छठि मइया और भगवान भास्कर को समझने की कोशिश करिये, समझ गये तो बेड़ा पार, नहीं तो…

मगध (अब बिहार) की राजधानी पाटलिपुत्र (अब पटना) के गंगा तट व गया के फल्गू नदी के तट पर काफी कम संख्या में कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को जब अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को पहले अर्घ्य के लिए लोग जुटे होंगे, तो उन्हें शायद ही यह पता होगा कि उनके द्वारा किये जा रहे भगवान भास्कर के महात्म्य पटना और गया से निकलकर पूरे विश्व में छा जायेंगे, और यह पर्व बिहार की आत्मा के रुप में विकसित हो जायेगा,

मगध (अब बिहार) की राजधानी पाटलिपुत्र (अब पटना) के गंगा तट व गया के फल्गू नदी के तट पर काफी कम संख्या में कार्तिक शुक्लपक्ष की षष्ठी तिथि को जब अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को पहले अर्घ्य के लिए लोग जुटे होंगे, तो उन्हें शायद ही यह पता होगा कि उनके द्वारा किये जा रहे भगवान भास्कर के महात्म्य पटना और गया से निकलकर पूरे विश्व में छा जायेंगे, और यह पर्व बिहार की आत्मा के रुप में विकसित हो जायेगा, लेकिन अतीत के पन्नों से निकलकर वर्तमान को जब मैं देखता हूं, तो सच यही है।

जब मैं बहुत छोटा था, और जब ज्ञान के अंकुर धीरे-धीरे मन-मस्तिष्क को झकझोरने के लिए उत्सुक हो रहे थे, तब मैंने अपनी मां को पहली बार छठ व्रत करते देखा था, बाबूजी मां को छठव्रत करने के लिए प्रेरित किया करते, घर के सदस्य भी मां को व्रत करता हुआ देख, आनन्दित रहते, एक महीने पहले से छठ गीत शुरु हो जाया करता और जैसे-जैसे छठ नजदीक आता, वातावरण में छठगीतों की मिठास और घुलती जाती, लेकिन पता नहीं कब कौन सी घटना घटी, अचानक मां ने छठव्रत करना बंद कर दिया, लेकिन बाल सुलभ जिज्ञासा छठ को लेकर बनती जाती, और मां से सवाल कर दिया करता।

सवाल होता। यह छठी मइया कौन है? लोग छठी मइया का गीत गाते हैं, और भगवान भास्कर को अर्घ्य क्यों देते हैं? षष्ठी के दिन तो भगवान भास्कर के पूजन का कहीं कोई विधान ही नहीं, फिर भी षष्ठी को भगवान भास्कर को अर्घ्य क्यों? नदियों में जाकर ही अर्घ्य क्यों? बगल के कुएं पर क्यों नहीं, जबकि आम तौर पर जब भी मां भगवान भास्कर का पूजन करती, तो वह घर में बने कुएं पर ही भगवान भास्कर को अर्घ्य दे दिया करती थी। नये वस्त्र ही क्यों? बिना सिले वस्त्र ही क्यों? मांग और सिर पर सिंदूर क्यों? डाला, दौरा, डगरा, सूप की आवश्यकता क्यों? केला का घवद ही क्यों? पहले अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य क्यों? और बाद में उदयाचलगामी भगवान भास्कर को क्यों? और यह व्रत किसे और क्यों करना चाहिए?

मां मेरे प्रश्नों को बहुत ध्यान से सुनती और मुस्कुरा देती, शायद मां को लगता था कि कितना भी जवाब दे दो, मैं संतुष्ट होनेवाला नहीं था और प्रश्नों की झरियां लगती जाती। जब हमारे घर में विद्वानों के समूहों का आगमन होता, तो उनसे भी हमारा सवाल यहीं रहता, कुछ प्रश्नों के जवाब के उत्तर हमें मिल जाते, तो कई के उत्तर से मैं संतुष्ट नहीं हो पाता, पर मेरी जिज्ञासा कभी खत्म नहीं हुई और मुझे खुशी है कि उन सारे प्रश्नों के उत्तर मुझे सहज ही मेरी मां और कुछ विद्वानों से मिल गये।

1977 का समय था, मेरी उम्र दस वर्ष थी। उस वक्त आज की तरह सीडी, डीवीडी या पेनड्राइव का युग नहीं था, ले-देकर चोंगा का युग था, और रिकार्ड से गाने बजाये जाते। उस वक्त पारम्परिक गीतों से ही छठ संपन्न होते थे, ले-देकर एक ही रिकार्ड होता था, बाजा बजानेवालों के पास, जो छठ के दिनों में निकालते और फिर उसे अगले साल के लिए संभाल कर रख देते, आज जब मैं उन रिकार्डों के गीतों खोजता हूं तो नहीं मिलते, और आज इतने छठ गीत प्रचलन में हैं कि उन गीतों से भी हमारी प्यास नहीं बुझती, आज भी उन गीतों के लिए मैं पागल हूं, जिसे बचपन में सुनकर, मैंने युवावस्था में कदम रखा था, जीवन्त गीत थे, उस गीत ने एक प्रश्न का हल कर दिया था कि इस व्रत को किसे करना चाहिए?

