विद्रोही 24.कॉम यानी कबीर शैली में विशुद्ध पत्रकारिता को जनता के बीच रखने की ईमानदार कोशिश

विद्रोही24.कॉम के आज पूरे दो वर्ष हो गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि यह पोर्टल किसी को बहुत अच्छा तो किसी को बहुत ही खराब लगा होगा। ऐसे भी हम किसी को खुश या किसी को दुखी करने के लिए इसे नहीं बनाया था। यह हमने कबीर शैली में विशुद्ध पत्रकारिता को जनता के बीच रखने की ईमानदार कोशिश करने के लिए इसकी नींव रखी थी, और हमें खुशी है कि हम अब तक इसे बनाये रखे हैं, क्योंकि हमें कबीर की वो पंक्ति बहुत ही अच्छी लगती है,

विद्रोही24.कॉम के आज पूरे दो वर्ष हो गये। इसमें कोई दो मत नहीं कि यह पोर्टल किसी को बहुत अच्छा तो किसी को बहुत ही खराब लगा होगा। ऐसे भी हम किसी को खुश या किसी को दुखी करने के लिए इसे नहीं बनाया था। यह हमने कबीर शैली में विशुद्ध पत्रकारिता को जनता के बीच रखने की ईमानदार कोशिश करने के लिए इसकी नींव रखी थी, और हमें खुशी है कि हम अब तक इसे बनाये रखे हैं, क्योंकि हमें कबीर की वो पंक्ति बहुत ही अच्छी लगती है, जिसमें उन्होंने कहा – “कबीरा खड़ा बाजार में, लिये लुआठी हाथ, जो घर जारे आपना चले हमारे साथ।”

कबीर की ये बेबाक पंक्ति बताती है कि समाज का भला वो ही कर सकता है, जिसने अपने लिए कुछ न पाने तथा ईश्वर ने जिस हाल में रखा है, उसी हाल में जीने की ईमानदार कोशिश करने की ठान ली है, और जिसने पाने की इच्छा रखी, वो कभी समाज का भला नहीं कर सकता और समाज को देने के इस चक्कर में व्यक्ति के पास जो भी कुछ होता हैं, वो समाप्त हो जाता है। यह ध्रुव सत्य है। कबीर जैसे लोग, जब तक जीवित होते हैं, लोग उनका जीवन जीना तक दूभर कर देते हैं और जैसे ही दुनिया छोड़ देते हैं, उनके नाम मंदिर और मठ बनने का सिलसिला शुरु हो जाता है, भले ही उन मंदिरों और मठों में कबीर रोज सिसकते ही क्यों न हो?

भारतीय संतों में कबीर ही एक हुए, जिन्होंने ताल ठोक कर कहा कि “ऐहि चादर सुर नर मुनि ओढ़े, ओढ़ के मैलि कीनी चदरिया, दास कबीर जतन्ह से ओढ़ी, ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।” ठीक इसी प्रकार मैं भी ताल ठोककर कह सकता हूं कि अपने पत्रकारिता जीवन में किसी से एक पैसे या उपहार या अनैतिक रुप से धन हमने नहीं कमाएं, और जो भी कमाया उसे पत्रकारिता में ही झोक दिया, भले ही उसका हमें लाभ मिले अथवा न मिले हो।

न कभी हमने कामना की कि कोई हमें पुरस्कार दे या हमें कोई पुरस्कार देगा तो हम लेने भी पहुंच जायेंगे, क्योंकि हमारी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रही। हमेशा फक्कड़ रहा, फक्कड़ की तरह जिंदगी गुजारी, एक जोड़ी शर्ट और एक जोड़ी पैंट, पांव में एक चप्पल हमारे लिए काफी है। इससे अधिक की कामना भी नहीं की। हां, मैंने ये पाया कि ईश्वरीय कृपा सदैव बनी रही। पत्रकारिता जीवन में हमारा किसी से नहीं बना, क्योंकि मैं किसी से बनने या बनाने पर विश्वास नहीं रखा। बस यहीं रखा कि पत्रकारिता जो सामाजिक सेवा का एक सुंदर ईश्वरीय उपहार है, उससे कैसे वंचितों-उपेक्षितों को न्याय दिलाया जाय।

बिहार-झारखण्ड में पत्रकारिता के दौरान अनेक झंझावातों को झेला। बिहार में एक चुनाव के दौरान तो रात में करीब नौ से दस की संख्या में जनता दल के समर्थक-गुंडे हमारे घर पर पहुंच गये थे, हमें तो लगा कि हमारी हत्या हो जायेगी, पर धन्य हमारे माता-पिता कि वे डरे नहीं, वे देख रहे थे कि सारे अपराधियों के पास रिवाल्वर मौजूद थे, उसके बावजूद भी उन्होंने हमें उन अपराधियों के समक्ष प्रस्तुत कर दिया, जबकि ऐसे मौके पर सामान्य माता-पिता बोल दिया करते हैं कि जिसे आप खोज रहे हैं, वह घर पर नहीं हैं।

कमोबेश माहौल सर्वत्र यहीं है, सत्ता बदल जाते है, पार्टियां बदल जाती है, पर सत्ताधीशों का चरित्र नहीं बदलता, उन्हें लगता है कि वे इसी के लिए पैदा लिये है। मैं झारखण्ड में देख रहा हूं कि यहां सत्ताधीश हाथी तक उड़ा दे रहे हैं, और उनके चापलूस वाह-वाह किये जा रहे हैं। मैं देख रहा हूं कि एक पिता अपनी जवान बेटी को गवां देता है, उसकी बेटी के साथ बलात्कार हो जाता हैं, बाद में उसे जिंदा जला दिया जाता है, वह पिता सीएम से न्याय मांगने जाता हैं, और सीएम उसे भरी सभा में जलील कर देता है, इससे बड़ी दर्दनाक तस्वीर कुछ और हो ही नहीं सकती, उसके बाद भी वह व्यक्ति बड़े ही शान से विकास की बात करता जमा हुआ हैं और उसके पिछलग्गू मीडिया के लोग उसकी जय-जय करते हैं, ऐसे में आप समझ लीजिये कि सत्ता और आज के मीडिया की क्या चरित्र है?

दो वर्ष बीत गये, मेरे एकाउंट में जितने पैसे थे, अब समाप्ति की ओर हैं, लगता है कि अब ये पोर्टल बंद करना पड़ेगा, क्योंकि विज्ञापन मैं किसी से मांगूंगा नहीं, किसी के आगे हाथ फैलाउँगा नहीं, क्योंकि ये हमारे चरित्र में ही नहीं हैं, सरकार उसी को सहायता देती है या समाज के तथाकथित धनकुबेर उसी की मदद करते हैं, जो उनके आगे ता-ता,थै-या करता हैं, और वो हमसे होगा नहीं, इसलिए ईश्वर जब तक इस पोर्टल को चला रहा हैं, चलेगा, नहीं तो बंद होना ही इसकी नियति हैं, तो बंद होगा? अंत में, आप सभी जिस प्रकार से इन दो वर्षों में विद्रोही 24.कॉम से जुड़े रहे, इसके लिए शुक्रिया, आगे ईश्वरीय इच्छा।

Krishna Bihari Mishra

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