अपनी बात

हेमन्त कैबिनेट के उचित फैसलों के बावजूद छात्रों के जिच से आंदोलन में भटकाव, जनता छात्रों के इस आंदोलन से अब बनाने लगी दूरी

आपका आंदोलन परीक्षा में सुधार को लेकर था। आपका आंदोलन पूर्व में परीक्षा में हुई गड़बड़ियों को देखते हुए सारी परीक्षाओं को रद्द करने को लेकर था। आप परीक्षा में गड़बड़ी करनेवालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई चाहते थे। ये बातें सभी को अच्छी भी लगती थी। जिसके कारण आपको जनसहयोग भी मिला। इन मांगों और आपको मिल रहे जनसहयोग को देखते हुए आपकी सारी बातें हेमन्त सरकार ने मान भी ली। जिससे लोगों को लगा कि अब आपका आंदोलन खत्म हो जायेगा। लेकिन फिर भी आप आंदोलनरत है।

ये कहना है एक आम जनता का, जो इन आंदोलनकारियों के आंदोलन में शरीक थी। इन्हें समर्थन कर रही थी। अब इन्हीं आम जनता का कहना है कि चूंकि सरकार ने करीब-करीब सारी इनकी बात मान ली है। इसलिए अब इन्हें आंदोलन समाप्त कर, आगे की परीक्षाओं की तैयारी करनी चाहिए। अगर ये छात्र हैं तो ये आंदोलन समाप्त कर, अपनी पढ़ाई में लगेंगे। लेकिन अगर ये अब राजनीतिक दलों के चक्कर में आकर राजनीति करेंगे तो अब हमलोगों इनसे दूरियां बनायेंगे, जिसकी शुरुआत आज से हो गई।

इधर आंदोलन में शामिल आंदोलनकारियों का कहना है कि चूंकि इस गड़बड़ी में सफेदपोश लोग भी शामिल है, सीआईडी जांच में इनलोगों को बचाया जा सकता है, इसलिए जब तक सीबीआई जांच की सरकार घोषणा नहीं करती। आंदोलनरत रहेंगे। आम जनता का कहना है कि यह उनका सिर्फ संदेह है और इसके अलावा कुछ नहीं। केवल संदेह के आधार पर आंदोलन को बढ़ाना, आम जनता को मुश्किल में डालना तथा विकास कार्यों को प्रभावित करना ठीक नहीं, क्योंकि सरकार केवल आंदोलन को देखने के लिए नहीं बनाई गई। उसके और भी कुछ काम है।

रविवार को जिस प्रकार से हेमन्त सरकार ने छात्रों के आंदोलन को लेकर जिस प्रकार से अपनी भूमिका में बदलाव की। उससे झारखण्ड की जनता को लगा था कि कल यानी सोमवार को इनका आंदोलन समाप्त हो जायेगा। लेकिन हेमन्त सरकार द्वारा ली गई उचित फैसलों के बावजूद इनके आंदोलन का समाप्त न होना, उसे आगे बढ़ाना, साफ बताता है कि इनका आंदोलन अब छात्र आंदोलन न होकर, एक राजनीतिक आंदोलन बनता जा रहा है।

ये किसी राजनीतिक दल से ओत-प्रोत होकर अपने आंदोलन को विपरीत दिशा में ले जा रहे हैं। जिसका प्रतिफल इनके सापेक्ष में ही होगा, इसे शत प्रतिशत सही भी नहीं कहा जा सकता। क्योंकि हर आंदोलन का परिणाम सुखद ही रहा है। ऐसा कभी देखा नहीं गया। लेकिन इनका जो आंदोलन कल तक जो रहा। उसे सुखद ही कहा जायेगा। पर अब उसमें भटकाव साफ दिख रहा है।

इनकी सीबीआई जांच की मांग, बताता है कि ये राज्य में जेपीएससी व जेएसएससी का लाभ तो चाहते हैं। लेकिन राज्य की जांच एजेंसियों पर इनका विश्वास नहीं हैं। ये मान चुके हैं कि सीआईडी जांच में शामिल सारे अधिकारी बेईमान और चरित्रहीन हैं। ऐसे में, केवल इनके मान लेने से, राज्य की जांच एजेंसियां बेईमान और चरित्रहीन नहीं हो जाती। इन एजेंसियों में काम करनेवाले भी इनकी तरह मनुष्य हैं और इनको उन पर विश्वास करना ही होगा।

इनको मालूम होना चाहिए कि जब अर्जुन मुंडा का शासनकाल था तब 2005 में दूसरी जेपीएससी कंबाइंड सिविल सर्विसेज परीक्षा आयोजित की गई थी। जिसका परिणाम 2008 में आया था। जिसमें भारी गड़बड़ियां पाई गई थी। 2012 में झारखण्ड हाई कोर्ट ने सीबीआई को इसकी जांच का जिम्मा सौंपा। अदालतीय आदेश के बाद 2000 के बाद जेपीएससी द्वारा ली गई सभी 16 परीक्षाओं का जांच सीबीआई ने अपने पास ले लिया और 12 सालों के बाद 2024 में इसकी अंतिम चार्जशीट दाखिल की गई। जिसमें अध्यक्ष दिलीप कुमार प्रसाद, कई पदाधिकारी, कुछ छुटभैये नेता व 60 से अधिक लोगों को आरोपी बनाया गया। जिसका ट्रायल अभी चल रहा है। अभी तक इसके अदालती फैसले भी नहीं आये हैं।

