अपनी बात

भाई साहब चले गए, लेकिन अपना रिमोट कंट्रोल और ‘लटकन’ भाजपा कार्यालय में छोड़ गए!

राजनीति में कुछ लोगों के लिए जिम्मेदारी बदलना सहज होता है, लेकिन नियंत्रण छोड़ना असहनीय! प्रदेश बदल जाए, पता बदल जाए, बैठने का कमरा बदल जाए, बस पुराने कार्यालय में पत्ता अपनी मर्जी के बिना नहीं हिलना चाहिए! झारखंड भाजपा के निवर्तमान संगठन महामंत्री कर्मवीर सिंह जी से जुड़ी चर्चाएं, उनका पिछला इतिहास और उनसे जुड़े ज्ञात-अज्ञात विवाद इन दिनों इसी सवाल को जन्म दे रही हैं। संगठन में जिन्हें ‘भाई साहब’ कहा जाता है, उनके बारे में चर्चा है कि दूसरे राज्य में नई जिम्मेदारी मिलने के बाद भी झारखंड से विदाई लेने में खासा समय लगा।

अब यह संगठन के प्रति लगाव था, कार्यकर्ताओं से आत्मीयता थी या वर्षों में बने अपने समीकरणों की चिंता? इसका सही जवाब तो वही दे सकते हैं। लेकिन ऐसी चर्चाओं पर चुप्पी रहेगी, तो सवाल भी उठेंगे और व्यंग्य भी होगा। आखिर संगठन से प्रेम और संगठन पर अपना कब्जा बनाए रखने की इच्छा में फर्क तो होना चाहिए!

चर्चाओं के मुताबिक, जाने से पहले अपने पुराने करीबियों और संपर्कों को नए नेतृत्व के साथ व्यवस्थित करने की कवायद भी चली। यदि ऐसा हुआ है, तो पूछा जाना चाहिए कि यह जिम्मेदारियों का हस्तांतरण था या व्यक्तिगत प्रभाव की विरासत सुरक्षित करने का प्रयास? क्योंकि नए पदाधिकारी को संगठन सौंपना एक बात है और उसके आसपास अपने लोगों की ऐसी घेराबंदी कर देना कि उसे दुनिया भी आपकी खिड़की से दिखाई दे, ये बिल्कुल दूसरी बात!

नए भाईसाहब को कुर्सी मिले, लेकिन कुर्सी के आसपास पुराने भाई साहब का घेरा बना रहे तो बदलाव कितना हुआ? नामपट्टिका भर का? इस पूरे प्रसंग में रांची के एक कथित जमीन कारोबारी सह दलाल के सलाह की चर्चा भी जोड़ी जा रही है। इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। लेकिन संगठन के भीतर प्रभाव बनाए रखने का रास्ता यदि सचमुच ऐसे सलाहकार सुझा रहे हों, तो चिंता केवल किसी व्यक्ति की भूमिका की नहीं, संगठन की कार्य संस्कृति की भी होगी।

पार्टी कार्यालय में कार्यकर्ताओं के अनुभव की जगह बिचौलियों के नुस्खे चलने लगें, तो विचारधारा दीवार पर टंगी रह जाती है और व्यवहार में ‘किसका आदमी है’ ही सबसे बड़ी योग्यता बन जाता है! इसी सिलसिले में अपने करीबी निजी सहायक को झारखंड में बनाए रखने की कथित व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं। केवल किसी सहायक का वहीं रहना अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है। असली प्रश्न उसकी भूमिका, जवाबदेही और निर्देशों के स्रोत का है।

वह वर्तमान नेतृत्व का सहयोगी है या पूर्व नेतृत्व का सूचना केंद्र? उसके काम की प्राथमिकता प्रदेश संगठन तय करेगा या रायपुर से आने वाला फोन? यदि व्यवस्था स्पष्ट और अधिकृत है, तो उसे स्पष्ट करने में संकोच कैसा? और यदि वह व्यक्तिगत संपर्कों तथा प्रभाव को कायम रखने का माध्यम है, तो उसे संगठन सेवा का नाम क्यों दिया जाए?

