अब डाक्टरों के सम्मान का भी ठेका अखबारों ने लिया, रांची में गलत परम्परा की शुूरुआत

अगर सम्मान की बात करें तो हमें कबीर की पंक्ति याद करनी होगी, जिन्होंने सम्मान की परिभाषा बहुत ही खुबसूरत ढंग से अपनी दो पंक्तियों में कह दी। वो पंक्तियां थी – ‘कबीरा हम पैदा हुए, हम रोए जग हंसे, ऐसी करनी कर चलो, कि हम हंसे जग रोए’ अर्थात् स्पष्ट हैं कि व्यक्ति का सम्मान उसके कर्मों से होता हैं, वह कर्म जनहित में हो, तभी वह सम्मान का हकदार होता हैं।

ज्यादा दिनों की बात नहीं हैं, देश को पता चला कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का निधन हो गया और लीजिये जो अटल बिहारी वाजपेयी नौ वर्षों से नेपथ्य में थे, अचानक पूरा देश उनके लिए शोक में डूब गया, इसे कहते हैं – सम्मान। ये अलग बात है कि अब अटलजी के नाम पर अस्थि विसर्जन निकालने का जो फैशन चला हैं, उससे अटलजी के व्यक्तित्व को छोटा करने की कोशिश की जा रही हैं।

आजकल कई अखबार सम्मान समारोह के नाम पर इवेंट्स चला रहे हैं, और उसके माध्यम से वे बहुत सुंदर व्यवसाय भी कर ले रहे हैं, पहले छात्रों का सम्मान हुआ, उसके बाद महिलाओं का सम्मान का सिलसिला चला और लीजिए अब डाक्टरों का सम्मान कराने का सिलसिला प्रारम्भ हो गया, कल यानी 25 अगस्त 2018 को एक अखबार डाक्टरों को सम्मान समारोह के नाम पर पीतल का टुकड़ा थमाया, चादर ओढ़ाया और आगे देखियेगा, कल दूसरा अखबार इसी की देखा-देखी फिर वो अपने ढंग से डाक्टर सम्मान समारोह करेगा, और ये सब होगा, विज्ञापन की चकाचौंध को बरकरार रखने के लिए।

अगर आप फुर्सत में हैं तो आप प्रभात खबर के एक जुलाई 2018 का अखबार निकालिये, जिसमें तीन विज्ञापन तो साफ बता रहे हैं कि उन्होंने अखबार को कैसे अपने पक्ष में करने के लिए विज्ञापन दिये और उस विज्ञापन के प्रभाव में आकर कैसे उक्त अखबार ने संबंधित डाक्टरों को कल यानी 25 अगस्त को डाक्टर सम्मान समारोह में बुलाकर सम्मानित कर दिया, फोटो खिंचवाया और आज के अखबारों में स्थान भी दे दिया।

कमाल है, जिन डाक्टरों को उन्हीं के इलाके के लोग नहीं जानते, जिनको समाज से कोई मतलब ही नहीं, बिल्कुल मरीजों के साथ व्यवसायिक रिश्ते रखते हैं, वे समाज के कर्णधार कैसे हो सकते हैं?और उन्हें सम्मान देने की कोशिश एक अखबार अगर कर रहा हैं, तो इसी से साफ लग जाता है कि उक्त अखबार का उन डाक्टरों या उनके द्वारा चलनेवाले संस्थानों से कुछ न कुछ व्यवसायिक लाभ या संबंध अवश्य हैं।

अब हम आपको कई वर्ष पीछे ले चलते हैं, जब झारखण्ड नहीं बना था, बिहार की राजधानी पटना में एक डाक्टर हुआ करते थे, नाम था – डा. ए के सेन। पटना का कौन रिक्शावाला, टमटमवाला, टैक्सी चलानेवाला, फुटपाथ पर चाय बेचनेवाला, पान बेचनेवाला, झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाला, खोमचे पर भुंजा बेचनेवाला, ठेले पर केले बेचनेवाला, बाजार में सब्जी बेचनेवाला, डा. ए के सेन को नहीं जानता था? आखिर क्या वजह थी कि डा. ए के सेन इतने लोकप्रिय थे, कि गरीब तबका उनके खिलाफ एक शब्द सुनना नहीं चाहता था, और डा. ए के सेन भी अपने गरीब मरीजों की उतनी ही चिंता करते, जितने गरीब उनकी चिन्ता करते। लोकप्रियता ऐसी कि लोकप्रियता भी उनके आगे बौनी हो जाती।

पटना में एक और डाक्टर का नाम आता हैं, नाम था – डा. शिव नारायण सिंह, जब वे मरे तो पटना से प्रकाशित सारे अखबारों ने लिखा, गरीबों का मसीहा नहीं रहा।  क्या प्रभात खबर बता सकता है कि जिन डाक्टरों को उसने कल सम्मानित किया, उनमें से कितने डाक्टरों का चरित्र डा. ए के सेन और डा. शिव नारायण सिंह से मेल खाता है और जब कोई गरीबों का मसीहा ही नहीं तो फिर ऐसे सम्मान समारोह से किसे धोखा देने की कोशिश की जा रही हैं।

रांची में ही एक डाक्टर हैं एस पी मुखर्जी, जिनका सम्मान कई फिल्मी हस्तियां कर चुकी हैं, उसमें सुपर स्टार अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं, आज भी उनके चौखट पर गरीबों की भीड़ लगी रहती हैं, सम्मान क्या होता हैं? कोई उनके चौखट पर जाकर देखें, जब गरीबों की पीड़ा, डाक्टर एसपी मुखर्जी सुनते हैं, तो उन गरीबों की आंखे छलछला उठती हैं, और किसी डाक्टर के प्रति, गरीबों के आंखों में आंसू आ जाना, उनका छलछला जाना, इस बात का प्रतीक हैं, कि वह डाक्टर कितना प्रभावशाली हैं, कितना आनन्ददायी हैं, वह कितना ईश्वर के निकट हैं और हमें लगता कि इससे बड़ा सम्मान दूसरा किसी डाक्टर के लिए हो ही नहीं सकता।

मैं दावे के साथ कहता हूं कि डा. ए के सेन, डा. शिव नारायण सिंह जैसे चिकित्सक कभी मर ही नहीं सकते, वे तो आज भी गरीबों के दिलों में विद्यमान हैं, और आनेवाले समय में रांची में से अगर किसी डाक्टर को सम्मान देने की बात होगी तो हमें लगता है कि डा. एस पी मुखर्जी का नाम शीर्ष पर होगा?