अथ भाजपा संगठन मंत्री करमवीर कथाः तबादला छत्तीसगढ़ और डेरा झारखण्ड में और यहीं पार्टी के झारखण्ड में डूबने की सबसे बड़ी बीमारी
यूँ तो जिसका तबादला हो जाता है, उसके बारे में लिखना मुझे अटपटा लगता है। आम तौर पर मैं ऐसी चीज़ों से परहेज़ करता हूँ। लेकिन झारखंड भाजपा की जो दुर्गति हुई, उसके पीछे की बीमारी समझनी हो तो स्थानांतरित संगठन महामंत्री करमवीर सिंह प्रकरण को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इस आदमी को कल यानी बुधवार को रायपुर में होना चाहिए था, पर ये व्यक्ति रायपुर में न होकर रांची में बैठा था, आखिर क्यों, सवाल तो बनता है?
24 सितंबर 2026 को भाजपा की केंद्रीय नियुक्ति में पवन साय को झारखंड का प्रदेश महामंत्री संगठन बनाया गया और करमवीर सिंह को छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी दी गई। यानी आदेश साफ था, दिशा साफ थी और गंतव्य भी साफ था। संघ की परंपरा में तो पूर्णकालिक कार्यकर्ता आदेश मिलते ही दो-चार कपड़ों का झोला उठाकर नई जगह के लिए निकल पड़ता है। लेकिन झारखंड में गंगा उल्टी बहती दिख रही है।
तबादला छत्तीसगढ़ का, लेकिन मोह रांची से। जिम्मेदारी रायपुर की, लेकिन सक्रियता झारखंड में। यह संगठन धर्म है या पुराने रिश्तों, पुराने एहसानों और पुराने समीकरणों की फाइल नए प्रभारी तक पहुंचाने की बेचैनी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्ष पूरे होने पर जब देश भर में सेवा और संकल्प के कार्यक्रम चल रहे थे, भाजपा के नेता अपने-अपने क्षेत्रों में सक्रिय थे, तब झारखंड में चर्चा यह थी कि करमवीर भाई साहब रांची में किसी और ही “सेवा अभियान” में व्यस्त हैं।
भाजपा के भीतर के लोग ही दबे स्वर में कह रहे हैं कि भाई साहब यहां इसलिए टिके हैं कि जिन लोगों से वर्षों में “अगाध प्रेम” रहा, जिनसे निकटता रही, जिनसे उपकृत होने और कराने का सिलसिला चला, उन सबका परिचय नए संगठन महामंत्री पवन साय से करा दिया जाए। जिन लोगों को वादा करके भी पद नहीं दिला पाए, उन्हें भी नए दरबार में दाखिल करा दिया जाए, ताकि पुराने हिसाब-किताब नए खाते में ट्रांसफर हो जाएं।
यही वह शैली है जिसने झारखंड भाजपा को जनांदोलन की पार्टी से दरबारी मंडली में बदल दिया। कार्यकर्ता हाशिये पर गया, चहेते केंद्र में आ गए। संघर्ष करने वाले इंतजार करते रहे, परिचय-पत्र वाले आगे बढ़ते रहे। जमीन पर पसीना बहाने वाले कार्यकर्ता पोस्टर चिपकाते रहे और बंद कमरों में यह तय होता रहा कि कौन किसका आदमी है।
झारखंड भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान विपक्ष ने नहीं, भीतर बैठे उन लोगों ने पहुंचाया है जिन्होंने संगठन को कार्यकर्ताओं का घर नहीं, अपने चहेतों का प्रतीक्षालय बना दिया। जिसने चरण छुए, वह आगे। जिसने सच बोला, वह किनारे। जिसने मेहनत की, उसे उपदेश मिला। जिसने समीकरण साधे, उसे सम्मान मिला।
सोशल मीडिया पर लंबे समय से करमवीर सिंह के कामकाज को लेकर सवाल उठते रहे हैं। लोग व्यंग्य में उन्हें करमवीर नहीं, “कर्महीन” तक कहने लगे थे। यह शब्द भले कठोर हो, लेकिन झारखंड भाजपा की अव्यवस्था देखने के बाद बहुतों को यह व्यंग्य सच्चाई के करीब लगता है।
अब असली परीक्षा पवन साय जी की है। वे झारखंड में नया पन्ना खोलते हैं या पुराने नोटबुक पर ही नई जिल्द चढ़ाते हैं? वे पुराने चहेतों, उपकृतों और दरबारी घेरे से बाहर निकलकर संगठन को कार्यकर्ताओं के हाथ में लौटाते हैं या वही पुराना नक्शा, वही पुराना रास्ता और वही पुराना परिणाम दोहराया जाएगा? पवन साय जी को समझना होगा कि जो लोग कल तक करमवीर के सबसे करीबी थे, वे आज आपके भी सबसे पहले शुभचिंतक बनकर सामने आएंगे। यही दरबारी राजनीति का पहला नियम है। चेहरा बदलता है, चापलूसी नहीं।

अगर झारखंड भाजपा को सचमुच खड़ा करना है तो पुराने “सिफारिशी नक्शे” को फाड़ना होगा। करमवीर युग के चहेतों, दरबारियों और लाभार्थियों से दूरी बनानी होगी। कार्यकर्ताओं से सीधा संवाद करना होगा। जिनकी पहचान सिर्फ फोटो, चरण-स्पर्श और बंद कमरे की बैठक है, उनसे सावधान रहना होगा।
क्योंकि संगठन महामंत्री का काम मंडली बचाना नहीं, संगठन बनाना होता है। कार्यकर्ताओं को जोड़ना होता है, चहेतों की विरासत ढोना नहीं। भाजपा को जिंदा करना है तो पुराने कृपापात्रों की ऑक्सीजन बंद करनी होगी। झारखंड भाजपा को अब यह तय करना होगा कि उसे संघर्ष करने वाले कार्यकर्ता चाहिए या हर दौर में रंग बदलने वाले परिचयजीवी। अगर वही पुराने चेहरे, वही पुराने समीकरण और वही पुराना दरबार जारी रहा, तो नाम बदलेगा, परिणाम नहीं।
और अंत में करमवीर जी के लिए भी एक विनम्र नसीहत: तबादला सिर्फ कागज पर नहीं, मन से भी स्वीकार करना पड़ता है। छत्तीसगढ़ आपका इंतजार कर रहा है। झारखंड को अब थोड़ा सांस लेने दीजिए। वरना आगे भी यही कहा जाएगा कि झारखंड भाजपा चुनाव विपक्ष से नहीं, अपने ही दरबारियों से हारती रही है।