मेरी मां ने कहा था कि छठ आम तौर पर घर में बुढ़ी औरतें किया करती हैं, तथा घर के बाकी लोग उन्हें सहयोग करते हैं, क्योंकि यह सामान्य व्रत नहीं, बल्कि इसमें तपस्या निहित हैं और बहुत सारे लोकाचार हैं, जिसे अपनाना होता हैं और उसके लिए जरुरी हैं, पूरी तरह से सात्विकता को अपनाना, जो सबके लिए संभव नहीं, साथ ही यह व्रत परिपूर्णता का पर्व हैं, जिसने जिंदगी जी ली, जो हर प्रकार से संतुष्ट हैं, जिसे भगवान की कृपा से अन्न, धन, जन सभी प्राप्त हैं, वह भगवान भास्कर को धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए यह व्रत करता है और भगवान से यह अनुरोध भी कि अगला जन्म दो तो ऐसा जन्म देना, जिसमें वो हर चीज हो, जो एक गीत के माध्यम से एक छठव्रती ने मन में भाव रखा हैं, वह गीत था…

दरशन दीहि न अपान, दीनानाथ

दरशन दीहि न अपान, दीनानाथ

भेंट लीहि न हमार,दीनानाथ…

मांगू-मांगू सेवई कवन फल मंगवे – 2

जे तोरा हृदय समाय, दीनानाथ…

ससुरा में मांगिल, अन्न-धन सोनवा – 2

नइहर सहोदर, जेठ भाई, दीनानाथ…

सभवा बइठन के, बेटा मांगिल – 2

गोरवा दबन के पतोह, दीनानाथ…

रुनकी-झूनकी बेटी, मांगिल – 2

पढ़ल पंडितवा, दामाद, दीनानाथ…

अपनाला मांगिल, अवध सेन्हुरवा -2

जनम-जनम अहिवात, दीनानाथ…

ये गीत बता देता कि एक परिवार के लिए बेटी कितनी महत्वपूर्ण हैं और बेटी हो तो कैसी? थोड़ा हंसमुख, चंचल और पूरे घर को रौनक प्रदान करनेवाली हो, और यही कारण है कि यह व्रत और व्रतों से इसे अलग कर देती हैं, भारतीय संस्कृति में यही एक व्रत हैं, जो बेटियों के लिए भी की जाती हैं, जो आजकल बेटी-पढ़ाओ, बेटी बचाओ का केवल नारा देते हैं और बेटियों को सम्मान नहीं देते, उनके लिए यह व्रत सबक भी हैं। एक और गीत उस वक्त चला करता था, जो आज भी हैं, पर उसे इतना तोड़-मरोड़ दिया गया, कि उसके तोते की तरह प्राण पखेरु उड़ गये, जैसे ध्यान दीजिये…

उजे केलवा जे फरेला घवद से, उपर सुगा मोर राय

उजे मरबो रे सुगवा धनुष से, सुगा गिरहे मुरछाय – 2

उजे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होखि न सहाय – 2

अमरुदवा जे फरेल घवद से, उपर सुगा मोर राय – 2

उजे मरबो रे सुगवा धनुष से, सुगा गिरहे मुरछाय – 2

यानी इस गीत में छठि मइया और भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के लिए जो फल का उत्पादन हो रहा हैं, उसकी शुद्धता पर ध्यान, साथ ही जो पक्षी उसे खाकर जूठा कर रहे हैं, उसे धमकी भी कि ऐसा नहीं करना, क्योंकि इस फल से भगवान को अर्घ्य देना हैं और लीजिये जब कोई पक्षी भक्त के आक्रोश का शिकार हुआ तो उसके लिए भी भगवान से प्रार्थना की, प्रभु आप उसकी पीड़ा हरे…

कमाल है, भारतीय संस्कृति तुम्हारा जवाब नहीं, पर अफसोस की लोग तुम्हारी इस संस्कृति को बाह्याडम्बर में विसर्जन कर दे रहे हैं, जिससे अंततः हानि न तो व्रत को हो रहा हैं, और न ही भारत को, बल्कि हो रहा हैं उन्हें, जिन्होंने भारतीय अध्यात्म को हृदय से समझने की कोशिश ही नहीं की।

