अपनी बात

राज्यसभा का कॉरपोरेट समाजवाद और झारखंड की भोली राजनीति मतलब अथ नाथवाणी कथा: मिट्टी, मीडिया और मैनेजमेंट अर्थात् झारखण्ड दोहन, आंध्र विश्राम और यूपी में परिवार विस्तार

झारखंड की राजनीति में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो चुनाव नहीं लड़ते, लेकिन चुनावी गणित को ऐसे साधते हैं कि बड़े-बड़े दल भी उनके सामने कॉपी-पेंसिल लेकर बैठ जाते हैं। ऐसे ही एक बड़ा नाम हैं अमाननीय परिमल धीरजलाल नाथवाणी जी। नाथवाणी झारखंड ही नहीं, देश-दुनिया में चर्चित नाम हैं। कॉरपोरेट दुनिया से निकले,  रिलायंस इंडस्ट्रीज से जुड़े, सत्ता के गलियारों के अनुभवी खिलाड़ी और राज्यसभा के ऐसे यात्री, जिन्हें मंज़िल से ज़्यादा रास्ते का गणित मालूम है।

साल 2008 में वे पहली बार झारखंड से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंचे। तब झारखंड की मिट्टी, झारखंड का विकास, आदिवासियों का उत्थान, गांवों की चिंता, राज्य की संभावनाएं और “कर्मभूमि” जैसे शब्दों की ऐसी गंगा बही कि लगा मानो झारखंड को कोई नया मसीहा मिल गया हो। 2014 में वे फिर झारखंड से राज्यसभा पहुंचे। यानी दो-दो बार झारखंड की धरती ने उन्हें राज्यसभा भेजा।

उस दौर में झारखंड के कई बड़े अख़बारों ने भी उनके सम्मान में ऐसे कसीदे पढ़े कि पढ़ने वालों को लगा कि राजा राममोहन राय की आत्मा शायद आधुनिक रूप लेकर झारखंड में अवतरित हो गई है। और सबसे रोचक भूमिका उस अख़बार की रही जो खुद को “अख़बार नहीं, आंदोलन” कहता है। शुरू में वही उस वक्त के तत्कालीन प्रधान संपादक व आज के राज्यसभा के उप-सभापति हरिवंश के नेतृत्व से सबसे बड़ा विरोधी बना। नाथवाणी की उम्मीदवारी पर खूब नैतिकता, जनभावना और बाहरी-भीतरी की बहस छेड़ी गई। लेकिन राजनीति और पत्रकारिता दोनों में “लाइन” कभी-कभी संपादकीय नीति से नहीं, परिस्थिति से बदलती है।

फिर जैसे ही गोटी सेट हुई, वही “अख़बार नहीं आंदोलन” अचानक आंदोलन से भजन-मंडली में बदल गया। गाने लगा – ‘परिमल हरे, नथवाणी हरे, ये सब की नैया पार करे’। विरोध की स्याही सूखी भी नहीं थी कि प्रशंसा के फूल छपने लगे। कल तक सवाल थे, आज स्तुति थी। कल तक बाहरी थे, आज विकास पुरुष थे। कल तक संदेह था, आज सम्मान था। यही झारखंड की सार्वजनिक नैतिकता का सबसे मनोरंजक अध्याय है।

नाथवाणी का झारखंड में बाकायदा कार्यालय भी खुला। कुछ चुनिंदा लोगों को उनसे “मदद” भी मिली। कुछ सामाजिक लोग, कुछ पत्रकार, कुछ प्रभावशाली चेहरे, कुछ जरूरतमंद और कुछ जरूरत से ज़्यादा सक्रिय लोग उनके आसपास दिखे। राजनीति में मदद भी बड़ी अद्भुत चीज़ है। जिसे मिल जाए, वह सेवा कहता है। जिसे न मिले, वह सेटिंग कहता है।

