कल मोदी और आज प्रियंका के लिए भांड की तरह बिछ गये भारतीय चैनल्स, जबकि प्रियंका ने घास तक नहीं डाले

पहले मैं भी सोचता था कि न्यूज़ चैनल्स भाजपा के सामने बिछ गए हैं। लेकिन मैं गलत था। भाजपा ने कितना ही पुरातनपंथी, पूँजी समर्थक, लेकिन एक मॉडल मंदिर और साम्प्रदायिकता में लपेट कर बेचा, इन महोदया प्रियंका गांधी के पास बेचने को क्या है? उनके पास ऐसा कौन सा मॉडल/स्टेटमेंट है जो सारे चैनल बिना कोई सवाल उठाए, उनकी लखनऊ यात्रा पर भांडों की तरह बिछे जा रहे हैं? किसी ने चैनल्स को प्रियंका के लिए खरीदा नहीं है,

पहले मैं भी सोचता था कि न्यूज़ चैनल्स भाजपा के सामने बिछ गए हैं। लेकिन मैं गलत था। भाजपा ने कितना ही पुरातनपंथी, पूँजी समर्थक, लेकिन एक मॉडल मंदिर और साम्प्रदायिकता में लपेट कर बेचा, इन महोदया प्रियंका गांधी के पास बेचने को क्या है? उनके पास ऐसा कौन सा मॉडल/स्टेटमेंट है जो सारे चैनल बिना कोई सवाल उठाए, उनकी लखनऊ यात्रा पर भांडों की तरह बिछे जा रहे हैं? किसी ने चैनल्स को प्रियंका के लिए खरीदा नहीं है, बिछने को कहा नहीं है, ये खुद ही से गिरे हुए हैं, बिछे हुए हैं। महान एंकर एयरपोर्ट पर बिछी जा रही हैं। अरे कालीन बनो तो फिर भी समझ में आता है, ये तो पापोश हुई जा रही हैं।

उल्लू की दुम चीख रहा है – “यही वह जगह है जिसका उदघाटन उनकी दादी ने किया था, यही वह ट्रक है जिस पर वह लखनऊ घूमेंगी।” हर शाख पे उल्लू बैठे हैं। खबर कहाँ देखूँ? पाँच दिनों से गुर्जरों ने राजस्थान को बंधक बना रखा है। जिस तरह कभी पद्मावत पर करनी ने बनाया था टीवी स्टूडियो में तलवारें लहराते हुए, जिस तरह कभी लियोनि ने बनाया, (हालांकि वे काफी समझदार और अनुभवी हैं, इसलिए टीवी चैनलों की मूर्खतापूर्ण प्रैफरेंसेज के बावजूद रोचक बुद्धि की झलक दे गईं।) अभी क्या उम्मीद करूं? हे भगवान् ! हरियाणा में आरक्षण आन्दोलन तो क्या राम रहीम की गुंडा भीड़ पर भी कोई कार्रवाई नहीं करके सरकारों ने प्रिसीडेंस पेश किये ही हैं – चाहे जितनी गाड़ियां जला डालो, मार डालो, किसी पर कोई कार्रवाई नहीं होगी।

ज़हरीली शराब से सौ से ज्यादा मर गए, मृतकों के परिजनों के सिवा देश में कोई नहीं रोया, बिहार में बंद है।  राहुल से पूछो तो वे आएं-आएं करेंगे, आँख मारेंगे, प्रियंका से पूछो तो क्या कहेंगी मुझे नही पता। जोगी कहेंगे शराब पीना बुरी बात, (गनीमत है मोरारजी देसाई नहीं रहे)। नीतीश जी के यहाँ शराब से कोई नहीं मरता। कोई मर जाए तो रिपोर्ट नहीं होगी – ओफिसिअली शराब बिहार में है ही नहीं।  रिपोर्ट करके कौन दरोगा अपना गला फंसाए?

अलग बात है कि बच्चे स्कूली खाना खाके मर जाते हैं, संरक्षण गृह में मार के गाड़ दिए जाते हैं, सुप्रीम कोर्ट को इस अपराध की सुनवाई ठीक से कराने के लिए केस दिल्ली ट्रांसफर करना पड़ता है, पुलिस कमिश्नर को सुनवाई के लिए शिलोंग भेजना पड़ता है, DGP को तो बांगलादेश या बर्मा भेजना पडेगा। पाकिस्तान से भी एडवांस में बात कर लिया जाए तो बेहतर रहेगा। लेकिन उनका भरोसा इसलिए नहीं किया जा सकता, चूंकि अभी तो पाकिस्तानी चीफ जस्टिस ने अपने भ्रष्टाचारी PM, (वही अपने मोदी जी के शरीफ) दोस्त को गद्दी से उतारकर जेल भेज दिया था। फिर तो नेपाल या थाईलैंड भेजना ठीक रहेगा।  – प्रियंका को देखने में भूल गए क्या कि क्या बात चल रही थी?- वही सीबीआई पूछताछ के लिए भाईयों को कहाँ बाहर भेजना ठीक रहेगा। वही तो! 

भाइयो कभी पिंजरे में एक तोता होता था। वह चुपचाप चरता था। अब कई हो गए हैं और वे चरते पता नही कितना हैं लेकिन टर टर बहुत करते हैं। मैं यह कर दूंगा, मैं वह कर दूंगा – वगैरह इसलिए बिहेव योरसेल्फ। सुननेवाले दर्शक तालियाँ बजाते हैं , लेकिन होता जाता वही है जो होता आया है। सीरियसली, देश में ये किस तरह का प्रहसन है यार? 

चाहे वह आलोक वर्मा का मामला हो या राजीव कुमार का हो, आरक्षण का, SC-ST मामलों का, राफेल पर सरकार की अपमानजनक टिप्पणी का हो जिसे कोर्ट ने न जाने कैसे सह लिया। ये कैसा मजाक है भाई कि जिसे संविधान के इंटरप्रिटेशन का जिम्मा दिया गया है, उसे ही सरकार बेशर्मी से कहती है कि राफेल पर सरकारी शपथ को समझने में ऑनरेबुल न्यायमूर्ति गलती कर गए।

और ये कैसे हुआ कि मामूली बातों पर अवमानना चलाने वाले ऑनरेबुल ने इस बेइज्जती की कोई नोटिस ही नही ली? ये भविष्य के लिए बेहद बुरा प्रिसीडेंस है. आगे तो कोई भी कहेगा योर ऑनर आपने पहले भी समझने में भूलें की हैं….. 
इधर जस्टिस काटजू ने न्यायमूर्तियों पर भयंकर टिप्पणियाँ की हैं,सवाल उठाए हैं. उन्हें कम से कम अवमानना का नोटिस तो थमाइये योर ऑनर! 

(वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा के फेसबुक वॉल से साभार)

Krishna Bihari Mishra

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