आज तो अखबारों-चैनलों में कब्जा जमाये, मूर्खों ने तो जैसे लगा है कि उन्होंने इस व्रत की आत्मा को निकालकर बाहर फेक देने का ठेका ले लिया हैं, अनाप-शनाप छठव्रत के बारे में लिखकर, बोलकर इस व्रत की हत्या कर दे रहे हैं और लोग उन्हें ही सत्य समझकर खुद को बर्बादी के कगार पर ले आये हैं। इसी साल कुछ दिन पहले मैंने एक रांची के पत्रकार को कहा कि एक काम करिये, छठ को लेकर एक बढ़िया कार्यक्रम रखिये, मैं उसमें सहयोग करुंगा, उन्होंने हामी भरी, और लीजिये अब छठ व्रत खत्म होने के कगार पर हैं, उन्हें अल-बल से फुर्सत ही नहीं, चलिए यह ऐसा ही चलता रहेगा, कलियुग का प्रभाव भी आप कह सकते हैं।

एक चैनल में काम कर रही एक एंकर ने फेसबुक पर लिख दिया कि सूर्य की बहन हैं, छठि मइया। मेरा दिमाग चकराया, भाई भगवान भास्कर की बहन कब से छठि मइया हो गई, मैंने एक प्रश्न उनके फेसबुक पर डाला, लीजिये उन्होंने अपने रिश्तेदारों की सूची लिख दी और कह डाला कि हमने अपने रिश्तेदारों से यही सुना है, और लगे हाथों जैसा कि हमारे यहां प्रचलन हैं, जाने न बूझे और कलमचंद कहाएं के तर्ज पर एक सज्जन उछलकर सर्टिफिकेट भी प्रदान कर दिया कि एंकर जी, सही कह रही हैं, तो भाई हमें क्या जरुरत हैं, आप जैसे सर्टिफिकेट बांटनेवाले से उलझने की, तुम्हारा ज्ञान, तुम्हे मुबारक।

दरअसल हमारी जो तिथियां हैं, वह मातृस्वरुपा है, इसलिए चूंकि यह व्रत षष्ठी तिथि को पड़ा, इसलिए भी कुछ लोग इसे छठी मइया कहते हैं। कुछ लोग इन्हें षष्ठी देवी भी कहते हैं, जिन्हें हम छठियारी में पूजते हैं, क्योंकि कहा जाता है कि यह बालकों को दीर्घायु करती तथा नाना प्रकार के व्याधियों-दोषों से बचाती हैं, इसलिए यह वो छठि मइया है। कुछ लोग प्रकृति की छठी अंश की देवी स्वरुपा बताते हुए, इन्हें छठि मइया कहते हैं, कुछ लोग इन्हें आदिशक्ति कहा करते हैं, और कुछ लोग इन्हें जगदम्बा मानते हुए, उन्हें ही छठि मइया कहकर पुकारते हैं।

बहुत सारे विद्वानों का मत हैं कि चूंकि षष्ठी तिथि को भगवान भास्कर को अर्घ्य देते समय भगवान भास्कर की रश्मियों में षष्ठी माता का समावेश हो जाता हैं, इसलिए जब कोई भक्त भगवान भास्कर को अर्घ्य दे रहा होता हैं, या जो छठव्रती, छठव्रत कर रही होती हैं, उनकी प्रार्थना और उनके भाव भगवान भास्कर और छठि मइया दोनों स्वीकृत कर लेती हैं और मनोवांछित वरदान देकर तृप्त कर देती हैं और दूसरे दिन यानी सप्तमी चूंकि आज का दिन भगवान भास्कर को ही समर्पित हैं, इसलिए व्रत की पूर्णता सप्तमी के दिन उदयाचलगामी भगवान भास्कर को अर्घ्य देने के बाद स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

यह व्रत चैत्र, भाद्रपद और कार्तिकमास में धूमधाम से मनाया जाता हैं, पर सर्वाधिक इसकी महत्ता देखने को मिलती हैं – कार्तिक मास में, जब दीपावली के बाद का छठा दिन आता हैं। उस दिन बिहार, झारखण्ड और बिहार से सटे उत्तरप्रदेश तथा बंगाल, एवं देश के उन सारे जगहों पर जहां बिहारवासी पहुंच चुके हैं या विदेशों में जहां बिहार के लोग हैं, वहां का दृश्य देखते बनता हैं, मानो ऐसा प्रतीत होता है कि स्वर्ग धरती पर उतर आया हो।

लेकिन सवाल उठता है कि यह स्वर्ग केवल कार्तिक माह के छठ में ही क्यों?  चैत्र या भादों में होनेवाली छठ में क्यों नहीं, हमें तो लगता है कि बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि भादों के महीने में भी छठ होता हैं, जिसे लोलार्क(भगवान भास्कर का एक नाम) छठ भी होता हैं और यह स्वच्छता केवल छठ में ही क्यों और दिन क्यों नहीं, स्वच्छता ही तो जीवन का आधार हैं, पुरुषार्थ की पहली सीढ़ी हैं, इसे समझने की आवश्यकता क्यों नहीं।