फिर 2020 आया। झारखंड का नंबर-जुगाड़ गणित अनुकूल नहीं रहा। सीट का हिसाब गड़बड़ था। तब झारखंड की मिट्टी, विकास, प्रेम, लगाव और कर्मभूमि सबको प्रणाम कर नाथवाणी दक्षिण भारत की ओर प्रस्थान कर गए। वे आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में राज्यसभा पहुंच गए। मतलब झारखंड कर्मभूमि था, लेकिन राज्यसभा की सीट जहां मिले, वही तत्कालीन धर्मभूमि बन गई।

झारखंड भी धीरे-धीरे उन्हें भूल गया। जनता के पास वैसे भी रोज़गार, सड़क, पानी, बिजली, पेपर लीक, भ्रष्टाचार और अफसरशाही जैसी असली समस्याएं थीं। नाथवाणी जी भी शायद झारखंड को स्मृति में रखकर आगे बढ़ गए। राजनीति में स्मृति भी बड़ी सुविधाजनक चीज़ है। चुनाव के समय लौट आती है, चुनाव के बाद विश्राम पर चली जाती है।

फिर 2026 में अचानक नाथवाणी की झारखंड वापसी हुई। इस बार वे एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे और जून 2026 में झारखंड से फिर राज्यसभा पहुंच गए। उन्हें 28 वोट मिले, कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा को 20 वोट मिले और दूसरी सीट झारखण्ड मुक्ति मोर्चा के बैद्यनाथ राम ने जीती।

अब लोगों को लगा कि फिर वही पुराना दौर लौटेगा। फिर कार्यालय खुलेगा। फिर लोगों की लाइन लगेगी। फिर सहायता, संपर्क, संवाद और विकास की बातें होंगी। पर इस बार माहौल बदला-बदला दिख रहा है। चुनाव जीतने के बाद नाथवाणी जैसे राजनीतिक समाधि में चले गए। न वैसी हलचल, न वैसी सक्रियता, न वैसी उपस्थिति। अगर झारखंड आए भी होंगे तो जनता को कम-से-कम दिखे तो नहीं।

अब सवाल उठता है कि क्या इस बार वोट देने वाले विधायकों ने उनका ऐसा राजनीतिक कचूमर निकाला कि झारखंड लौटने का उत्साह ही ठंडा पड़ गया? या फिर इस बार झारखंड सिर्फ़ राज्यसभा टिकट का प्लेटफॉर्म था, जहाँ से गाड़ी पकड़नी थी और आगे निकल जाना था?

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अब नाथवाणी परिवार की अगली पीढ़ी भी राज्यसभा की दहलीज़ पर है। उनके पुत्र धनराज परिमल नाथवाणी को समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया है। यानी पिता झारखंड से एनडीए समर्थित निर्दलीय, पुत्र उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी। विचारधारा बेचारे कार्यकर्ताओं के लिए होती है, बड़े लोगों के लिए राज्यसभा सर्वदलीय सुविधा केंद्र है।

वाह री लोकतंत्र!

पिता इधर से, पुत्र उधर से।

समर्थन एनडीए का, टिकट समाजवादी पार्टी का।

नारा जनसेवा का, रास्ता सत्ता-संपर्क का।

भावना जनता की, लाभ परिवार का।

कहने को तो समाजवादी पार्टी गरीब, पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक और संघर्ष की बात करती है, लेकिन राज्यसभा की टिकट में रिलांयस से जुड़े बड़े कॉरपोरेट चेहरे को जगह देती है। फिर सवाल उठता है कि यह समाजवाद है या सुविधा-वाद? यह पीडीए है या पावर, डील और अरेंजमेंट? झारखंड को भी सोचना चाहिए कि जिन लोगों ने यहाँ की मिट्टी पर प्रेम के गीत गाए, वे अवसर मिलते ही आंध्र प्रदेश चले गए और गणित अनुकूल होते ही फिर झारखंड लौट आए। यह प्रेम है या राजनीतिक रिटर्न टिकट?