मतलब साफ है कि 2008 का मामला 18 साल बीत जाने के बावजूद भी इसका फैसला अब तक नहीं आया है। सीबीआई की जांच कैसे चलती है और उसमें कितना समय लगता है। वो सभी के सामने हैं। अगर आज के मामले को भी सीबीआई को सौंप दी जाये। तो फिर इसका फैसला कब आयेगा। इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे भी सीबीआई में जाने के बाद सारे के सारे फैसले शत प्रतिशत हो ही जाते हैं। इसकी संभावना न के बराबर होती है। खुद केन्द्र सरकार का ही कहना है कि सीबीआई की जांच में सफलता 65 से 70 प्रतिशत तक रही है। लेकिन कहा जाता है कि देर से मिली न्याय भी अन्याय से कम नहीं हैं।

अच्छा रहता है कि ये राज्य सरकार पर दबाव डालते कि जो यहां की जांच एजेंसियां जो जांच कर रही है। उसको समयबद्ध तरीके से जांच कर अपनी रिपोर्ट सम्मिट करनी चाहिए और जो दोषी हैं, उन्हें एक समय-सीमा के अंदर न्यायालय द्वारा दोषी ठहराकर दंडित करना चाहिए। लेकिन, ये तो सीबीआई जांच पर अड़े हैं। ऐसे भी इनकी ओर से कुछ लोग न्यायालय का दरवाजा खटखटाये भी है। न्यायालय भी इस मामले को देख रही है। न्यायालय को लगेगा कि सीआईडी जांच सही दिशा में काम नहीं कर रही हैं। वो खुद ही सीबीआई जांच का आदेश दे देगी। इसमें इनको दिमाग लगाने की क्या जरुरत हैं? क्या सरकार के पास और काम नहीं है, केवल इनके ही आंदोलन पर सरकार ध्यान दें और इनकी उन मांगों को भी पूरा करें, जो न्यायोचित नहीं हैं।

ऐसे भी, सीआईडी व एसआईटी की जो जांच चल रही है। उसके दौरान अब तक पूर्व जेपीएससी अध्यक्ष एल. खिंयाग्ते की गिरफ्तारी, टीडीपीएल कंपनी को ब्लैक लिस्टेड किया जाना, जेपीएससी के पूर्व सदस्य बी एन राम की गिरफ्तारी, मुख्य आरोपी अभय तिवारी की गिरफ्तारी, हजारीबाग से सुमन सौरव की गिरफ्तारी बताने के लिए काफी है कि सीआईडी व एसआईटी अपनी ओर से विशेष प्रयास कर रही है। यही नहीं, सीआईडी की जांच से यह भी पता चला कि इस घोटाले में सिर्फ जेपीएससी ही नहीं, बल्कि कार्मिक, प्रशासनिक सुधार तथा राजभाषा विभाग, जिला प्रशासन और परीक्षा केन्द्र, आईटी और तकनीक सेल जैसे विभाग भी शामिल है।

ऐसे में केवल इनके द्वारा यह संदेह करना कि इस घोटाले में बड़े-बड़े राजनेता शामिल है, इसलिए सीबीआई जांच होनी चाहिए, तो भाई 2008 में जो जेपीएससी के परिणाम आये थे। उस वक्त भी सीबीआई जांच की मांग इसलिए ही की गई थी कि उसमें बड़े-बड़े राजनेता शामिल है। लेकिन जो सीबीआई द्वारा 2024 में अदालत में चार्जशीट दाखिल किये गये। उसमें कौन-कौन से राजनेताओं के नाम शामिल है? कौन-कौन से मंत्री या मुख्यमंत्री के नाम शामिल है? केवल संदेह के आधार पर राज्य सरकार को कटघरे में खड़े करना, किसी जांच एजेंसी पर संदेह खड़ा करना, आंदोलन का राजनीतिक रंग देना किसी भी प्रकार से सही नहीं।

सबसे बड़ी बात कि जब झारखण्ड हाई कोर्ट में सीबीआई जांच की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर कर ही दी गई है। तो फिर इतनी अफरातफरी क्यों? अदालत पर भरोसा रखिये। जब उसे लगेगा कि सीबीआई जांच होनी चाहिए, तो वो खुद फैसला दे देगी। राज्य सरकार ने तो साफ कह दिया कि इस घोटाले के मनी लॉन्ड्रिंग की जांच ईडी करेगी और आपराधिक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के गठन का भी प्रस्ताव दिया है। तो इसके बाद फिर बचता ही क्या है?

दूसरी ओर किसी राजनीतिक दल को लगता है कि ऐसा करने से हम हेमन्त सोरेन की सरकार को आम जनता की नजरों में गिरा देंगे। तो वे साफ मुगालते में हैं। आज भी आदिवासियों-अल्पसंख्यकों, पिछड़ों यहां तक की सवर्णों में भी हेमन्त सोरेन की अच्छी पैठ हो चुकी है। हेमन्त सोरेन को वर्तमान में राजनीतिक तौर पर नीचे गिराना, फिलहाल संभव नहीं। क्योंकि इनके कुछ काम ऐसे हैं, जो आज भी राज्य की जनता के बीच प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं। उन्हीं में से हैं एक मुख्यमंत्री मईयां सम्मान योजना, ओल्ड पेंशन स्कीम जैसी योजना, प्रवासी मजदूरों के लिए बनाई कल्याणकारी योजना। कोरोना काल में हेमन्त सोरेन द्वारा किये गये कार्य भी आज तक जनता भूली नहीं है। लोग भूले नहीं हैं कि भाजपा शासनकाल में संतोषी भात-भात चिल्लाते हुए भूख से दम तोड़ दी थी। लेकिन कोरोना काल जैसी भीषण आपदा में भी इस राज्य में कोई भूख से दम नहीं तोड़ा। ऐसे में कोई कितना भी बड़ा आंदोलन क्यों न खड़ा कर दें। हेमन्त सोरेन आज भी जनता की नजरों में विश्वसनीय बने हुए हैं।

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