राजनीति

ग्रामीणों ने दिया सहयोग चारों जवान मुक्त, पर सरकार के खिलाफ जनाक्रोश बरकरार

लो कर लो बात, तीन नहीं चार जवानों को पत्थलगड़ी समर्थकों ने अगवा किया था। आज जैसे ही अहले सुबह ये खबर मिली की, पत्थलगड़ी समर्थकों द्वारा अपहृत तीन जवानों को पत्थलगड़ी समर्थकों ने मुक्त कर दिया, उसी वक्त ये भी समाचार मिला कि एक और जवान रिहा हुआ हैं, जिसे अपहृत कर लिया गया था, आश्चर्य इस बात की भी है कि चौथे जवान, जिसको 26 जून को ग्रामीणों ने बंधक बनाया था, उस बंधक बने जवान की सूचना न तो वरीय पुलिस पदाधिकारियों को थी और न ही तेज चैनलों व अखबारों को।

इन जवानों की सकुशल बरामदगी तो हो गई, पर इनके हथियार कहां हैं, किसी को नहीं पता, आशंका व्यक्त की जा रही हैं जिन्होंने अगवा किया, ये हथियार उन्हीं के पास होंगे। जवान सकुशल लौट आये, सचमुच बहुत खुशी की बात हैं, उनके परिवारवालों को भी यह समाचार सुनकर बहुत बड़ी खुशी मिली होगी। अब जवान सकुशल लौट आये, तो एक संशय उठना भी लाजिमी हैं, आखिर ये चारों जवान अहले सुबह कैसे मिल गये? क्या पुलिसिया दबाव के आगे पत्थलगड़ी समर्थकों को घूटने टेकने पड़े? अगर पत्थलगड़ी समर्थक पुलिसिया दवाब के आगे झूकने को तैयार थे, तो ऐसे हालात में पुलिस को सूचना देनेवाले को पांच लाख रुपये इनाम देने की घोषणा क्यों करनी पड़ी? क्या पत्थलगड़ी समर्थकों ने ग्रामीणों के हितों को देखते हुए, इन जवानों को छोडने का फैसला लिया?  या उन्होंने स्वयं इन पर दया करके छोड़ दिया? जवानों की सकुशल रिहाई को लेकर वरीय पुलिस पदाधिकारियों के बयानों में भी एक समानता नहीं दिखाई पड़ी, किसी ने इसे पुलिसिया दबाव में मुक्त करना बताया तो किसी ने ग्रामीणों के सहयोग मिलने को प्रमुख कारण बताया।

चलिये, दुष्कर्मियों की खोज में निकली पुलिस अपने जवानों की खोज में निकल पड़ी और अब जवान मिल भी गये, अब सवाल फिर भी वहीं हैं, कि पांच महिलाओं के दुष्कर्म में शामिल दुष्कर्मियों को पुलिस कब पकड़ेंगी, उस घटना स्थल पर कब पहुंचेगी, जहां दुष्कर्म हुआ? आखिर पुलिस की क्या मजबूरी थी कि वह खूंटी में भारी तादाद में होने के बावजूद वह उस स्थान पर जाने की साहस नही कर सकी, जहां यूसुफ सभा कर रहा था, जबकि वहां पत्रकारों का दल पहुंच चुका था।

सच्चाई यह भी है कि खूंटी में इस घटना के बाद पत्रकारों और पुलिस का प्रेम बढ़-चढ़कर दिखा, जिसकी चर्चा विभिन्न सोशल साइट पर हो रही हैं, कई लोगों का ये भी कहना है कि ग्रामीणों के साथ पुलिसिया व्यवहार इस दौरान कभी ठीक नहीं रहा, ग्रामीण युवाओं को हाथ बांधकर खूंटी में बने अस्थायी जेल में रखना, उनके साथ पुलिसिया अंदाज में पत्रकारों का बातचीत करना, किसी को रास नहीं आया।

जिसका आक्रोश कल रांची के अलबर्ट एक्का चौक पर भी दिखा, जिसमें कई आदिवासी संगठनों के लोगों ने संयुक्त आदिवासी सामाजिक संगठन के तत्वावधान में गुरुवार को मुख्यमंत्री रघुवर दास का पुतला फूंका, पुतला दहन खूंटी में ग्रामीणों पर किये गये लाठी चार्ज और मानवाधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ था। इन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि सरकार के इशारे पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, पत्थलगड़ी की परम्परा को गलत तरीके से सरकार और मीडिया द्वारा प्रचारित और प्रसारित किया जा रहा हैं।

खूंटी में हुए दुष्कर्म और चार जवानों के अगवा की घटना तथा तीन दिनों के बाद ग्रामीणों के सहयोग से हुई इनकी रिहाई, इस बात का संकेत है कि यहां सरकार का इकबाल समाप्त हो चुका हैं, पत्थलगड़ी समर्थकों ने खूंटी के इस घटना से सरकार को बता दिया कि यहां वहीं होगा, जो वे चाहेंगे। आज भी दुष्कर्म के आरोपी और पत्थलगड़ी में लगे लोग, पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। जो बताता है कि राज्य में किसका और कैसा शासन चल रहा हैं?

इधर कांग्रेस पार्टी ने खूंटी मामले को लेकर बयान दिया कि सरकार की गलत नीतियों के कारण ही खूंटी व पूरे राज्य में अशांति हैं, जबकि झाविमो ने इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री के घमंड और उनके अपरिपक्व निर्णय को जिम्मेदार बताया, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने तो सरकार की धज्जियां उड़ाते हुए कहा कि ये जो भी निर्णय ले रहे हैं, वह राज्य हित में नहीं हैं, जिसके कारण जनाक्रोश गांव-गांव में फैल रहा हैं और सरकार इसे समझने की प्रयास ही नहीं कर रही हैं, जरुरत हैं जन आकांक्षाओं को समझने की, पर यहां सरकार को इस बात के लिए फुर्सत ही नहीं।