ये जो तुम पत्रकारिता का धौंस दिखा रहे हो न, ये पत्रकारिता नहीं, बल्कि अपराध है…

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यह आज के दौर में चल रही जो पत्रकारिता है, वह दरअसल पत्रकारिता नहीं, शत प्रतिशत व्यवसाय है और जहां व्यवसाय होगा तो उसमें मानवीय मूल्य व चरित्र नहीं दिखेगा, उसमें सिर्फ और सिर्फ कुटिलता दिखेगी, जिस कुटिलता के आधार पर कितना धन कमाया गया, सिर्फ इसी पर विचार किया जायेगा, दूसरी मानवीय मूल्य धरे के धरे रह जायेंगे।

यह बातें मैं ऐसे ही नहीं कर रहा हूं, इधर जो पत्रकारों का हुजूम जो विभिन्न प्रेस कांफ्रेसों में कुकुरमुत्ते की तरह दिखाई पड़ रहे हैं या जो भेड़िया धसान अखबार, चैनल व पोर्टल खुल रहे हैं। यह देश/समाज के भले के लिए नहीं खुल रहे, बल्कि शुद्ध शत प्रतिशत व्यवसाय के लिए खुल रहे हैं, अपना कारोबार सही-सही रखने के लिए खुल रहे हैं, साथ ही भयादोहन व ब्लैकमेलिंग के लिए खुल रहे हैं, जिसका सीधा कुप्रभाव समाज व देश पर पड़ रहा है।

हालांकि ये भयादोहन व ब्लैकमेलिंग का कारोबार कोई आज से नहीं शुरु हुआ है, इसकी शुरुआत उसी समय से हो गई, जब बड़े-बड़े उद्योगपतियों ने अपने उद्योगों की सुरक्षा के लिए साइड से अखबार खोलने शुरु कर दिये थे, तथा जिसकी आड़ में ये राजनीतिक दलों के नेताओं को ब्लैकमेलिंग करना शुरु किया था। यह दौर था – स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद का समय।

हालांकि उस वक्त नेताओं के पास इतना चरित्र था कि इनकी ब्लैकमेलिंग उतनी नहीं चल पाती थी, पर जैसे-जैसे राजनीति में भ्रष्टाचार का प्रवेश हुआ, वह भ्रष्टाचार कब और कैसे अखबारों से होकर पत्रकारों की आत्माओं में प्रवेश कर गया, किसी के समझ में नहीं आया।पर आज जो समाज व देश की स्थिति हैं, मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि भारत के 98 प्रतिशत पत्रकार व समाचार पत्र, न्यूज चैनल, पोर्टल भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं।

कमाल की बात है कि इनका दो पक्ष है और दोनों पक्ष किसी न किसी राजनीतिक दल को सपोर्ट करते हैं, जिसके कारण स्थितियां और बिगड़ रही हैं, पूर्व में होता था कि गलतियों के आधार पर सत्ता का मूल्याकंण होता था, आज पत्रकार अपनी सोच के आधार पर किसी का भी मूल्यांकण कर गलत या सही उसे करार दे देता है, जैसे वामपंथ-कांग्रेस समर्थक पत्रकारों को भाजपाइयों में केवल बुराइयां दिखती है, चाहे वे अच्छे ही काम क्यों न करें।

ठीक वहीं स्थिति भाजपा समर्थक पत्रकारों की है, वे हर बुराइयों के लिए जिम्मेदार कांग्रेस व वामपंथियों को ठहरा देते हैं, जबकि होना यह चाहिए कि जो गलत है उसे गलत और सही को सही कहे, पर लगता है कि इनके लिए ये संभव ही नहीं, क्योंकि जब आत्मा वामपंथ-कांग्रेसियों और भाजपाइयों के गुलाम हो जायेंगे तो सच्चाई कहां से दिखेगी?

एक बात और, आजकल तो पत्रकार बनाने के लिए हर शहर ही नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कस्बों में खुले विश्वविद्यालयों-महाविद्यालयों में दुकान खोल दिये गये हैं, जहां पैसे लेकर दो सालों के अंदर पत्रकार बना दिये जाते हैं, इन दुकानों में तैयार हुए पत्रकारों को देख हमें आश्चर्य होता है कि आजकल पत्रकार बनाने के लिए भी विश्वविद्यालयों ने दुकान खोल कर रख दिये हैं।

इन्हीं विश्वविद्यालयों में पढ़ रहे एक-दो छात्र से हमारी दो दिन पहले एक न्यूज वाले संस्थान में भेंट हो गई। मैंने पूछा कि भाई तुम कहां पढ़ते हो, उसने रांची के ही एक संस्थान का नाम लिया। उसने बताया कि पत्रकार बनना चाह रहा हूं, इसके लिए कोर्स कर रहा हूं। दो साल में डिग्री मिल जायेंगी। हर सेमेस्टर के आठ हजार रुपये लगते हैं, यानी चार सेमेस्टर के बत्तीस हजार और नामांकन तथा होस्टल आदि मिलाकर कुल खर्च एक लाख रुपये पड़ जा रहे हैं।

मैंने फिर उससे पूछा कि अच्छा तुम ये बताओ कि मुझे कवि बनना है, किस विश्वविद्यालय में कवि बनाया जाता है, जरा बताओ, मैं भी उसमें नाम लिखाकर डिग्री ले लूं और कवि बन जाऊं। वो आश्चर्यचकित होकर बोला कि भला कवि बनने के लिए डिग्री की जरुरत थोड़े ही होती है, तभी तपाक से हमने जवाब दिया तो जब कवि बनने के लिए डिग्री की जरुरत नहीं तो फिर पत्रकार बनने के लिए डिग्री क्यूं?

