी अजय कुमार सिंह ने अपने इलाके से पारा शिक्षकों को घर से उठा लिया।

जब पारा शिक्षकों के दल ने नारायण पुर थाना प्रभारी अजय कुमार सिंह से सवाल पूछा कि आखिर पारा शिक्षकों को उनके घर से क्यों उठाया जा रहा, तब अजय कुमार सिंह का जवाब था कि उन्हें ऊपर से आदेश मिला है, कि पारा शिक्षकों को जब तक जामताड़ा में मुख्यमंत्री का जन-चौपाल सम्पन्न न हो जाये, तब तक उन्हें हिरासत में रखे।

इस नये फरमान से सन्न रहे पारा शिक्षक संघ के प्रखण्ड सचिव शब्बीर अंसारी का कहना था कि ये तो मानवाधिकार का हनन है, कभी पारा शिक्षकों पर मुकदमा, कभी घर से उन्हें उठा लिया जाना, इसे तो कतई सही नहीं ठहराया जा सकता, अपनी बातें रखना तो संवैधानिक अधिकार है, इस पर भी रोक, ये तो सारी सीमाएं लांघनेवाली बात हो गई।

अब जरा जरमुंडी की बात कर लें, जनाब यहां भी जन-चौपाल करने जा रहे थे, अचानक इन्हें पता चला कि जरमुंडी में पारा-टीचर का जनाक्रोश उन्हें झेलना पड़ सकता है, इन्होंने अचानक अपना कार्यक्रम स्थगित कर दिया और अपने मंत्री राज पलिवार को जन-चौपाल में अपना प्रतिनिधित्व करने भेजा, इसी बीच खुद सीएम के सोशल साइट पर लक्खी गुप्ता ने स्पष्ट रुप से अपना विचार प्रकट कर दिया कि अच्छा हुआ कि आप यहां नहीं आये, नहीं तो आपका विरोध सुनिश्चित था।

संजय यादव ने लिखा – डर इसे कहते है। अशोक विश्वकर्मा ने लिखा यदि आप पारा शिक्षकों के लिए अच्छा करते, तो आज यहीं पारा शिक्षक आपके आगमन को लेकर गुलदस्ता लेकर खड़े रहते, जिसका कोई डर आपको नहीं रहता, ना काला दिवस देखने को मिलता। दीपक ने लिखा ये अपरिहार्य कारण समझ नहीं आया।

देवघर के सारवां में रघुवर दास के कार्यक्रम रद्द होने पर, जिन पारा शिक्षकों को पुलिस ने हिरासत में रखा था, उन पारा शिक्षकों ने थाने में जमकर हंगामा किया और नारेबाजी की। इन पारा शिक्षकों ने तो साफ कहा कि रघुवर दास की अब हिटलरशाही नहीं चलेगी और न तानाशाही चलेगी। पारा शिक्षकों ने कहा कि मुख्यमंत्री का कार्यक्रम पारा टीचरों के भय से स्थगित कर दिया गया, मेदिनीनगर में वे बोले थे, कि नहीं झूकुंगा, न टूटुंगा, पर अब वे टूटने शुरु हो गये है। आनेवाले समय में झूंकेंगे भी। उन्हें वेतनमान देना होगा, स्थायीकरण करना होगा।

पारा टीचरों का कहना था कि बड़ा स्टार प्रचारक बनकर छत्तीसगढ़ गये थे, क्या हुआ वहां? सब को मालूम है, अगर अपनी बात नहीं मानी तो झारखण्ड में भी वहीं होगा, जो छत्तीसगढ़ में हुआ। इस बार कमल यहां नहीं खिलेगा, क्योंकि ऐसे भी यहां पानी नहीं पड़ा हैं और न झारखण्ड में कीचड़ हैं, सब जगह सूखा ही सूखा है। इन पारा टीचरों ने यह भी कहा कि उनका उलगुलान जारी रहेगा, पूर्ण शिक्षक बन कर रहेंगे, उनका आंदोलन दिल्ली के जंतर-मंतर तक जायेगा। अगर 27 दिसम्बर तक सरकार ने बात नहीं मानी, तो वे 27 दिसम्बर के बाद उग्र आंदोलन करेंगे। जरुरत पड़ा तो आनेवाले समय में ये पारा टीचर विधानसभा का चुनाव भी लड़ेंगे और अपने साथियों में से किसी एक को मुख्यमंत्री भी बनवायेंगे।