रक्षाबंधन के मर्म को समझिये, केवल इसे भाई-बहन तक सीमित मत रखिये

रक्षाबंधन प्रतिवर्ष आकर कुछ कहता हैं, पर हमारे देश के लोग आज तक कभी नहीं समझ पाये कि वह कहता क्या है? सच्चाई तो यह भी है कि विश्व में एकमात्र देश भारत ही है, जहां के 98 प्रतिशत लोग अपने देश से प्यार ही नहीं करते, अगर सही मायनों में वे देश से प्यार करते, तो आज देश की यह दुर्दशा ही नहीं होती, किसी भी देश को संवरनें या संवारने के लिए 70 वर्ष कम नहीं होते,

रक्षाबंधन प्रतिवर्ष आकर कुछ कहता हैं, पर हमारे देश के लोग आज तक कभी नहीं समझ पाये कि वह कहता क्या है? सच्चाई तो यह भी है कि विश्व में एकमात्र देश भारत ही है, जहां के 98 प्रतिशत लोग अपने देश से प्यार ही नहीं करते, अगर सही मायनों में वे देश से प्यार करते, तो आज देश की यह दुर्दशा ही नहीं होती, किसी भी देश को संवरनें या संवारने के लिए 70 वर्ष कम नहीं होते, जब हमारा पड़ोसी चीन इससे भी कम आयु में पूरे विश्व को चुनौती दे सकता हैं तो ऐसा हम क्यों नहीं कर सकते थे, या कर सकते हैं?

हमें तो लगता है कि जिस प्रकार से यह देश निरन्तर चरित्र को खोता जा रहा हैं, आनेवाले समय में यहां दीपावली, दशहरा, होली आदि पर्व दिखाई ही नहीं पड़ेंगे और लोग पागलों की तरह अपना जीवन व्यतीत कर, खुद को गर्त में ढकेल देंगे। खतरा साफ दिखाई पड़ रहा हैं और इस बार को जो खतरा हैं, वह देश के बाहर से कम, और अंदर से ज्यादा है। याद रखिये हमने दीपावली, दशहरा, होली आदि पर्व की चर्चा की, क्योंकि ये ऐसे पर्व हैं, जो भारत या भारतवासियों के बीच ही दिखाई पड़ते हैं।

स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि भारत मर नहीं सकता, मुझे उनके कथन पर पूरा विश्वास भी हैं, क्योंकि भारत कोई वस्तु का नाम नहीं, भारत तो जीता जागता राष्ट्र पुरुष है, लेकिन हम जब इसी दिवास्वप्न में रहेंगे तो हमारा अहित ही होगा। हम नेताओं/प्रशासनिक अधिकारियों/काले कोटवालों के उपर अपने देश को छोड़ नहीं सकते, हमें उन महान क्रांतिकारियों/स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदानों को समझना होगा, कि आखिर उन्हें किस देश की परिकल्पना करते हुए, बलिदान दिया, क्या उन्होंने आज के भारत की जो तस्वीर हैं, उसकी कल्पना की थी। जाहिर हैं, ऐसे भारत की कल्पना, उन्होंने स्वप्न में नहीं की थी।

आज जो नेताओं/प्रशासनिक अधिकारियों/पूंजीपतियों का दल पूरे देश को दीमक की तरह चाट रहा हैं, उससे बचाने का जिम्मा किस पर हैं, कौन करेगा इनसे देश की रक्षा? गंभीर सवाल फिलहाल यहीं है। मैं जब पूरे देश के राजनीतिज्ञों पर नजर दौड़ाता हूं, तो आज से ठीक चार साल पहले एक चेहरा नजर आया था, नरेन्द्र मोदी का। लोगों का विश्वास जगा था, पर चार साल के अंदर जो इनकी स्थिति हैं, लोगों का विश्वास डिगा हैं।

आम जनता को विश्वास हो चला है कि नरेन्द्र मोदी पर अब विश्वास नहीं किया जा सकता, और जब विपक्ष की ओर देखें तो कोई ऐसा नेता दिखता ही नहीं, जिसमें चरित्र दिखाई देता हो, या जिस पर भरोसा किया जा सकता हो यानी भारत के सभी दलो के नेता, चाहे वह सत्तापक्ष हो या विपक्ष सभी अपने परिवार की सुरक्षा और उन्हें बेहतर बनाने में लगे हैं, ऐसे में देश की सुरक्षा और उसके भविष्य की सुरक्षा कौन करेगा? रक्षाबंधन का त्यौहार पूरे देश से यहीं पूछ रहा हैं।

रक्षाबंधन केवल भाई-बहन का ही त्योहार नहीं हैं, जब देवासुर संग्राम हुआ था तो इन्द्र की पत्नी ने इन्द्र को रक्षासूत्र बांधी थी, इसका मतलब यह नहीं कि इन्द्र की पत्नी, इन्द्र की बहन थी। विभिन्न मंदिरों, विभिन्न पूजनादि और यज्ञों के उपरांत दाहिने हाथों में रक्षासूत्र बांधने का जो विधान हैं, वह भी बताता है कि इस महान पर्व को भाई-बहन के त्यौहार तक सीमित करना किसी भी प्रकार से ठीक नहीं है, तो ऐसे में हमें क्या करना चाहिए, सभी को सोचना चाहिए।

याद रखिये, देश को खतरा अंदर और बाहर दोनों से हैं, आप रक्षाबंधन मनाइये जरुर, पर इसके अंदर छुपे भावों को समझिये, अगर भाव को नहीं समझेंगे तो रक्षाबंधन मनाना या नहीं मनाना दोनों बराबर हो जायेगा, कभी सोचिये कि आपके घर का ही कोई भाई, आपके लिए, सीमा पर तैनात हैं, वह भी गंभीर परिस्थितियों में, तो फिर आप अपने देश के भविष्य के लिए ईमानदारी, सच्चरित्रता को क्यों नहीं अपनाते? कहीं भी रहिये, देश को सामने रख, काम करिये, निःसंदेह आप रक्षाबंधन के महत्व को समझ जायेंगे।

Krishna Bihari Mishra

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