जेपीएससी के कैलेंडर ने ही खोल दी अजीत अंजुम की ‘तथ्य-जांच’ — बाबूलाल मरांडी ने उनकी मूर्खता पर पूछा, आरोप लगाने से पहले तारीखें तो देख लेते!
पत्रकारिता में सवाल पूछना लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन सवाल पूछने से पहले तथ्यों की तारीख देख लेना पत्रकारिता की पहली पाठशाला है। वरना कभी-कभी खोजी पत्रकारिता का दावा करते-करते खुद ही तथ्यों की परीक्षा में बैठना पड़ जाता है। अजीत अंजुम के सोशल मीडिया पोस्ट में बाबूलाल मरांडी के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान जेपीएससी की कथित गड़बड़ियों और उनके परिवार से जुड़े एक चयन को लेकर सवाल उठाए गए। जवाब में बाबूलाल मरांडी ने जो तारीखें सामने रखीं, उन्होंने पूरे आरोप की बुनियाद पर ही सवाल खड़ा कर दिया।

मरांडी के अनुसार वे मार्च 2003 तक ही झारखंड के मुख्यमंत्री थे, जबकि पहली जेपीएससी पीटी परीक्षा अगस्त 2003 में हुई। पहली परीक्षा रद्द होने के बाद दोबारा परीक्षा जनवरी 2004 में आयोजित हुई। अब सवाल सीधा है— जिस परीक्षा का आयोजन ही मुख्यमंत्री पद छोड़ने के महीनों बाद हुआ, उस परीक्षा की गड़बड़ी का राजनीतिक ठीकरा उसी मुख्यमंत्री के सिर कैसे फोड़ा जा सकता है?
यही वह जगह है जहाँ लगता है कि आरोपों की रफ्तार तो बहुत तेज थी, लेकिन तथ्यों की गाड़ी रास्ते में ही पंचर हो गई! और जिस पारिवारिक सदस्य के चयन को बार-बार राजनीतिक सवाल बनाया जा रहा है, उस पर भी मरांडी ने कहा कि चयन के समय वह व्यक्ति विवाह के कारण उनके परिवार का हिस्सा तक नहीं बने थे। उन्होंने संबंधित परिवार की शैक्षणिक और प्रशासनिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया।
यानी कहानी बनाने से पहले कहानी का टाइमलाइन देखना जरूरी था। मरांडी ने तो इससे भी आगे बढ़कर खुली चुनौती दे दी—झारखंड गठन से लेकर अब तक हुई सरकारी नियुक्तियों की व्यापक, निष्पक्ष और समयबद्ध जांच करा लीजिए। यदि उनके परिवार के किसी सदस्य की संलिप्तता सामने आती है, तो कार्रवाई की शुरुआत उन्हीं से की जाए। अब इससे बड़ी पारदर्शिता की चुनौती और क्या होगी?
सीबीआई जांच पर भी मरांडी ने अंजुम के सवालों को पलटते हुए कहा कि यदि सरकार को वास्तव में किसी जांच से डर नहीं है, तो मामला सीधे सीबीआई को सौंप दिया जाए। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। रिटायर्ड जज की अध्यक्षता में जांच की बात पर भी उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सरकार गंभीर है तो हाईकोर्ट के किसी वर्तमान न्यायाधीश की अध्यक्षता में समयबद्ध जांच आयोग बनाया जा सकता है।
और अब असली व्यंग्य सुनिए—
अंजुम जी ने जेपीएससी पर सवाल उठाया, लेकिन जेपीएससी की परीक्षा से पहले की तारीखें ही नहीं पढ़ीं। आरोप लगाया गया कि परीक्षा में गड़बड़ी हुई। लेकिन कैलेंडर ने पूछा—“उस समय आप मुख्यमंत्री थे भी या नहीं?” पत्रकारिता में ‘फैक्ट-चेक’ का दावा करना आसान है, लेकिन कभी-कभी एक साधारण कैलेंडर ही सबसे बड़ा फैक्ट-चेकर बन जाता है।
आरोपों की कॉपी मोटी थी, भाषा धारदार थी, सवाल बड़े-बड़े थे… बस तारीखों ने आकर पूरी पटकथा की स्क्रिप्ट ही बदल दी। इसे कहते हैं— “खोजी पत्रकारिता की उड़ान बहुत ऊँची थी, लेकिन टेकऑफ से पहले ही कैलेंडर से टकरा गई!” अब गेंद अजीत अंजुम के पाले में है।
क्या वे इन तारीखों और तथ्यों का जवाब देंगे? या फिर इस असुविधाजनक सवाल को भी किसी नई बहस, नए आरोप और नए शोर में दबा दिया जाएगा? क्योंकि सवाल सिर्फ जेपीएससी का नहीं है। सवाल यह है कि सार्वजनिक जीवन में किसी पर गंभीर आरोप लगाने से पहले क्या कम-से-कम तारीख, तथ्य और घटनाक्रम की बुनियादी जांच जरूरी नहीं है?
वरना कल को कोई इतिहास लिखेगा— “आरोप बहुत बड़े थे… मगर सबूत के तौर पर पेश किया गया कैलेंडर ही आरोपों का गवाह बनने से मुकर गया!” और बाबूलाल मरांडी का संदेश साफ है—
जांच कराइए। पूरी कराइए। निष्पक्ष कराइए। लेकिन आधे-अधूरे तथ्यों पर राजनीति नहीं—तथ्यों के आधार पर फैसला कीजिए। क्योंकि सच को नारे की जरूरत नहीं होती, तारीखें ही काफी होती हैं।
