RPC के अधिकारियों को दो-दो किट, अन्य पत्रकारों को जलपान तक नहीं, उन्हें मिले किट पर भी उठे सवाल, एक ने कहा – सब भिखारी

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धिक्कार ऐसे आयोजन पर, जहां आप खुद के लिए अलग व्यवस्था और दूसरों के लिए निम्नतम स्तर की व्यवस्था करते हैं। जहां आप अपने लिए दो-दो किट (ओपनिंग सेरेमनी और लीग मैच के लिए अलग-अलग) तथा स्पेशल भोजन-जलपान और अन्य लोगों को दोयम दर्जे का किट (जिसमें जूते एक ही खेल में दांत निपोड़ देते हैं) उपलब्ध कराते हैं तथा उन्हें भोजन व जलपान के लिए भी तरसा देते है, धिक्कार आपके द्वारा इस आयोजन पर, जहां लोग आपके ओपनिंग सेरेमनी में जाने से भी कतराते हैं, आप पर सवाल उठाते हैं।

और अंत में धिक्कार आपकी सोच पर कि आप उनके सवालों का जवाब न देकर ढीठई करते हैं। यह मैं इसलिए लिख रहा हूं कि कोई भी खेल चाहे वह क्रिकेट ही क्यों न हो, इन्सान को इन्सान से जोड़ता है, समाज को देश से तथा देशों को संपूर्ण विश्व से एकता के सूत्र में बांधता है, पर आपने तो क्रिकेट के माध्यम से पत्रकारों के ईमान की ही बोली लगा दी। वाह रे रांची प्रेस क्लब।

उदाहरण नंबर एक – एक पत्रकार है दिव्यांशु, जरा देखिये, उन्होंने व्हाट्सएप में बने क्लब फॉर इन्फॉरमेशन ग्रुप में क्या लिखा।

आदरणीय राजेश जी, अध्यक्ष रांची प्रेस क्लब, प्रेस क्लब की तरफ से मीडिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन शानदार है। क्लब के सदस्य के तौर पर टीम शंख का मैनेजर मुझे बनाया गया था। इसके लिए प्रेस क्लब की पूरी टीम का धन्यवाद। जेके मीडिया जो इस टूर्नामेंट का आयोजन कर रहा है उसकी तरफ से जारी प्रेस रिलीज में ओपनिंग सेरेमनी के लिए कुछ अतिथियों के नाम दिये गये हैं। अपने आयोजन के लिए किसी को अतिथि बनाना ये उनका निजी मामला है, लेकिन पत्रकारिता के लिए मेरी प्रतिबद्धता किसी भी ऐसे नाम के सामने जाने से हमें रोकती है जो स्वीकार्य न हो। जो हमारे मूल्यों के विपरीत हो उसके सामने हम चीयरलीडर्स की तरह पेश नहीं हो सकते। आग्रह है कि इस संदर्भ में मुझे दो सहूलियतें दी जाएं।

  1. मैं आयोजकों द्वारा दिया जानेवाला किट लेने में असमर्थ हूं।
  2. ओपनिंग सेरेमनी से में अनुपस्थित रहूंगा।

बाकी के मैच के दौरान मैं टीम के साथ मौजूद रहूंगा। प्रेस क्लब के प्रति एक आस्थापन सदस्य होने के नाते उम्मीद करता हूं कि मेरा आग्रह स्वीकार होगा। सादर,

दिव्यांशु कुमार।

इस पत्र का जवाब रांची प्रेस क्लब के अध्यक्ष ने दिव्यांशु को नहीं दी और लीजिये, उन्होंने अपने दोनों प्रश्नों के अनुसार, अपने कार्य को अंजाम दे दिया, यानी किट भी नहीं लिया और न ही ओपनिंग सेरेमनी में उपस्थित रहे, और ऐसा दिव्यांशु ने क्यों किया, उन्होंने बड़े ही सुंदर शब्दों में अपने पत्र में उसकी व्याख्या कर दी है, अगर आप बुद्धिमान है तो समझ लेंगे, नहीं तो… जो चल रहा है, वो ठीक ही है।

उदाहरण नंबर दो – और अब दूसरी तरफ नजर डालिये। वरिष्ठ पत्रकार सुशील सिंह मंटू ने कल यानी 16 जनवरी को सोशल साइट फेसबुक पर दो पोस्ट डाले हैं, ये दोनों पोस्ट प्रेस क्लब की कार्यप्रणाली पर अंगूलियां तो उठाते ही है, तथा इसमें दिये गये पत्रकारों के कमेन्ट्स प्रेस क्लब में शामिल अधिकारियों की घटिया सोच व मानसिकता को भी दर्शाते हैं। सुशील सिंह मंटू ने लिखा – “आयोजक प्रायोजक के भरोसे और मेहमान भगवान भरोसे” और इसमें चंद्रशेखर द्वारा लिखे गये चार शब्द कितने मर्मान्तक है, थोड़ा प्रेस क्लब के वरीय अधिकारियों को चिन्तन करना चाहिए।