दरअसल ये सब पत्रकारिता के नाम पर दुकानदारी कर रहे हैं, किसी विश्वविद्यालय में या संस्थान में पत्रकार बनाने की ताकत नहीं हैं, क्योंकि जैसे नेता व कवि पैदा होते हैं, उसी प्रकार पत्रकार भी पैदा होते हैं, उन्हें कोई बना नहीं सकता, वो जन्मजात होते हैं, उनके कुछ ऐसे गुण विशेष होते हैं, जो उन्हें औरों से अलग करते हैं, वे विशेष हो जाते हैं और फिर वे खिल उठते हैं, कवि के रुप में, नेता के रुप में, पत्रकार के रुप में।

नहीं तो क्या होगा, ऐसे लोग करेंगे क्या? जब पैसे देकर डिग्रियां लेंगे, तो उसका फायदा भी उठायेंगे। ऐसे संस्थान ढुंढेंगे जहां माल भी मिले और इज्जत भी मिले। माल की गारंटी तो मिल जायेगी, पर इज्जत की गारंटी कौन देगा? तो फिर जहां ये काम करेंगे, वे बोलेंगे कि यार तुम पत्रकार बन गये, हमारे लिए कुछ काम करो, पैसे लाओ, विज्ञापन लाओ, तभी तुम टिक पाओगे, अन्यथा नहीं। लीजिये, यहीं से टिकने की कला के लिए आपके इज्जत का फलूदा बनाने का काम शुरु और फिर इसकी आड़ में आप कब नीचे गिरते चले गये, आपको पता ही नहीं चला।

आप क्या करेंगे? तो आपका स्टेंडर्ड बड़ा है, तो बड़ीवाली कलाकारी करेंगे, जैसे राज्य के मुख्यमंत्रियों/मंत्रियों पर दबाव डालेंगे कि वे उनके आका को कोई खनन का पट्टा दिलवा दें या कोई फायदे का उद्योग या संस्थान चल रहा हैं तो उसमें उनके लोगों को घुसायें या शेयर उपलब्ध करा दें, और कुछ नहीं तो राज्यसभा पहुंचा दें और अगर नीचे वाले टाइप के पत्रकार हैं तो आप राज्य या केन्द्र के भ्रष्ट अधिकारियों को ब्लैकमेलिंग करेंगे कि वे आपको अच्छी खासी राशि दें, वे भय के मारे, झूठी इज्जत न चली जाये, इसको बचाने के चक्कर में आपको भी देंगे और लूट जारी रखेंगे।

आप विभिन्न संस्थानों में पत्रकारिता की आड़ में वाहन चलवायेंगे या किसी नेता के घर सुबह-सुबह जायेंगे और कहेंगे कि थोड़ी सब्जी मंगवा दीजिये या राज्य सरकार पर दबाव डलवायेंगे या पैरवी करवायेंगे कि और कुछ नहीं तो सूचना आयुक्त ही बनवा दें या सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग से उनके अखबार, चैनल या पोर्टल को इतनी राशि दिलवा दें कि उसके कमीशन से ही उसका सात पुश्तों का इंतजाम हो जाये।

अब आप कहेंगे कि अगर पत्रकार ऐसा नहीं करेंगे तो वे भूखे मर जायेंगे, क्योंकि कोई अखबार/चैनल अथवा पोर्टल किसी पत्रकार को वेतन नहीं देता, अगर देता भी हैं तो गिने-चुने लोगों को, बात भी सही है, पर मैं कहता हूं कि जब वो कुछ नहीं देता, तो आप उसकी गुलामी क्यों कर रहे हैं, क्यों कहते है कि आप हमें बूम दे दें, आप हमें आईकार्ड दे दें, दरअसल आप इसी बूम और आईकार्ड से कैसे कमाया जाता है, उस कला में दक्ष हैं, नहीं तो ईमानदारी से किसान या मजदूर बनने में कौन सी इज्जत चली जा रही है।

क्या इज्जत से जूते की सिलाई या मरम्मत करना पाप है? क्या इज्जत के साथ दो पैसे नहीं कमाये जा सकते, जिसमें आपके सपने पूरे हो सकें। दरअसल ऐसा किया जा सकता है। ऐसे कई कारोबार है, जिसमें थोड़े श्रम और कुछ पैसों से अपने और अपने परिवार के लिए बेहतर कमाया जा सकता है, पर चूंकि आपने देख रखा है कि कैसे पत्रकारिता कर एक पत्रकार ने देखते ही देखते करोड़ों की बिल्डिंग खड़ी कर ली, क्योंकि आपने देखा है कि कैसे एक पत्रकार सलाहकार बनकर सात पूश्तों की तैयारी कर ली, पर आपने ये देखने की कोशिश ही नहीं की, कि जिन्होंने इस प्रकार के धन इकट्ठे किये, वही धन उनके लिए काल भी बन गया, और वहीं उनके संपूर्ण नाश का कारण भी बन गया।

इसीलिए मैं तो आज भी कहूंगा कि बनना हैं तो पराड़कर बनिये, बनना है तो गणेश शंकर विद्यार्थी बनिये, बनना है तो महात्मा गांधी बनिये, बनना है तो बाबा साहेब अम्बेडकर बनिये, ये क्या चिरकूट बनकर स्वयं और स्वयं के परिवार और देश को धोखा दे रहे हैं। अभी भी वक्त हैं, खुद सुधरिये और आनेवाली पीढ़ी को भी सुधारिये, क्योंकि ये जिम्मा भी आपका है।

2 Comments
  1. Rajesh says

    समदुखड़ स्थिति..
    पत्रकार के नाम पर भौंडापन का खेल

  2. Rajesh says

    दुखद स्थिति..
    पत्रकार के नाम पर भौंडापन का खेल

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