झारखंड के अपने कितने कार्यकर्ता हैं, कितने बुद्धिजीवी हैं, कितने सामाजिक लोग हैं, कितने संघर्षशील चेहरे हैं, जो जीवन भर ज़मीन पर काम करते रह जाते हैं। लेकिन राज्यसभा की बारी आती है तो टिकट और समर्थन उन्हीं को मिलता है जिनके पास संपर्क, संसाधन और सत्ता के दरवाज़े खोलने की चाबी होती है।

और इसमें मीडिया की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। जो “अख़बार नहीं आंदोलन” होने का दावा करते हैं, वे भी समय देखकर आंदोलन से अभिनंदन में बदल जाते हैं। कल विरोध, आज स्वागत। कल सवाल, आज विशेषांक। कल नैतिकता, आज महिमामंडन। यही है झारखंड का बौद्धिक बाज़ार, जहाँ विचार भी अवसर देखकर दिशा बदलते हैं। नाथवाणी का सफर देखिए:

2008: झारखंड से राज्यसभा।

2014: फिर झारखंड से राज्यसभा।

2020: आंध्र प्रदेश से राज्यसभा।

2026: फिर झारखंड से राज्यसभा।

अब पुत्र धनराज परिमल नाथवाणी उत्तर प्रदेश से समाजवादी पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवार। इसे राजनीति कहिए, प्रबंधन कहिए, नेटवर्क कहिए या राज्यसभा विज्ञान, लेकिन यह कला हर किसी के बस की बात नहीं। आम कार्यकर्ता पोस्टर चिपकाता रह जाता है, नारे लगाता रह जाता है, लाठी खाता रह जाता है। और बड़े लोग सीधा राज्यसभा पहुंच जाते हैं।

झारखंड की जनता को अब भावनाओं के इन पैकेजों से सावधान रहना होगा। “कर्मभूमि”, “मिट्टी”, “विकास”, “सेवा”, “समर्पण” जैसे शब्द सुनते ही तालियाँ बजाने से पहले पूछना चाहिए कि चुनाव जीतने के बाद आपकी उपस्थिति कहाँ है? आपका कार्यालय कहाँ है? आपकी जवाबदेही कहाँ है? जिन लोगों ने वोट दिलाया, वे अलग बात हैं, लेकिन जिनके नाम पर सेवा का भाषण दिया गया, वे लोग कहाँ हैं?

कुछ लोग कहते है, कुछ लोग मानते है कि नाथवाणी बड़ा आदमी है, पर मैं नहीं मानता। मैं तो उसे ही बड़ा मानता हूं, जिसमें नैतिकता, चरित्र व संस्कार होता है, हर गुजराती गांधी या पटेल ही होगा, ऐसा मैंने कभी नहीं देखा। उसकी पहुंच बड़ी हो सकती है, अनुभव बड़ा हो सकता है, संपर्क बड़ा हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि झारखंड के हिस्से में उसकी बड़ी-बड़ी बातों के अलावा आया क्या?

झारखंड को राज्यसभा में प्रतिनिधि चाहिए या राजनीतिक यात्री?

जनता को सेवक चाहिए या संख्या-गणित का खिलाड़ी?

राज्य को आवाज़ चाहिए या मौक़े के हिसाब से बदलती हुई कर्मभूमि?

याद रखो राजनीतिक यात्रियों, संख्या गणित के खिलाड़ियों, अब झारखंड इतना भी भोला नहीं रहा कि हर बार “मिट्टी से प्रेम” सुनकर भावुक हो जाए। प्रेम अगर सच्चा है तो चुनाव के बाद भी दिखना चाहिए। वरना यह प्रेम नहीं, राज्यसभा जाने का भावनात्मक पासपोर्ट भर है और यह पासपोर्ट कब जनता जब्त कर लें या ईश्वर की उस पर कुदृष्टि पड़ जाये, तुम्हें पता ही नहीं।

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