जब राजनीति में कुर्सी का स्वाद लगता है, तो निर्लज्जता के आभूषण पहनने को दिल मचल ही जाता है

याद करिये आज से ठीक छः-सात साल पहले दिल्ली में क्या होता था? एक कथित सत्य हरिश्चन्द्र के प्रतीक बाबा अचानक पैदा हुए, नाम था – अन्ना हजारे, उनके साथ बहुत सारे लोग जिनका नाम अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, राजेन्द्र यादव आदि हुआ करते थे, जुड़ने शुरु हुए, बहुत बड़ा-बड़ा तिरंगा झंडा लहराया जाता था। लोगों को लगा कि बस अब भारत में क्रांति आनेवाला ही है, अरविन्द केजरीवाल को इस प्रकार पेश किया जाने लगा कि ये हरिश्चन्द्र ही बन बैठे,

याद करिये आज से ठीक छः-सात साल पहले दिल्ली में क्या होता था? एक कथित सत्य हरिश्चन्द्र के प्रतीक बाबा अचानक पैदा हुए, नाम था – अन्ना हजारे, उनके साथ बहुत सारे लोग जिनका नाम अरविन्द केजरीवाल, किरण बेदी, राजेन्द्र यादव आदि हुआ करते थे, जुड़ने शुरु हुए, बहुत बड़ा-बड़ा तिरंगा झंडा लहराया जाता था। लोगों को लगा कि बस अब भारत में क्रांति आनेवाला ही है।

अरविन्द केजरीवाल को इस प्रकार पेश किया जाने लगा कि ये हरिश्चन्द्र ही बन बैठे, जैसे-जैसे इस आंदोलन की मीडिया में पैठ होती जा रही थी, ठीक उसी प्रकार इसकी लोकप्रियता भी बढ़ती जा रही थी, पुण्यप्रसून वाजपेयी और आशुतोष जैसे पत्रकारों को तो लगा कि बस अभी नहीं तो कभी नहीं, पुण्य प्रसून वाजपेयी और आशुतोष जैसे लोग तो अरविन्द केजरीवाल के सामने सीधे लोट गये।

उस वक्त दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को मीडिया और इन श्रीमानों ने विलेन की तरह प्रस्तुत करना शुरु कर दिया, दिल्ली की जनता को भी लगा कि शीला दीक्षित दिल्ली के योग्य नहीं, नई पार्टी बनी, नाम रखा गया – आम आदमी पार्टी, चुनाव चिह्न भी अनोखा था – झाड़ू यानी इसका मतलब था कि इसी झाड़ू से राजनीति में व्याप्त गंदगी को साफ करना है, पर ये क्या? जैसे  ही इन्हें राजनीति की कुर्सी का स्वाद लगा, इन सारे लोगों ने निर्लज्जता के आभूषण को पहनकर उन सारे कुकर्मों को करने शुरु कर दिये, जिन कुकर्मों के खिलाफ इन्होंने आंदोलन किया और राजनीति शुरु की।

जरा देखिये न, कल जिस शीला दीक्षित और कांग्रेस को कोसते थकते नहीं थे, जिन पर आरोप लगाने के लिए पेपरों की कटिंग से लेकर, पता नहीं क्या-क्या दस्तावेज लेकर घूमते रहते थे और कहा करते थे कि इनलोगों का स्थान जेल में हैं, आज वे ही शीला दीक्षित के चरण छूने के लिए, कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए दिल्ली की लोकसभा सीट के लिए गठबंधन करने के लिए लालायित है, हालांकि कांग्रेस इन्हें भाव नहीं दे रही, फिर भी ये कांग्रेस के बड़े नेताओं के पांवों को छूने के लिए लालायित है।

