अपनी बात

खुलासा: झारखंड भाजपा का सबसे बड़ा “सूत्र” कौन है रे भाई?

लोकतंत्र में विपक्ष का मज़बूत होना जितना ज़रूरी है, उतना ही किसी राजनीतिक दल का भीतर से मज़बूत होना भी। लेकिन जब संगठन का सबसे बड़ा रिसाव ही उसके शीर्ष से होने लगे, तब विरोधियों को मेहनत नहीं करनी पड़ती, घर का भेदी ही काफ़ी होता है। झारखंड भाजपा में इन दिनों “सूत्र” खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ती। पत्रकारों की पुरानी परंपरा अब अप्रासंगिक होती जा रही है। क्योंकि सबसे बड़ा “सूत्र” अगर कोई बताया जा रहा है, तो वह स्वयं प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू हैं। पार्टी में तंज़ है कि अध्यक्ष जी के पेट में कोई बात उतनी देर नहीं ठहरती, जितनी देर में मोबाइल की बैटरी एक प्रतिशत गिरती है।

संगठनात्मक बैठक हो, रणनीतिक चर्चा हो, दिल्ली भेजी जाने वाली सूची हो या पदाधिकारियों के नाम—सब कुछ पहले ही चुनिंदा लोगों तक पहुँच जाता है। ऐसा लगता है कि गोपनीय फ़ाइलों पर अब “सीक्रेट” नहीं, “फ़ॉरवर्डेड मेनी टाइम्स” लिखा जाना चाहिए। कहते हैं कि कई लोगों को पहले ही बता दिया जाता है कि उन्हें कौन-सा पद मिलने वाला है। दिल्ली भेजी जाने वाली सूची तक दिखाई जाती है। फिर मुस्कुरा कर एहसान भी जता दिया जाता है—“देखिए, यह पद आपकी योग्यता से कम, हमारी कृपा से ज़्यादा मिला है।”

जिस संगठन में योग्यता की जगह कृपा का बाज़ार सजने लगे, वहाँ कार्यकर्ता नहीं, दरबारी पैदा होते हैं। एक किस्सा तो आजकल राजनीतिक गलियारों में चाय से ज़्यादा गर्म है। बताते हैं कि अध्यक्ष जी आराम से दाढ़ी बनवा रहे थे कि तभी एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष का फ़ोन आ गया। फ़ोन स्पीकर पर डाल दिया गया। उधर से लगातार—“भाई साहब… भाई साहब…” और इधर अध्यक्ष जी की मुस्कान, आसपास बैठे लोगों की ओर अर्थपूर्ण नज़रें। मानो यह संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का सीधा प्रसारण हो। संदेश यही कि—“देख लो, जो कभी बराबरी की कुर्सी का दावेदार था, आज भाई साहब कहकर विनती कर रहा है।”

नेतृत्व का कद सामने वाले को छोटा दिखाने से नहीं बढ़ता। बड़े लोग दूसरों का सम्मान बचाकर बड़े बनते हैं, उनका उपहास उड़ाकर नहीं। कहते हैं, इस घटना के बाद कई वरिष्ठ नेताओं ने मोबाइल पर खुलकर बात करना ही कम कर दिया। उन्हें डर सताने लगा कि कहीं अगली रणनीतिक बातचीत भी किसी महफ़िल का मनोरंजन न बन जाए। जब अपने ही अपने फ़ोन से डरने लगें, तो समझ लीजिए विश्वास का दिवाला निकल चुका है।

हल्कापन यहीं नहीं रुका। राष्ट्रीय अध्यक्ष के झारखंड दौरे में उनके ठहरने वाले होटल की जानकारी और रीलें पहले ही बाहर घूमने लगीं। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली को अंतिम समय में पूरा कार्यक्रम बदलना पड़ा। लेकिन परंपरा वही रही—रिसाव कहीं से भी हो, इल्ज़ाम किसी और पर लगा दो। संगठन में जवाबदेही नहीं, बलि का बकरा खोजने की संस्कृति विकसित हो गई।

अब प्रश्न यह है कि यदि हर गोपनीय जानकारी पहले ही सार्वजनिक होनी है, तो फिर बंद कमरे की बैठकों का औचित्य क्या है? सीधे प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर दीजिए। रणनीति मंच से पढ़ दीजिए। सूची सोशल मीडिया पर डाल दीजिए। कम से कम गोपनीयता का ढोंग तो समाप्त होगा। याद रखिए, दीवारों में दरार बाहर से नहीं पड़ती; पहले नींव भीतर से खोखली होती है।

संगठन विरोधियों से कम, अपनों की लापरवाही से ज़्यादा हारते हैं। नेतृत्व की असली परीक्षा भाषण देने में नहीं, विश्वास निभाने में होती है। जिस दिन अध्यक्ष स्वयं “सूत्र” बन जाए, उस दिन संगठन केवल कार्यालय रह जाता है, परिवार नहीं। कबीर ने कहा था— (और इस कथन को कभी भाजपा के ही शीर्षस्थ नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था, जब उन्होंने मात्र 13 दिनों की सरकार चलाने के क्रम में संसद में सरकार का उत्तर दे रहे थे…)

“निंदक नियरे राखिए, आँगन कुटी छवाय।

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय।।”

यदि इस व्यंग्य में कही गई बातें असत्य हैं तो इन्हें हँसकर टाल दीजिए और यदि इनमें कहीं भी सत्य का अंश है, तो क्रोधित होने के बजाय आत्ममंथन कीजिए। क्योंकि क्रोध सत्य का उत्तर नहीं होता, आत्मचिंतन होता है। अब देखना यह है कि अध्यक्ष जी अपने “सूत्रधार” वाले चरित्र से विराम लेते हैं या अगली गोपनीय सूची भी पहले की तरह जनता के दर्शन के लिए समय से पहले उपलब्ध करा दी जाएगी।

अंत में बस एक बात—

नेता वह नहीं होता जिसके पास सबसे अधिक ख़बरें हों; नेता वह होता है जिसके पास सबसे अधिक विश्वास सुरक्षित हो। सूचना लीक करने वाला कुछ देर तक शक्तिशाली दिख सकता है, लेकिन विश्वास खोने वाला बहुत देर तक नेता नहीं रह सकता। इस बात को जितना जल्दी हो, लोग समझ लें, वो भाजपा के शीर्षस्थ नेताओं के राजनीतिक सेहत के लिए अच्छा है।

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