यह लोकतंत्र की ताकत नहीं, बल्कि यह एक नक्सली एवं उनके परिवारों को मिला दिव्य ज्ञान हैं, क्या समझे?

जिसे आप लोकतंत्र की ताकत कह रहे हैं, वह दरअसल लोकतंत्र की ताकत नहीं, बल्कि इसके मजे व लाभ लेने के ऐहसास हो जाने का एक परिदृश्य भर हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। रांची से प्रकाशित एक अखबार ने आज मुख्य पृष्ठ पर एक समाचार को स्थान दिया है। समाचार है – यही है लोकतंत्र की ताकत, कभी चुनाव का बहिष्कार करनेवाले नक्सली कुंदन पाहन का पूरा परिवार वोट देने खड़ा था कतार में।

अखबार ने लिखा है कि नक्सली कुंदन पाहन की पत्नी ने पहली बार दिया वोट। कहा- विकास व शांति के लिए किया मताधिकार का प्रयोग। नक्सलियों की धमकी से नहीं डरे ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता। सुरक्षा बल के जवान 15 किलोमीटर पैदल चलकर पहुंचे बारीगड़ा गांव। कुंदन पाहन के पिता नारायण पाहन खुश थे।

कमाल है, एक नक्सली जिसने कितने परिवारों के घर से खुशियां छीन ली, उसका परिवार वोट देने क्या आ गया, अखबार को लगा कि जैसे क्रांति हो गई। हम बात तमाड़ की कर रहे हैं, जहां से नक्सली कुंदन पाहन चुनाव लड़ रहा हैं, जिस पर कभी पुलिस पन्द्रह लाख रुपये का इनाम रखी थी। जिसके दहशत के किस्से कभी यही अखबार छापा करता था।

सवाल उठता है कि एक नक्सली, एक अपराधी, एक दुर्दांत अत्याचारी, जिस पर कई अपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, जिसे अदालत ने अभी निर्दोष तक करार नहीं दिया, ये अलग बात है कि हमारे देश में आप कितना भी अत्याचार कर लें, कितना भी दुष्कर्म कर लें, कितनों का भी गला काट लें, जब तक अदालत दो वर्षों से ज्यादा का आपको सजा नहीं सुना देती, आप चुनाव बेरोक-टोक लड़ सकते हैं।

जिसका लाभ ये सारे लोग उठाते हैं, और इससे लोकतंत्र मजबूत न होकर, भरभराकर गिरने को हर चुनाव में तैयार रहता है, फिर भी अखबार व चैनल में काम करनेवाले लोग अपनी-अपनी सुविधानुसार इनका महिमामंडन करते है, जिससे इनका बिना हर्रे-फिटकरी के ही प्रचार-प्रसार भी हो जाता है, और कभी-कभी चुनाव में विजयी होकर आराम से जीवन-पर्यन्त ऐश करते हैं, क्योंकि अब हमारे देश में चरित्र व संस्कारी लोगों को महाबेवकूफ और मूर्ख माना जाता है और उन्हें ये स्थान नहीं दिया जाता, जो एक घटियास्तर के व्यक्ति को आजकल मिलता है।

आज के नक्सली और उनके परिवारों को ऐहसास हो गया है कि जिस पुलिस के भय से वे गांव छोड़कर भागते हैं, क्यों नहीं राजनीति में जाकर उन पुलिसों को अपनी सुरक्षा व आवभगत में नियुक्त कर लें, क्योंकि विधायक और सांसद बनने की देरी हैं, वो सारी चीजें प्राप्त हो जायेंगी जो जन्नत में पहुंचे लोगों को प्राप्त हो जाती है, यानी हुरो के संग मस्ती के रंग का भी आनन्द लीजिये।

झारखण्ड में कई नक्सली ऐसे है, जिन्होंने विधायक व सांसद बनकर इसका परमानन्द प्राप्त किया है, और कर रहे हैं, ऐसे में नक्सली कुंदन पाहन और उनके परिवार का यह हृदय परिवर्तन भले ही अखबार के लिए मुख्य पृष्ठ का समाचार है, पर इन्सानियत के समूहों में इसे पीत पत्रकारिता ही कहा जायेगा।

रही बात नक्सली भी दो प्रकार के होते हैं, एक जो सचमुच में नक्सली है, जिनका कोई सिद्धांत है, और दूसरे जो सुनियोजित तरीके अपनाकर राजनीति के रसगुल्ले का स्वाद लेने के लिए नक्सली बने हैं, ये जो राजनीति के रसगुल्ले वाले जो नक्सली है, वे दरअसल पहले राजनीतिज्ञों के लिए काम करते हैं, जैसे उनके लिए चुनाव में दहशत फैलाने का काम कर, वोट उन्हें दिलवाने का काम।

लेकिन जैसे ही उन्हें इस बात का ऐहसास हो जाता है कि उनके भय से जब ये राजनीतिज्ञ परमआनन्द प्राप्त कर रहे हैं, और ये भ्रष्ट आइएएस/आइपीएस उन्हें तीस से चालीस प्रतिशत राशि हर योजनाओं की पहुंचाते हैं, तो क्या जरुरत हैं लेवी वसूलने की, सीधे नेता ही क्यों न बन जाये, जहां लेवी को कमीशन का नाम दिया जाता हो, इससे फायदे भी हैं, जैसे कोई बोलनेवाला नहीं और रंगदारी भी ईमानदारी के साथ प्राप्त हो जाये।

अखबार ने लिखा है कि नक्सली इलाके में नक्सलियों को धत्ता बताकर लोगों ने मतदान किया, तो क्या अखबार बता सकता है कि ये नक्सली, चंबल के डकैतों की तरह किस इलाके में पाये जाते हैं, या उनका गिरोह किस इलाके में रहता है, अरे भाई इतना बेवकूफ किसे समझ रहे हो, और किसे समझाने की कोशिश कर रहे हो, अच्छा रहता कि ऐसे न्यूज को अखबार के किसी पन्ने पर सिमटा देते और ऐसा न्यूज मुख पृष्ठ पर देते, जो समाज व देश के लिए अनुकरणीय होता, आपने तो नक्सली और नक्सलवाद को ही महिमामंडित कर दिया।