कार्यकर्ताओं को यह जानने का अधिकार है कि उनके आवेदन, सुझाव और शिकायतें किस तक पहुँचती हैं। क्या वर्तमान नेतृत्व तक पूरी बात पहुँचती है, या किसी की सुविधा के अनुसार उसका संपादित संस्करण? क्योंकि सूचना पर नियंत्रण भी सत्ता का एक रूप है। किसे मिलवाना है, किसे टालना है, किसकी बात बढ़ानी है और किसकी शिकायत दबानी है, अगर यह सब किसी निजी निष्ठा से तय होने लगे, तो औपचारिक पदाधिकारी के पास पद रह जाता है और वास्तविक प्रभाव किसी और के पास!

फिर प्रदेश कार्यालय में संगठन कम, दरबारी व्यवस्था ज्यादा दिखाई देती है। कार्यकर्ता काम बताने से पहले अपना ‘संपर्क’ बताता है! सबसे अधिक नुकसान उन कार्यकर्ताओं का होता है जो वर्षों से झंडा उठाते हैं, बूथ संभालते हैं और कठिन समय में पार्टी के साथ खड़े रहते हैं। वे उम्मीद करते हैं कि नई जिम्मेदारियों के साथ संवाद के नए अवसर खुलेंगे। लेकिन यदि दरवाजे पर वही पुरानी छननी लगी रहे, तो उनके लिए परिवर्तन का अर्थ क्या है?

चेहरे बदलें, लेकिन पहुंच का ठेका वही रहे; नेतृत्व बदले, लेकिन कृपा पाने की शर्तें वही रहें तो सामान्य कार्यकर्ता किस बदलाव पर भरोसा करे? इन चर्चाओं पर संबंधित पक्ष अपना तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दें। आरोप गलत हैं तो उनका खंडन हो। किसी सहायक की अधिकृत भूमिका है तो वह स्पष्ट हो। और यदि व्यवस्था में दोहरे नियंत्रण की गुंजाइश है, तो उसे समाप्त किया जाए।

भाजपा का प्रदेश कार्यालय किसी व्यक्ति की निजी जागीर नहीं है कि जिम्मेदारी समाप्त होने के बाद भी वहाँ उसका अनौपचारिक दरबार चलता रहे! भाई साहब, संगठन के प्रति निष्ठा की पहचान यह भी है कि अगला व्यक्ति स्वतंत्र होकर काम कर सके। अपने उत्तराधिकारी को जगह देना भी अनुशासन है। हर संपर्क पर अपनी मुहर और हर सूचना पर अपना अधिकार बनाए रखना त्याग का प्रमाण नहीं होता।

विदाई की असली परीक्षा माला पहनते समय नहीं होती। वह तब होती है, जब आपके बिना कोई फैसला लिया जाए और आप उसे सहजता से स्वीकार कर सकें! पद छोड़ना आदेश का पालन है; नियंत्रण छोड़ना संगठनात्मक संस्कार की परीक्षा। इसलिए सवाल सीधा है कि झारखंड भाजपा वर्तमान नेतृत्व के निर्णयों से चलेगी या पुराने प्रभाव के कथित रिमोट से?

कुर्सी नए भाई साहब की हो और बटन पुराने भाई साहब दबाएं, तो उसे जिम्मेदारी का हस्तांतरण नहीं, नेतृत्व का अवमूल्यन कहेंगे! और झारखंड भाजपा में तो फ़िलहाल ऐसा ही दिख रहा है। अगर बदली हुई वर्तमान व्यवस्था को भी पहले की तरह ज़मीन दलाल, बिचौलिये, आदिवासियों की ज़मीन की धंधेबाज़ों के द्वारा ही रिमोट से चलाया गया तो यहाँ के भाजपा का भगवान ही मालिक होगा?

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