शब्द है – भूखे रह गए बच्चे। आगे कमेन्ट्स में ही लिखा है सुशील सिंह मंटू ने कि दो दर्जन से ज्यादा मित्रों को मैंने रोका आधे-एक घंटे तक बाद में वे बगैर बताये चले गये, दुखी हूं। आगे मनोज कुमार लिखते है – “भोजन इंतजाम संभवतः लंच के समय का था, ढाई बजे हमने भी मुआयना किया तो लगा कि एक घंटा और लगेगा, तब हम बेटे के साथ निकल गये।”

कहने का मतलब है, ये वो लोग थे, जो आमंत्रित करनेवालों के उस अनुरोध पर अपने परिवार-बच्चों के साथ 16 जनवरी को पहुंचे थे, जिसमें सभी से अनुरोध किया गया था कि सारे पत्रकार मित्र अपने परिवार के साथ पहुंचे, क्योंकि ये क्रिकेट अपने परिवार के लोगों का भी है।

अपने एक दूसरे पोस्ट में सुशील सिंह मंटू ने लिखा है कि – “भिक्षा भी चाहिए लेकिन पसंद अपनी हो और वो भी सर्वोत्तम, कभी दान भी किया करो अपनी ही पसंद का” – इस पोस्ट में पत्रकारों की मानसिकता का दर्शन कराया गया है कि कैसे एक किट के लिए लोगों की मानसिकता बदल जाती है और इसी पर कमेन्ट्स में अयोध्या नाथ मिश्र ने वो करारा तमाचा जड़ा है, कि क्या कहा जाये, फिर भी शर्म तो उसे आती है, जिसे शर्म हो, जरा देखिये उन्होंने क्या लिखा – “यहां सब भिखारी हैं।”

सुशील सिंह मंटू ने बड़े ही सुंदर ढंग से लिखा है कि 190 की हामी भरवाने के बाद, 290 का बिल फाड़ोगे तो क्या होगा? अगर किसी को वोट की चिन्ता है तो किसी और को पॉकिट की चिन्ता लाजिमी है। भाई बात भी सत्य है, रांची प्रेस क्लब के लोग अपने वोट को देखते हुए किट लेनेवालों की संख्या बढ़ायेंगे तो जिसे किट देना है वो भी अपनी पॉकिट देखेगा? हम आपको बता दें कि रांची प्रेस क्लब को खाने-पीने और ट्रॉफी की चिन्ता करनी थी और किट तथा मैदान से संबंधित सामग्रियों की चिन्ता प्रायोजकों को करनी थी।

रांची प्रेस क्लब ने खाने-पीने की कैसी व्यवस्था की, ये तो पत्रकार ही बेहतर बता रहे है कि उनके बच्चे को भोजन नहीं मिल सका तो दूसरी ओर किट को लेकर भी कई पत्रकारों ने अंगूलियां उठा दी, आश्चर्य है कि अंगूलियां तो उठानेवाले उठायेंगे ही पर रांची प्रेस क्लब के अधिकारियों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, इतने थूकम-फजीहत होने के बावजूद भी उन्होंने ओपनिंग सेरेमनी और लीग मैचों के लिए अपनी अलग-अलग किट की व्यवस्था कर ही ली और प्रायोजकों ने ऐसा करने में उनकी जमकर मदद भी की, शायद प्रायोजकों को लगता है कि रांची प्रेस क्लब के अधिकारी ही पत्रकारों के भाग्य-विधाता है, रांची प्रेस क्लब के अधिकारी खुश, सारे पत्रकार खुश।

तभी तो सभी के सभी इतना होने के बावजूद विकेट के बीच बल्ला लहरा रहे हैं, दूसरा होता या किसी के पास सम्मान होता तो वो कब का निकल चुका होता, पर चूंकि ये तो पत्रकार है, पत्रकार तो निराले होते हैं, शब्दों की मार इनके लिए थोड़े ही बने हैं, ये शब्दों की मार तो दूसरों के लिए बने है, लेकिन उन्हें नहीं पता कि उनकी शब्दों की मार को कब के स्थानीय निवासियों ने कूड़े-कचरे पर डालकर फूंक डाला है।

अंत में जेके आरपीसी टूर्नामेंट का व्हाट्सएप ग्रुप का नजारा देखिये, पहला पत्रकार – दूसरे मैच में खेल खत्म होने के बाद दोनों टीमों के कुल पचास लोगों के लिए एक पीस लस्सी/फ्रूटी, समोसा और कचौड़ी (अनलिमिटेड) केला आदि। दूसरा पत्रकार – ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। बहुत निराशा हुई। पहला पत्रकार – भैया जानकारी मिली है, दुरुस्त कराते हैं, अव्यवस्था के लिए क्षमा।

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