चूंकि कार्तिक शुक्ल पक्ष में मनाई जानेवाला व्रत पूर्व में आम तौर पर बुढ़-पुरनिया द्वारा किया जाता था, इसलिए इसे बुढ़ी छठ भी कहा जाता है, लेकिन अब तो फैशन हो चला है, अब तो दुल्हन अपने ससुराल में पांव ठीक से रखती ही नहीं और उसे भी छठ करने का मन करने लगता है, चलिए आस्था के विषय को हम कब से चुनौती देने लगे, पर आस्था में जब दिखावापन आ जाये तो गलत हैं, इससे बचने की जरुरत हैं।

आजकल देखने में आ रहा है कि छठ के नाम पर कई लोग छठव्रतियों को मदद करने के लिए मुफ्त में साड़ी, फल और छठ की सामग्रियों के वितरण का कार्यक्रम या स्टाल लगाते हैं, और आश्चर्य है कि यहां इन वस्तुओं को लेने के लिए छठव्रतियों की एक लंबी पंक्तियां लग जाती हैं, इन पंक्तियों में वे लोग भी होते हैं, जिनको भगवान ने किसी भी प्रकार की कमी नहीं दी हैं, फिर भी मुफ्त की मिली चीजें अच्छी लगती है, इसलिए ये लोग धर्म के नाम पर मिलनेवाली इन मुफ्त की चीजों को लेने से नहीं चूकते।

जबकि धर्मशास्त्र कहता है कि कभी भी अध्यात्म अथवा पूजन कार्यादि में किसी का सहारा नहीं लेना चाहिए, जो आपको ईश्वर ने दिया हैं, उसी से उनकी आराधना-प्रार्थना कीजिये,नहीं तो आपका सारा पूजा-पाठ व्यर्थ हैं, बेकार है। जो लोग भीख में ली गई चीजों से ईश्वरीय प्रार्थना करते हैं, ईश्वर उनकी प्रार्थना को स्वीकार नहीं करता, ये ध्यान रखें।

आपके पुरुषार्थ से प्राप्त धन से लाई गई वस्तुएं ही ईश्वर को प्रिय हैं, और अगर नहीं हैं, तो भगवान भास्कर को आपके द्वारा अर्पित एक लोटा जल ही काफी हैं, और हमें नहीं लगता कि एक लोटा जल देनेलायक भी आप नहीं हैं, हमारी और आपकी ईश्वर के आगे कोई औकात नहीं हैं, सभी उसी का हैं, उसी की देन हैं, सब उसी को अर्पित होना है, चाहे आप चाहे अथवा न चाहें, इसलिए भिक्षावृत्ति तथा मुफ्त की चीजों को प्राप्त करने की इच्छा दिल से निकाल दीजिये, नहीं तो भगवान भास्कर व छठि मइया के कोपभाजन बनने को भी तैयार रहिये।

जो लोग दिखावे के लिए इस प्रकार के वितरण का स्टाल लगाते हैं, उन्हें भी इन सबसे बचना चाहिए, स्टाल की जगह आप अपने इलाके में ध्यान दीजिये कि कही किसी को किसी चीज की दिक्कत तो नहीं हो रही, उन दिक्कतों को दूर करने का प्रयास करिये, क्योंकि छठव्रतियों की सेवा भी एक प्रकार से छठ पूजा ही हैं, लेकिन याद रखियेगा, जो असली व्रतधारी होगा, वह किसी भी हालत में आपसे सेवा नहीं लेगा, क्योंकि वह तो भगवान भास्कर की सेवा के लिए व्रत का संकल्प कर रखा हैं, अगर वह खुद ही सेवा करवाने लगेगा तो भगवान भास्कर और छठि मइया की क्या सेवा करेगा? इस महान व्रत को समझना हैं तो समझिये, लिखने को बहुत कुछ हैं, पर अब पटाक्षेप कर रहा हूं।

Krishna Bihari Mishra

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Sun Nov 3 , 2019
अंधेरा धीरे-धीरे छंट रहा था, रवि की सवारी बड़ी तेजी से आकाश मार्ग की ओर बढ़ती जा रही थी, शायद भगवान भास्कर भी अपने भक्तों को देखने के लिए आह्लादित थे, वे नहीं चाहते थे कि छठव्रतियों को उनके दर्शन पाने में विलम्ब हो, वे सभी को आध्यात्मिक सुख प्रदान करना चाहते थे, चूंकि आज सप्तमी तिथि भी थी, और सप्तमी तिथि ऐसे भी भगवान भास्कर को चाहनेवालों के लिए खास तिथि होती हैं।

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