आश्चर्य है कि जिन लोगों ने जैसे राजेन्द्र यादव, कुमार विश्वास ने इन्हें ऊंचाइयों पर लाकर खड़ा कर दिया, उन्हें ही इन्होंने बाहर का रास्ता दिखा दिया तथा स्वयं राजनीति का परम स्वाद लेने में सबसे आगे रहे। आश्चर्य है कि जिस पार्टी की दिल्ली में 70 विधानसभा सीटों में 67 विधायक हैं, वह कांग्रेस के नेताओं के आगे-पीछे लोकसभा सीटों पर तालमेल करने के लिए गठबंधन करने के लिए नाक रगड़ रही है, दरअसल ऐसा इसलिए कि आम आदमी पार्टी के ये तथाकथित बड़े नेताओं को आभास हो गया कि उनकी भी असलियत जनता जान चुकी है, और ये भी उन्हीं पार्टियों के कतारों में खड़े हो गये हैं, जो घटियास्तर की राजनीति की पैदाइश है।

कमाल है, केवल अपनी राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए यह शख्स पटना में लालू की रैली में भाषण देने के लिए पहुंच जाता है, अब सवाल उठता है कि कोई व्यक्ति जो सत्य की राजनीति करेगा? क्या वो इतना नीचे गिर सकता है? जितना ये लोग गिरे है, क्या ये सत्य की राजनीति करनेवाले ऐसा करेंगे? कि जिनके खिलाफ वे चुनाव लड़ें और जिन्हें इन्होंने हराया, उसी के पास जाकर ये कहें कि हम आपके साथ मिलकर चुनाव लड़ना चाहते हैं, हद हो गई, क्या दिल्ली की जनता इतनी बेशर्म है? वो क्या भूल गई, कि अरविन्द केजरीवाल ने आज से छः-सात साल पहले ही कांग्रेस और शीला दीक्षित के खिलाफ क्या-क्या बयान दिये थे?

दरअसल, कांग्रेस जान चुकी है कि आम आदमी पार्टी का दिल्ली में बैंड बज चुका है, अब जब भी चुनाव होंगे, ये पार्टी दिल्ली में भुकभुका रही होगी, ऐसे में उसके साथ गठबंधन कर, उसे मजबूत क्यों करें? आम आदमी पार्टी के नेता भी जान चुके है कि अब दिल्ली में फिर से सत्ता प्राप्त करना संभव नहीं, क्योंकि उनकी बीमारियों के बारे में आम जनता को पता लग चुका है कि आम आदमी पार्टी के नेता कितने दूध के धूले हैं, ऐसे में कुल मिलाकर गति तो वहीं होनी है, जो अन्य दलों की हैं, इसलिए क्यों न असली दोगली राजनीति में उतरकर गंगा नहा लें।

जरा आप नेताओं का बयान देखिये, दिल्ली प्रदेश संयोजक गोपाल राय कहते है कि कांग्रेस तय नहीं कर पा रही कि मोदी को हराए या कांग्रेस को बचाएं। वे यह भी कहते है कि कांग्रेस विपक्ष को कमजोर करने का काम कर रही हैं। कमाल है, कांग्रेस क्या करेगी या नहीं करेगी, ये आपसे पूछेगी क्या? आप बताओं न, आप क्या कर रहे हो? आपको दिल्ली के सातों सीटों पर चुनाव लड़ने से कौन रोक रखा है? आप गठबंधन पर क्यों दिमाग लगा रहे हो? आप सीधे क्यों नही कहते कि आप बिना गठबंधन के एक भी सीट नहीं जीत सकते, क्योंकि आपने जनता का विश्वास खो दिया।

जरा आप नेता संजय सिंह को ही देखिये, ये कह रहे है कि कांग्रेस भाजपा को फायदा पहुंचाते दिख रही है, यानी आपके साथ कांग्रेस ने गठबंधन नहीं किया, आपको भाव नहीं दिया तो बस अंगूर खट्टे हैं, के पैटर्न पर बयान देने लगे, अरे आप खुद को मजबूत करिये न, क्यों दूसरे के साथ गठबंधन करने में दिमाग लगा रहे हैं? आप दिल्ली की जनता को मूर्ख समझने की कोशिश क्यों कर रहे हैं? 

Krishna Bihari Mishra

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